पटवारी भर्ती में डिप्लोमा मान्यता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नियुक्ति का आदेश पलटा

पटवारी भर्ती में डिप्लोमा मान्यता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नियुक्ति का आदेश पलटा

प्रेषित समय :20:00:01 PM / Sat, Aug 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ग्वालियर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पटवारी भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार को राहत देते हुए एकल पीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें अभ्यर्थी शेर सिंह रावत को पटवारी पद पर नियुक्ति देने के निर्देश दिए गए थे. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल किसी विश्वविद्यालय से डिप्लोमा या अंकसूची जारी हो जाने मात्र से भर्ती की निर्धारित पात्रता साबित नहीं होती. अभ्यर्थी को यह भी प्रमाणित करना होगा कि संबंधित संस्थान, पाठ्यक्रम और विशेष रूप से दूरस्थ शिक्षा माध्यम से संचालित पाठ्यक्रम को उस समय नियमानुसार मान्यता प्राप्त थी.

मामले में राज्य सरकार ने 10 दिसंबर 2025 को एकल पीठ द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी. एकल पीठ ने शेर सिंह रावत की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें पटवारी पद पर नियुक्ति देने के निर्देश दिए थे. राज्य सरकार का तर्क था कि भर्ती के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप अभ्यर्थी के पास कंप्यूटर अनुप्रयोग में आवश्यक डिप्लोमा होना चाहिए, लेकिन उसके द्वारा प्रस्तुत डिप्लोमा जिस संस्थान के दूरस्थ शिक्षा केंद्र से प्राप्त किया गया था, वहां से उस माध्यम में पाठ्यक्रम संचालित करने की आवश्यक स्वीकृति उपलब्ध नहीं थी.

खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान भर्ती नियमों और अभ्यर्थी की शैक्षणिक योग्यता से संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किया. कोर्ट ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में केवल अंकपत्र या डिप्लोमा की मौजूदगी को देखकर पात्रता तय नहीं की जा सकती. भर्ती प्राधिकारी के लिए यह देखना भी आवश्यक है कि जिस पाठ्यक्रम के आधार पर अभ्यर्थी नियुक्ति का दावा कर रहा है, वह संबंधित समय पर सक्षम प्राधिकारी से मान्यता प्राप्त था या नहीं. यदि पाठ्यक्रम या उसे संचालित करने वाले संस्थान को निर्धारित माध्यम में पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति नहीं थी, तो केवल विश्वविद्यालय द्वारा प्रमाण पत्र जारी कर दिए जाने से भर्ती की पात्रता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती.

सरकार की ओर से अदालत के समक्ष कहा गया कि भर्ती विज्ञापन में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थान से कंप्यूटर अनुप्रयोग में डिप्लोमा की शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की गई थी. सरकार का कहना था कि शेर सिंह रावत ने शिवपुरी स्थित एक दूरस्थ शिक्षा केंद्र के माध्यम से यह डिप्लोमा प्राप्त किया था. संबंधित केंद्र को उस माध्यम से पाठ्यक्रम संचालित करने की आवश्यक स्वीकृति प्राप्त नहीं थी. इसलिए भर्ती प्राधिकारी ने अभ्यर्थी की योग्यता को स्वीकार नहीं किया और उसे नियुक्ति के लिए पात्र नहीं माना.

दूसरी ओर शेर सिंह रावत की ओर से अपनी पात्रता के पक्ष में तर्क दिया गया. उनका कहना था कि उन्होंने पटवारी भर्ती की चयन परीक्षा में सफलता हासिल की थी और अन्य निर्धारित मानकों को भी पूरा किया था. उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग में 145वीं रैंक प्राप्त की थी. उनका यह भी कहना था कि गुरु घासीदास विश्वविद्यालय द्वारा जारी किया गया उनका डिप्लोमा आज तक निरस्त नहीं किया गया है. ऐसे में केवल डिप्लोमा प्राप्त करने के माध्यम पर सवाल उठाकर उनकी नियुक्ति से इनकार करना उचित नहीं है.

अभ्यर्थी की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि विश्वविद्यालय ने विधिवत रूप से डिप्लोमा जारी किया है और जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे निरस्त नहीं किया जाता, तब तक उसे वैध माना जाना चाहिए. इसी आधार पर एकल पीठ ने पहले उनके पक्ष में आदेश पारित करते हुए नियुक्ति पर विचार करने के निर्देश दिए थे. हालांकि राज्य सरकार ने इस आदेश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और कहा कि भर्ती में निर्धारित पात्रता की जांच करना भर्ती प्राधिकारी का दायित्व है.

खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि भर्ती प्राधिकारी की जिम्मेदारी केवल अभ्यर्थी द्वारा प्रस्तुत अंकसूची और डिप्लोमा की जांच तक सीमित नहीं है. उसे यह भी देखना होता है कि संबंधित योग्यता भर्ती नियमों और विज्ञापन में निर्धारित शर्तों के अनुरूप है या नहीं. किसी विश्वविद्यालय द्वारा प्रमाण पत्र जारी किए जाने से यह जरूरी नहीं हो जाता कि उस प्रमाण पत्र के आधार पर प्रत्येक भर्ती में पात्रता स्वतः स्वीकार कर ली जाए. पाठ्यक्रम की मान्यता और उसे संचालित करने की अनुमति भी महत्वपूर्ण है.

अदालत ने विशेष रूप से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से प्राप्त डिप्लोमा के संबंध में मान्यता की स्थिति को महत्वपूर्ण माना. कोर्ट के अनुसार यदि किसी संस्थान को किसी विशेष माध्यम से पाठ्यक्रम संचालित करने की अनुमति प्राप्त नहीं थी, तो उस माध्यम से प्राप्त योग्यता को भर्ती के लिए स्वतः मान्य नहीं माना जा सकता. अभ्यर्थी को यह दिखाना आवश्यक है कि जिस समय उसने पाठ्यक्रम पूरा किया, उस समय संबंधित पाठ्यक्रम और शिक्षा का माध्यम मान्य था.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन परीक्षा में सफलता या मेरिट सूची में स्थान हासिल कर लेना अपने आप में नियुक्ति का पूर्ण अधिकार नहीं देता. भर्ती प्रक्रिया में अंतिम नियुक्ति के लिए विज्ञापन में निर्धारित सभी पात्रता शर्तों को पूरा करना आवश्यक है. यदि शैक्षणिक योग्यता के संबंध में कोई आवश्यक शर्त पूरी नहीं होती है तो केवल चयन परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने के आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता.

अदालत ने मेरिट या प्रतीक्षा सूची में स्थान के आधार पर समानता के दावे को भी स्वीकार नहीं किया. यदि किसी अन्य अभ्यर्थी को नियुक्ति मिल गई है, तो केवल इस आधार पर कोई ऐसा अभ्यर्थी नियुक्ति का अधिकार नहीं मांग सकता, जो स्वयं निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करता हो. कोर्ट ने कहा कि गलत तरीके से किसी अन्य व्यक्ति को लाभ मिल गया हो तो वह समान आधार पर दूसरे व्यक्ति को भी वही लाभ देने का अधिकार नहीं बनाता.

मामले में शेर सिंह रावत ने चयन परीक्षा में सफलता और अन्य पिछड़ा वर्ग में 145वीं रैंक हासिल करने का भी उल्लेख किया था. हालांकि खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि चयन परीक्षा में प्राप्त अंक और मेरिट में स्थान तभी नियुक्ति का आधार बन सकते हैं, जब अभ्यर्थी भर्ती की सभी आवश्यक शैक्षणिक और अन्य पात्रता शर्तें पूरी करता हो. इसलिए केवल चयन में सफलता को नियुक्ति का निर्णायक आधार नहीं माना जा सकता.

खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ का 10 दिसंबर 2025 का आदेश निरस्त कर दिया. इसके साथ ही शेर सिंह रावत की ओर से दायर रिट याचिका को भी खारिज कर दिया गया. अदालत ने पूर्व आदेश को बहाल किए जाने की बात कही है. इस निर्णय के बाद पटवारी भर्ती में शैक्षणिक योग्यता की मान्यता को लेकर यह महत्वपूर्ण स्थिति सामने आई है कि केवल विश्वविद्यालय से जारी डिप्लोमा या अंकसूची पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि संबंधित पाठ्यक्रम और उसके संचालन के माध्यम की वैध मान्यता भी साबित करनी होगी.

हाईकोर्ट के इस फैसले से भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों और शैक्षणिक योग्यता की जांच की जिम्मेदारी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हुई है. अदालत ने माना कि नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी का निर्धारित योग्यता मानकों पर खरा उतरना आवश्यक है. इस मामले में दूरस्थ शिक्षा केंद्र से प्राप्त डिप्लोमा की मान्यता और उसे संचालित करने की अनुमति से जुड़ा प्रश्न नियुक्ति के दावे में महत्वपूर्ण साबित हुआ. खंडपीठ के फैसले के बाद शेर सिंह रावत को पटवारी पद पर नियुक्ति देने संबंधी एकल पीठ का निर्देश प्रभावी नहीं रहेगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-