प्रयागराज. सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) का इस्तेमाल अदालत की कार्यवाही और न्याय प्रशासन में बाधा डालने के लिए नहीं किया जा सकता. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में लगातार आरटीआई आवेदन दाखिल करने और अदालत के निर्देशों का पालन नहीं करने वाले याचिकाकर्ता पर कुल 6.70 लाख रुपये की लागत लगाई है. कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने महज एक महीने से कुछ अधिक समय में 24 आरटीआई आवेदन दाखिल किए थे. इनमें अदालत के आंतरिक प्रशासन और कार्यप्रणाली से जुड़ी ऐसी जानकारियां मांगी गई थीं, जिनका उसके मामले से कोई सीधा संबंध नहीं था. कोर्ट ने इन आवेदनों को न्याय प्रशासन में बाधा डालने वाला माना.
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने यह आदेश Vemula Venkata Vinay Babu Alias Vinay Vemula बनाम State of U.P. एवं अन्य मामले में 5 अगस्त 2026 को पारित किया. यह मामला रिट-सी संख्या 547/2024 से संबंधित था. याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के 28 जुलाई 2023 के आदेश को चुनौती दी थी. राज्य सूचना आयोग ने उसकी अपील इस आधार पर खारिज की थी कि मांगी गई आवश्यक जानकारी पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी थी.
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि इससे पहले याचिकाकर्ता को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुआ. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होना किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है. यह अदालत द्वारा सुविधा और सुनवाई को सुगम बनाने के लिए उपलब्ध कराया जाने वाला माध्यम है, जिसका इस्तेमाल अदालत के विवेक पर निर्भर करता है. यदि अदालत व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश देती है तो उसका पालन करना आवश्यक है.
कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड किया कि याचिकाकर्ता पहले कई बार प्रयागराज आ चुका था. आदेश के अनुसार वह पहले करीब चार-पांच बार इलाहाबाद आ चुका था. इसके बावजूद उसने लगभग 2000 किलोमीटर की यात्रा और लॉजिस्टिक समस्या का हवाला देते हुए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से इनकार किया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की सहायता भी ले सकता था और उसके लिए सुविधाजनक तारीख व समय निर्धारित किया जा सकता था. इसके बावजूद वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से बचता रहा.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आरटीआई से संबंधित आवेदनों की संख्या और उनकी प्रकृति को भी गंभीरता से लिया. डिप्टी रजिस्ट्रार (आरटीआई) की रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता ने 4 जून 2026 से 17 जुलाई 2026 के बीच कुल 24 आरटीआई आवेदन दाखिल किए. इनमें हाईकोर्ट की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी विभिन्न जानकारियां मांगी गई थीं. इनमें आंतरिक कार्यालय नोटशीट, आधिकारिक रूटिंग शीट, पत्राचार की स्थिति, एक्शन टेकन रिपोर्ट, कोर्ट की उपस्थिति से संबंधित रजिस्टर, बेंच सेक्रेटरी लॉग, फाइल मूवमेंट रजिस्टर, रोस्टर व्यवस्था, Cisco Webex के सेशन और सर्वर लॉग तथा मामलों को ‘Passed Over’ किए जाने के कारणों जैसी जानकारियां शामिल थीं.
कोर्ट ने माना कि इन आवेदनों में मांगी गई जानकारियां काफी हद तक अस्पष्ट थीं और उनका याचिकाकर्ता के मामले से कोई संबंध नहीं था. अदालत ने कहा कि इस तरह के आवेदन कोर्ट कर्मचारियों का समय लेते हैं और न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करते हैं. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता के पास विभिन्न आरटीआई आवेदन दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन अपने मामले के गुण-दोष पर बहस करने के लिए अदालत में उपस्थित होने में वह आनाकानी कर रहा था.
इन 24 आरटीआई आवेदनों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने प्रत्येक आवेदन पर 5,000 रुपये की लागत लगाई. इस तरह 24 आवेदनों के लिए कुल 1.20 लाख रुपये की लागत तय की गई. कोर्ट ने सभी संबंधित आरटीआई आवेदनों को रिकॉर्ड में दाखिल करने का निर्देश भी दिया.
मामले में एक अन्य आवेदन भी याचिकाकर्ता ने दायर किया था, जिसमें उसने कुछ प्रतिवादियों के खिलाफ इस आधार पर कार्रवाई की मांग की थी कि उन्होंने कोर्ट के निर्देश के बावजूद काउंटर एफिडेविट दाखिल नहीं किया. कोर्ट ने पाया कि यह आवेदन गलत तथ्यों पर आधारित था. रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित प्रतिवादी की ओर से काउंटर एफिडेविट पहले ही दाखिल किया जा चुका था और उसकी प्रति याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को भी उपलब्ध कराई जा चुकी थी. कोर्ट ने इस आवेदन को गलत और आधारहीन मानते हुए 50 हजार रुपये की लागत लगाई.
इसके बाद हाईकोर्ट ने मूल याचिका के गुण-दोष पर भी विचार किया. कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने जिन सूचनाओं की मांग की थी, उनमें से आवश्यक जानकारी संबंधित अधिकारियों द्वारा पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई नागरिक ऐसी सूचना उपलब्ध कराने पर जोर नहीं दे सकता, जो संबंधित प्राधिकारी के रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं है.
कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से मांगी गई कुछ सूचनाएं उसके खिलाफ दर्ज शिकायतों से संबंधित थीं. उपलब्ध रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि एक शिकायतकर्ता और उसकी बेटी की ओर से याचिकाकर्ता के खिलाफ शिकायत किए जाने के संबंध में रिपोर्ट रिकॉर्ड पर मौजूद थी. हालांकि, कोर्ट ने इस पहलू को भी रिकॉर्ड के संदर्भ में देखा और पाया कि सूचना आयोग के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता.
हाईकोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही अदालत ने न्यायालय की कार्यवाही और न्याय प्रशासन में बाधा डालने वाले इस प्रकार के आचरण को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से याचिकाकर्ता पर अतिरिक्त 5 लाख रुपये की लागत लगाई.
इस प्रकार अदालत द्वारा लगाई गई कुल लागत 6.70 लाख रुपये हो गई. इसमें गलत तथ्यों पर आधारित आवेदन के लिए 50 हजार रुपये, 24 आरटीआई आवेदनों के लिए 1.20 लाख रुपये और न्याय प्रशासन में बाधा डालने वाले आचरण को हतोत्साहित करने के लिए 5 लाख रुपये शामिल हैं. हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि कुल 6.70 लाख रुपये की राशि चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के बैंक खाते में जमा कराई जाए. राशि जमा नहीं करने की स्थिति में रजिस्ट्रार जनरल को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं.
हाईकोर्ट के इस आदेश में स्पष्ट किया गया कि आरटीआई कानून नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार देता है, लेकिन इसका इस्तेमाल अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करने, न्याय प्रशासन में बाधा डालने या असंबंधित और अस्पष्ट सूचनाओं के लिए लगातार आवेदन दाखिल करने के माध्यम के रूप में नहीं किया जा सकता. इसी तरह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अदालत की सुविधा है, जिसे पक्षकार अपनी सुविधा के आधार पर अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता. अदालत के निर्देश के अनुसार व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक होने पर उसका पालन करना होगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

