मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में बुजुर्ग क्यों हो रहे अकेले, डिजिटल बदलाव ने बढ़ाई नई सामाजिक चुनौती

मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में बुजुर्ग क्यों हो रहे अकेले, डिजिटल बदलाव ने बढ़ाई नई सामाजिक चुनौती

प्रेषित समय :22:22:14 PM / Sun, Aug 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मोबाइल फोन और इंटरनेट ने जिंदगी को पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है. बैंकिंग से लेकर खरीदारी, टिकट बुकिंग, अस्पताल की जानकारी, सरकारी सेवाओं और अपनों से बातचीत तक ज्यादातर काम अब कुछ क्लिक में हो जाते हैं. लेकिन इसी डिजिटल बदलाव का एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है. तकनीक के तेजी से बदलते दौर में समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो इस रफ्तार के साथ कदम मिलाने में खुद को असहज महसूस कर रहा है. खासकर बुजुर्गों के लिए मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया सुविधा के साथ-साथ निर्भरता, अकेलेपन और असुरक्षा की नई चुनौती भी लेकर आई है.

कई बुजुर्गों के लिए पहले बैंक जाना, दुकानदार से सामान लेना, सरकारी कार्यालय में जानकारी प्राप्त करना या परिवार के किसी सदस्य से आमने-सामने बातचीत करना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था. अब इनमें से कई काम ऑनलाइन हो गए हैं. बैंकिंग एप, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट, मोबाइल टिकट और सरकारी पोर्टल ने सेवाओं को आसान तो बनाया है, लेकिन जिन लोगों ने तकनीक के बिना अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बिताया, उनके लिए यह बदलाव हमेशा सहज नहीं रहा.

डिजिटल दुनिया में सबसे बड़ी परेशानी कई बार तकनीक चलाने की नहीं, बल्कि उस पर भरोसा करने की होती है. मोबाइल स्क्रीन पर आने वाला कोई संदेश, बैंक का नोटिफिकेशन, अनजान लिंक या किसी सेवा के नाम पर मांगी जाने वाली जानकारी बुजुर्गों के लिए भ्रम पैदा कर सकती है. साइबर ठगी के मामले सामने आने के बाद यह डर और बढ़ गया है. कई वरिष्ठ नागरिक बैंक खाते, एटीएम, मोबाइल भुगतान और इंटरनेट बैंकिंग से जुड़ी जानकारी साझा करने में इसलिए भी हिचकते हैं क्योंकि उन्हें यह पता नहीं होता कि कौन-सी जानकारी सुरक्षित है और कौन-सी नहीं.

इस स्थिति का एक सामाजिक पहलू भी है. पहले परिवार में बुजुर्गों की जरूरत पड़ने पर बच्चे या अन्य सदस्य उनके आसपास मौजूद रहते थे. संयुक्त परिवारों के कम होने और रोजगार के लिए युवाओं के दूसरे शहरों में जाने के कारण कई वरिष्ठ नागरिक अकेले रह रहे हैं. ऐसे में तकनीकी समस्या आने पर उन्हें मदद के लिए किसी परिचित या परिवार के सदस्य का इंतजार करना पड़ता है. कई बार छोटी-सी डिजिटल परेशानी भी उनके लिए बड़ी चिंता बन जाती है.

मोबाइल ने लोगों को जोड़ा जरूर है, लेकिन डिजिटल संवाद हमेशा व्यक्तिगत साथ का विकल्प नहीं बन पाता. वीडियो कॉल पर परिवार से बात हो जाना और किसी के साथ बैठकर बातचीत करना दोनों अलग अनुभव हैं. कई बुजुर्ग अपने बच्चों और पोते-पोतियों से मोबाइल पर जुड़े रहते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में साथ की कमी महसूस होती है. यही वह जगह है जहां डिजिटल सुविधा और सामाजिक अकेलेपन के बीच का अंतर दिखाई देता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया से दूर रखने के बजाय उन्हें सुरक्षित और सरल तरीके से इससे जोड़ना जरूरी है. मोबाइल चलाना सिखाने का मतलब केवल कॉल करना या संदेश भेजना सिखाना नहीं है. उन्हें डिजिटल भुगतान, पासवर्ड की सुरक्षा, संदिग्ध लिंक की पहचान, बैंक से संबंधित सावधानियां और ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचने के तरीके भी समझाने जरूरी हैं.

परिवार की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है. यदि बुजुर्ग किसी डिजिटल प्रक्रिया को बार-बार पूछते हैं तो उन्हें डांटने या उनकी क्षमता पर सवाल उठाने के बजाय धैर्य से समझाना चाहिए. कई परिवारों में युवा सदस्य तकनीक को बहुत सामान्य मानते हैं और उन्हें लगता है कि मोबाइल चलाना हर व्यक्ति के लिए आसान है. लेकिन जिस सुविधा को युवा कुछ सेकंड में समझ लेते हैं, उसे सीखने में किसी बुजुर्ग को कई दिन लग सकते हैं.

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—क्या हर सेवा को पूरी तरह डिजिटल कर देना सही है? डिजिटल व्यवस्था निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन वरिष्ठ नागरिकों और तकनीक से कम परिचित लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी बनी रहनी चाहिए. बैंक, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक सेवाओं में सहायता डेस्क, हेल्पलाइन और व्यक्तिगत मार्गदर्शन जैसी सुविधाएं बुजुर्गों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती हैं.

डिजिटल भुगतान इसका बड़ा उदाहरण है. आज दुकानों से लेकर सार्वजनिक सेवाओं तक भुगतान के कई विकल्प उपलब्ध हैं. युवा वर्ग के लिए यह सुविधाजनक है, लेकिन हर बुजुर्ग डिजिटल भुगतान करने में सहज नहीं होता. किसी व्यक्ति को नकद भुगतान की आदत हो सकती है और अचानक केवल डिजिटल माध्यम पर निर्भर व्यवस्था उसके लिए परेशानी पैदा कर सकती है. इसलिए तकनीकी विकास के साथ समावेशी व्यवस्था बनाना भी जरूरी है.

बुजुर्गों के डिजिटल अकेलेपन का संबंध केवल तकनीक से नहीं बल्कि सामाजिक संरचना से भी है. जब परिवार छोटा होता है, बच्चे दूसरे शहरों में रहते हैं और पड़ोस में पहले जैसी सामाजिक बातचीत नहीं रहती, तब मोबाइल ही संपर्क का प्रमुख माध्यम बन जाता है. लेकिन अगर वही मोबाइल भी डर और असुरक्षा का कारण बनने लगे तो समस्या और गंभीर हो सकती है.

ऐसे में समाज के स्तर पर भी पहल की जरूरत है. स्थानीय संस्थाएं, सामाजिक संगठन, सामुदायिक केंद्र और आवासीय समितियां बुजुर्गों के लिए डिजिटल प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर सकती हैं. उन्हें सरल भाषा में मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और साइबर सुरक्षा की जानकारी दी जा सकती है. साथ ही ऐसे कार्यक्रम केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित न हों, बल्कि बुजुर्गों को एक-दूसरे से मिलने और बातचीत करने का अवसर भी दें.

डिजिटल साक्षरता के साथ डिजिटल आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी जरूरी है. किसी बुजुर्ग को हर छोटे काम के लिए बेटे, बेटी या पड़ोसी पर निर्भर न रहना पड़े, इसके लिए उसे अपनी जरूरत के अनुसार तकनीक इस्तेमाल करना आना चाहिए. वहीं दूसरी ओर, हर चीज खुद करने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती. आवश्यकता पड़ने पर सहायता उपलब्ध होना उतना ही जरूरी है.

इस बदलाव में युवाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. परिवार के युवा सदस्य यदि महीने में कुछ समय निकालकर अपने माता-पिता या दादा-दादी को मोबाइल की नई सुविधाएं समझाएं, उनके फोन की सुरक्षा जांचें और संदिग्ध संदेशों की पहचान करना सिखाएं तो कई परेशानियों को कम किया जा सकता है. साथ ही उनसे केवल डिजिटल माध्यम से संपर्क रखने के बजाय समय निकालकर व्यक्तिगत मुलाकात भी जरूरी है.

असल चुनौती तकनीक को रोकना नहीं बल्कि उसे सभी के लिए उपयोगी बनाना है. डिजिटल भारत तभी मजबूत होगा जब तकनीक उम्र, शिक्षा और आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी को पीछे न छोड़े. बुजुर्गों को तकनीक से जोड़ना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह केवल सुविधा का सवाल नहीं है, बल्कि उनकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और सामाजिक जुड़ाव से भी जुड़ा है.

मोबाइल और इंटरनेट ने दूरियों को कम किया है, लेकिन यह जिम्मेदारी समाज की है कि तकनीकी सुविधा के बीच मानवीय दूरी न बढ़े. बुजुर्गों को केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं कि स्मार्टफोन कैसे चलाया जाता है. उन्हें यह एहसास दिलाना भी जरूरी है कि डिजिटल दुनिया बदल रही है, लेकिन परिवार और समाज में उनकी जगह और जरूरत आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. यही संतुलन तकनीकी प्रगति को वास्तविक सामाजिक प्रगति में बदल सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-