मुंबई। भारत के विभाजन की त्रासदी पर आधारित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ इतिहास के एक बेहद संवेदनशील अध्याय को मानवीय रिश्तों और भावनात्मक संघर्ष के जरिए सामने लाती है। निर्देशक राजकुमार संतोषी ने चर्चित नाटक जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई को बड़े पर्दे के लिए रूपांतरित किया है। फिल्म में सनी देओल, शबाना आजमी, प्रीति जिंटा, करण देओल और अभिमन्यु सिंह प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत शबाना आजमी का अभिनय है, जबकि सनी देओल के साथ उनके दृश्य कहानी को गहरी भावनात्मक ताकत देते हैं।
कहानी 1947 के विभाजन के बाद शुरू होती है। सिकंदर मिर्जा यानी सनी देओल अपने परिवार के साथ मेरठ से लाहौर पहुंचते हैं। उनके साथ पत्नी हमीदा, बेटा जावेद और बेटी तनवीर हैं। विभाजन के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर हुआ यह परिवार लाहौर पहुंचकर जिस हवेली में रहने आता है, वहां पहले से एक बुजुर्ग हिंदू महिला दुर्गावती रहती मिलती है। मोहल्ले में लोग उन्हें प्यार से ‘माई’ कहते हैं। यहीं से फिल्म का मूल संघर्ष शुरू होता है।
मिर्जा परिवार के लिए यह स्थिति आसान नहीं होती। उन्हें उम्मीद थी कि आवंटित हवेली पूरी तरह खाली होगी, लेकिन वहां माई अपने पुराने घर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका विश्वास है कि उनका बेटा एक दिन लौटकर आएगा। यही उम्मीद उनके लिए जीवन का आखिरी सहारा बन चुकी है। दूसरी ओर मिर्जा परिवार नए शहर में विस्थापन की पीड़ा और असुरक्षा के बीच अपना जीवन शुरू करने की कोशिश कर रहा है।
शुरुआत में मिर्जा परिवार माई को हवेली खाली करने के लिए समझाने की कोशिश करता है। लेकिन माई अपने घर से जाने को तैयार नहीं होतीं। धीरे-धीरे यह निजी विवाद सामुदायिक तनाव का रूप लेने लगता है। फिल्म में याकूब का किरदार इस तनाव को और भड़काता है। वह स्थानीय राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है और हिंदू-मुस्लिम विवाद को साम्प्रदायिक रंग देकर माहौल को और तनावपूर्ण बना देता है। इसके बाद कहानी केवल एक घर पर अधिकार के विवाद तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सवाल उठाती है कि विभाजन के दौरान इंसानियत और पहचान में से किसे प्राथमिकता दी जाए।
फिल्म का पहला भाग खास तौर पर प्रभावशाली है। कहानी धीरे-धीरे दर्शकों को उस दौर की मानसिकता में ले जाती है, जब लोगों को रातोंरात अपना घर, शहर और कभी-कभी पूरा जीवन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि विभाजन केवल नक्शे पर खींची गई सीमा नहीं था। उसके पीछे लाखों लोगों की निजी त्रासदियां, बिछड़ते परिवार, उजड़ते घर और अपनी जमीन से बेदखल होने का दर्द था।
राजकुमार संतोषी ने नाटक की मूल भावना को फिल्म के रूप में विस्तार देने की कोशिश की है। हालांकि कुछ जगह उनका प्रस्तुतीकरण पुराने दौर की फिल्मों और रंगमंच की शैली के करीब जाता दिखाई देता है। कई संवाद और टकराव जरूरत से ज्यादा ऊंचे स्वर में प्रस्तुत किए गए हैं। हवेली के सीमित परिवेश में कहानी आगे बढ़ने के कारण कुछ दृश्य अधिक नाटकीय महसूस होते हैं। यदि इन्हें थोड़ा संयमित और स्वाभाविक रखा जाता तो फिल्म का प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता था।
इसके बावजूद फिल्म का पहला भाग दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहता है। खासकर वे दर्शक जो मूल नाटक से परिचित नहीं हैं, उनके लिए कहानी में लगातार उत्सुकता बनी रहती है। फिल्म दर्शकों को केवल घटनाएं देखने के लिए नहीं छोड़ती, बल्कि उनसे सवाल भी करती है कि जिस व्यक्ति का घर उससे छीन लिया गया हो, उसके लिए ‘अपना’ होने का अर्थ क्या रह जाता है।
फिल्म का दूसरा भाग अपेक्षाकृत कमजोर शुरुआत करता है। पहले हिस्से में बना तनाव कुछ समय के लिए धीमा पड़ जाता है। कहानी की गति असमान महसूस होती है और कुछ स्थानों पर संगीत भी कथानक की गति को प्रभावित करता है। हालांकि कलाकारों के दमदार अभिनय के कारण फिल्म जल्द ही दोबारा अपनी लय पकड़ लेती है।
शबाना आजमी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। माई के किरदार में उनका अभिनय बेहद संवेदनशील है। उनके चेहरे के भाव, संवाद बोलने का अंदाज और खामोशी में छिपा दर्द किरदार को विश्वसनीय बनाता है। माई ने अपना लगभग सब कुछ खो दिया है, लेकिन अपने बेटे के लौटने की उम्मीद नहीं छोड़ी है। शबाना इस उम्मीद और पीड़ा को बिना जरूरत से ज्यादा भावुक हुए पर्दे पर उतारती हैं। यही वजह है कि उनके कई दृश्य फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के मन में बने रहते हैं।
सनी देओल भी सिकंदर मिर्जा के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। देशभक्ति और एक्शन फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले सनी देओल इस कहानी में एक विस्थापित व्यक्ति की भूमिका निभाते हैं, जो अपने परिवार को सुरक्षित रखना चाहता है, लेकिन धीरे-धीरे माई के दर्द को समझने लगता है। शबाना आजमी के साथ उनके दृश्य फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं। दोनों कलाकारों के बीच का भावनात्मक संवाद कहानी को मानवीय आधार देता है।
प्रीति जिंटा हमीदा की भूमिका में कहानी का संतुलन बनाए रखती हैं। उनका किरदार परिवार की चिंता और बदलते माहौल के बीच खड़ा दिखाई देता है। करण देओल जावेद की भूमिका में अपेक्षित प्रभाव छोड़ने के लिए ज्यादा भावनात्मक गहराई की जरूरत थी। हालांकि उन्हें मिले एक्शन दृश्य में उनकी क्षमता की झलक दिखाई देती है।
अभिमन्यु सिंह याकूब के किरदार में खलनायक की भूमिका निभाते हैं। उनका अभिनय प्रभावशाली उपस्थिति तो दर्ज कराता है, लेकिन कई जगह उनका अंदाज जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाता है। किरदार में सूक्ष्मता की कमी महसूस होती है और ऊंचे स्वर में प्रस्तुत किए गए कुछ दृश्य कहानी की गंभीरता को कमजोर करते हैं।
संगीत की बात करें तो एआर रहमान का काम इस फिल्म में उतना प्रभाव नहीं छोड़ता, जितनी उम्मीद की जा सकती थी। कुछ गीत कहानी के भावनात्मक प्रवाह के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ पाते। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत वैसे भी संगीत नहीं, बल्कि कहानी और कलाकारों का अभिनय है।
कुल मिलाकर ‘बंटवारा 1947’ विभाजन को केवल ऐतिहासिक घटना के रूप में देखने के बजाय उन लोगों की नजर से समझने की कोशिश करती है, जिन्होंने उस त्रासदी को अपनी जिंदगी में झेला था। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह घर, पहचान, उम्मीद और इंसानियत जैसे सवालों को कहानी के केंद्र में रखती है। कुछ जगह पुराने ढंग का निर्देशन और असमान गति इसकी कमजोरी जरूर बनते हैं, लेकिन शबाना आजमी का शानदार अभिनय और सनी देओल के साथ उनकी भावनात्मक केमिस्ट्री फिल्म को मजबूत बनाती है।
‘बंटवारा 1947’ यह याद दिलाती है कि इतिहास को समझने का सबसे प्रभावी तरीका केवल तारीखों और घटनाओं को जानना नहीं, बल्कि उन लोगों की जिंदगी को समझना है, जिन्होंने इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक को अपने घर और रिश्तों की कीमत पर जिया। फिल्म का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि विभाजन ने केवल जमीन नहीं बांटी थी, बल्कि लाखों लोगों से उनके अपनेपन का एहसास भी छीन लिया था।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

