राजेश कुमार सिन्हा
15 अगस्त भारतीय इतिहास की वह तारीख है, जो हमारे राष्ट्रीय जीवन में उत्सव और आत्ममंथन दोनों को एक साथ उपस्थित करती है। यह वह दिन है जब भारत ने दो शताब्दियों से अधिक लंबे औपनिवेशिक शासन से मुक्ति प्राप्त की और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी यात्रा आरंभ की। लेकिन 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्रता को केवल सत्ता के हस्तांतरण के रूप में देखना उस ऐतिहासिक क्षण के व्यापक प्रभाव को सीमित कर देना होगा। स्वतंत्रता के साथ ही भारत के सामने राष्ट्र निर्माण की ऐसी चुनौती खड़ी थी, जिसका कोई तैयार नक्शा नहीं था। विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, सांप्रदायिक हिंसा, गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक विषमता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण की कठिन जिम्मेदारी इन सबके बीच एक नए भारत को आकार देना था।
इस संक्रमण काल में डॉ. राजेंद्र प्रसाद का व्यक्तित्व एक ऐसे राष्ट्रपुरुष के रूप में सामने आता है, जिसने स्वतंत्रता के संघर्ष को देखा भी, उसमें सक्रिय भाग लिया और स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए स्वतंत्रता दिवस और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है। वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने भारत की पराधीनता भी देखी और स्वतंत्रता का सूर्योदय भी।
3 दिसंबर 1884 को बिहार के जीरादेई में जन्मे राजेंद्र प्रसाद असाधारण प्रतिभा और अध्ययनशीलता के धनी थे। उनकी शिक्षा और बौद्धिक क्षमता उन्हें एक सफल वकील के जीवन की ओर ले जा सकती थी। उन्होंने विधि की शिक्षा प्राप्त की और वकालत के क्षेत्र में प्रतिष्ठा भी अर्जित की। लेकिन भारत की राजनीतिक परिस्थितियों ने उनके जीवन को एक अलग दिशा दी। राष्ट्र की पुकार ने उन्हें व्यक्तिगत सफलता के सुरक्षित रास्ते से निकालकर स्वतंत्रता आंदोलन की कठिन राह पर ला खड़ा किया।
यहीं से राजेंद्र प्रसाद के जीवन में वह परिवर्तन शुरू होता है जिसने उन्हें आगे चलकर ‘राजेंद्र बाबू’ से ‘देशरत्न’ बना दिया।
महात्मा गांधी के भारत आगमन और विशेष रूप से चंपारण सत्याग्रह ने राजेंद्र प्रसाद के राजनीतिक जीवन को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। चंपारण केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था। वह भारतीय किसान के दुख, शोषण और औपनिवेशिक व्यवस्था की निर्ममता को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर था। गांधी के नेतृत्व में चंपारण पहुंचे राजेंद्र प्रसाद ने ग्रामीण भारत की वास्तविकता को करीब से देखा। यही वह क्षण था जब उनके भीतर का सफल वकील धीरे-धीरे जनसेवक में बदलता गया।
गांधी और राजेंद्र प्रसाद का संबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण संबंधों में से एक है। राजेंद्र प्रसाद गांधी से गहरे प्रभावित थे, लेकिन उन्हें केवल गांधी के अनुयायी के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे स्वयं एक स्वतंत्र विचार वाले राष्ट्रीय नेता थे। गांधी ने उनके जीवन को नई दिशा दी, लेकिन उनकी प्रतिभा, संगठन क्षमता और सार्वजनिक जीवन की प्रतिबद्धता पहले से मौजूद थी।
स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में राजेंद्र प्रसाद ने सक्रिय भूमिका निभाई। असहयोग आंदोलन से लेकर सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन तक उनकी राजनीतिक यात्रा संघर्ष और त्याग से भरी रही। उन्होंने जेल यात्राएँ कीं और अपने व्यक्तिगत जीवन की सुविधाओं को राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए त्याग दिया। यही वह तपस्या थी जिसने उन्हें जनता के बीच विश्वसनीयता प्रदान की।राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक था उनका जनसरोकार। वे केवल राजनीतिक मंच के नेता नहीं थे बल्कि प्राकृतिक आपदाओं और सामाजिक संकट के समय वे जनता के बीच उतरते थे। बिहार के भूकंप और अन्य आपदाओं के दौरान उनकी सक्रियता ने यह स्पष्ट किया कि उनके लिए राष्ट्रसेवा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने तक सीमित नहीं थी। जनता के दुख में खड़ा होना भी राष्ट्र सेवा का ही एक रूप था और इसीलिए ‘देशरत्न’ की उपाधि उनके लिए विशेष अर्थ रखती है। यह कोई सरकारी पद या संवैधानिक अलंकरण नहीं था ,यह जनता के मन से निकला संबोधन था। किसी नेता को जनता तब ‘देशरत्न’ कहती है, जब उसके जीवन और कर्मों में उसे अपने देश की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब दिखाई देता है। राजेंद्र प्रसाद के लिए यह सम्मान स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही अर्जित हो चुका था।
15 अगस्त 1947 जब आया, तब राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्रता आंदोलन के एक वरिष्ठ नेता होने के साथ-साथ संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे। स्वतंत्रता का वह क्षण उनके जीवन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक था। संविधान सभा की 15 अगस्त 1947 की बैठक में वे अध्यक्ष के रूप में उपस्थित थे। उस समय देश आजाद हो चुका था, लेकिन उसके सामने विभाजन की भयावहता भी थी। एक ओर स्वतंत्रता का उल्लास था, दूसरी ओर लाखों लोगों के विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा की पीड़ा।
इसलिए राजेंद्र प्रसाद की पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता कोई अंतिम पड़ाव नहीं थी बल्कि वह एक नई यात्रा का आरंभ थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी भारत को एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण राष्ट्र के रूप में स्थापित करना। संविधान सभा इस ऐतिहासिक कार्य में लगी थी। राजेंद्र प्रसाद उसके अध्यक्ष थे। संविधान सभा में अनेक मत, विचारधाराएँ, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और सामाजिक दृष्टियाँ मौजूद थीं। ऐसे समय में सभा की कार्यवाही को गरिमा, संतुलन और धैर्य के साथ संचालित करना आसान नहीं था।राजेंद्र प्रसाद ने इस जिम्मेदारी को जिस संयम के साथ निभाया, वह उनके संवैधानिक व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष है। वे केवल अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति नहीं थे; वे उस ऐतिहासिक संक्रमण के साक्षी और सहभागी थे, जिसमें भारत प्रजा से नागरिकों के लोकतांत्रिक गणराज्य में बदल रहा था।
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और भारत गणराज्य बना। इसी के साथ राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। यह केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धि नहीं थी। एक ऐसे व्यक्ति का राष्ट्रपति बनना, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्ष किया था और संविधान सभा की अध्यक्षता की थी, भारतीय इतिहास में प्रतीकात्मक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।
राष्ट्रपति के रूप में राजेंद्र प्रसाद ने उस पद की मर्यादा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत का संविधान नया था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली भी विकसित हो रही थी। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद के बीच संबंधों की संवैधानिक परंपराएँ व्यवहार के स्तर पर आकार ले रही थीं। इस दौर में राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू के बीच कई मुद्दों पर मतभेद भी सामने आए। इन मतभेदों को केवल व्यक्तिगत संघर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा। दोनों राष्ट्रीय आंदोलन के बड़े नेता थे, लेकिन उनकी वैचारिक प्राथमिकताओं में अंतर था। नेहरू आधुनिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समाजवादी आर्थिक व्यवस्था की ओर अधिक झुके हुए थे, जबकि राजेंद्र प्रसाद भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक जीवन की जड़ों से अधिक गहराई से जुड़े हुए थे।
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ा प्रसंग हो या राष्ट्रपति पद की संवैधानिक भूमिका से संबंधित प्रश्न, दोनों के बीच मतभेदों ने स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित किया। पर यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्तिगत मतभेदों के बावजूद लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा को बनाए रखने का प्रयास किया गया।
आज जब राजनीतिक असहमति कई बार व्यक्तिगत कटुता में बदल जाती है, तब राजेंद्र प्रसाद का जीवन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेद को मनभेद बनने से रोकना राजनीतिक संस्कार की पहचान है। राजेंद्र प्रसाद की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सादगी थी, लेकिन उनकी सादगी को केवल व्यक्तिगत गुण मानना पर्याप्त नहीं होगा। उनके लिए सादगी एक जीवन-दृष्टि थी। राष्ट्रपति भवन की भव्यता भी उनके भीतर के उस सरल भारतीय को बदल नहीं सकी, जो जनता की पीड़ा और देश की मिट्टी से जुड़ा हुआ था।
यही कारण है कि आज स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह अपने वर्तमान से सवाल करने का अवसर भी है।
स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?
क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति ही स्वतंत्रता है? या स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि देश का प्रत्येक नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सके? क्या लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित है? या लोकतंत्र का अर्थ संस्थाओं का सम्मान, असहमति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और नागरिक जिम्मेदारी भी है? राजेंद्र प्रसाद का जीवन इन प्रश्नों के उत्तर खोजने में हमारी सहायता करता है।
उनकी दृष्टि में राष्ट्र केवल सत्ता और शासन का ढांचा नहीं था। राष्ट्र मनुष्यों से बनता है और मनुष्यों के बीच विश्वास, सहयोग तथा जिम्मेदारी से मजबूत होता है। वे जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब वह सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी परिवर्तन लाएगी।
आज भारत एक विशाल और सशक्त लोकतंत्र के रूप में विश्व के सामने खड़ा है। विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव के अनेक क्षेत्रों में देश ने लंबी यात्रा तय की है। लेकिन स्वतंत्रता दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण कभी पूरा होने वाली प्रक्रिया नहीं है। हर पीढ़ी को स्वतंत्रता के अर्थ को अपने समय के संदर्भ में फिर से परिभाषित करना पड़ता है।
राजेंद्र प्रसाद की प्रासंगिकता इसी बिंदु पर सबसे अधिक दिखाई देती है।वे हमें बताते हैं कि राष्ट्रसेवा केवल बड़े पदों पर बैठकर नहीं होती। ईमानदार श्रम, सामाजिक संवेदना, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, संविधान के प्रति निष्ठा और अपने कर्तव्यों के प्रति सजगता भी राष्ट्र सेवा है।
उनका जीवन यह भी सिखाता है कि सत्ता व्यक्ति को महान नहीं बनाती; व्यक्ति अपने चरित्र और कर्म से पद को महान बनाता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राष्ट्रपति भवन ने राजेंद्र प्रसाद को प्रतिष्ठा नहीं दी; राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पद की प्रतिष्ठा बढ़ाई।
1962 में उन्हें "भारत रत्न" से सम्मानित किया गया। यह उस व्यक्तित्व की राष्ट्रीय मान्यता थी जिसे जनता बहुत पहले ही ‘देशरत्न’ के रूप में स्वीकार कर चुकी थी। 28 फरवरी 1963 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनके जीवन की विरासत भारतीय लोकतंत्र की स्मृति में आज भी जीवित है।
स्वतंत्रता दिवस पर जब तिरंगा आकाश में लहराता है, तब उसमें केवल 1947 की विजय का रंग नहीं होता। उसमें उन लाखों ज्ञात-अज्ञात लोगों के सपने भी होते हैं जिन्होंने स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी। राजेंद्र प्रसाद उन सपनों के ऐसे प्रतिनिधि हैं जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई भी लड़ी और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र की संस्थाओं को आकार देने में भी योगदान दिया।
इसलिए 15 अगस्त को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को याद करना महज एक महान व्यक्ति को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस राजनीतिक और नैतिक परंपरा को याद करना है जिसमें सार्वजनिक जीवन सेवा था, सत्ता जिम्मेदारी थी, असहमति लोकतंत्र का हिस्सा थी और राष्ट्र व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर था।
आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाएं, तो राजेंद्र बाबू की स्मृति के साथ अपने भीतर भी एक प्रश्न जगाएँ—जिस स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया, क्या हम उसकी गरिमा को अपने आचरण में बचाए हुए हैं?यदि इस प्रश्न का उत्तर खोजने की ईमानदार कोशिश हम कर सकें, तो स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव नहीं रहेगा; वह आत्ममंथन और संकल्प का दिन बन जाएगा।
और शायद यही डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।स्वतंत्रता को केवल अधिकार के रूप में नहीं, जिम्मेदारी के रूप में जीना और भारत को केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं, एक साझा नैतिक संकल्प के रूप में देखना।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

