बिहार में जातीय समीकरण साधने वाले विनोद तावड़े को अब यूपी की कमान, भाजपा ने 2027 के लिए चला बड़ा दांव

बिहार में जातीय समीकरण साधने वाले विनोद तावड़े को अब यूपी की कमान, भाजपा ने 2027 के लिए चला बड़ा दांव

प्रेषित समय :20:24:46 PM / Tue, Aug 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

लखनऊ. बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति को जमीन तक पहुंचाने और जातीय समीकरणों को समझने में अहम भूमिका निभाने वाले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े को अब उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई है. भाजपा ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के लिए नए राज्य प्रभारी नियुक्त किए हैं. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है, जबकि गुजरात के पूर्व विधायक जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है. 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में तावड़े की नियुक्ति को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्य में अगले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की बड़ी चुनौती है. पार्टी पहले ही अपने प्रदेश संगठन में बदलाव कर चुकी है और पिछड़े वर्गों, दलितों तथा विभिन्न सवर्ण समूहों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. ऐसे समय में बिहार के चुनाव में जातीय समीकरणों का अध्ययन करने और बूथ स्तर तक राजनीतिक रणनीति तैयार करने के अनुभव वाले तावड़े को उत्तर प्रदेश की कमान देना भाजपा की चुनावी तैयारी में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. 

विनोद तावड़े का राजनीतिक सफर महाराष्ट्र की राजनीति से शुरू हुआ. उनका जन्म 20 जुलाई 1963 को मुंबई में हुआ था. उन्होंने पुणे के ज्ञानेश्वर विद्यापीठ से इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई की. वर्ष 2002 में वह महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य बने और 2014 तक एमएलसी रहे. इससे पहले वह भाजपा की महाराष्ट्र इकाई में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभा चुके थे. वर्ष 1995 में उन्हें महाराष्ट्र भाजपा का महासचिव बनाया गया था और वह करीब चार वर्ष तक इस पद पर रहे. इसके बाद 1999 में वह मुंबई भाजपा के अध्यक्ष बने. वर्ष 2002 में उन्हें दोबारा महाराष्ट्र भाजपा का महासचिव बनाया गया और 2014 तक वह संगठन में इस जिम्मेदारी से जुड़े रहे. 

2014 में तावड़े पहली बार बोरीवली विधानसभा सीट से विधायक चुने गए. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बनी सरकार में उन्हें कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली. वह चिकित्सा शिक्षा, स्कूली शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण, सांस्कृतिक मामलों तथा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा जैसे विभागों के मंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर काम किया. बाद में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ी और 2022 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया.

तावड़े को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता है. 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने संगठन में अपनी भूमिका जारी रखी और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं. पार्टी के भीतर उनके बारे में यह धारणा बनी कि वह चुनावी राज्यों में संगठन, सामाजिक समीकरण और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल बनाने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. बिहार में उनकी भूमिका ने इस छवि को और मजबूत किया.

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान तावड़े को भाजपा का चुनाव प्रभारी पर्यवेक्षक बनाया गया था. पार्टी नेतृत्व ने उन्हें राज्य के बदलते जातीय समीकरणों का अध्ययन करने की जिम्मेदारी भी दी थी. तावड़े ने चुनाव से पहले करीब तीन महीने तक बिहार का दौरा किया और विभिन्न जातीय एवं सामुदायिक समूहों के प्रमुख लोगों के साथ बैठकें कीं. उनका जोर केवल पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को समझने पर नहीं, बल्कि गांव और स्थानीय स्तर पर बदलते सामाजिक समीकरणों को समझने पर था. 

तावड़े ने बिहार की जातीय राजनीति का अध्ययन पुराने चुनाव परिणामों और सामाजिक बदलावों के संदर्भ में किया था. उनके अनुसार 1952 और 1957 के चुनावों में जाति की भूमिका उतनी निर्णायक नहीं थी, लेकिन 1960 के दशक के बाद जातीय निष्ठा ने राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण स्थान बनाना शुरू किया. उन्होंने वरिष्ठ नेताओं और उन लोगों से भी चर्चा की, जिन्होंने राम मनोहर लोहिया के दौर के जाति-विरोधी आंदोलनों और उसके बाद बिहार में उभरे जातीय नेतृत्व को करीब से देखा था. इस अध्ययन के आधार पर भाजपा ने सामाजिक समूहों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम किया. 

हालांकि तावड़े का कहना रहा कि भाजपा जाति के नाम पर वोट मांगने की रणनीति में विश्वास नहीं करती. उनका जोर इस बात पर रहा कि जातीय समीकरणों को समझना जरूरी है, लेकिन चुनावी रणनीति को केवल जाति तक सीमित नहीं किया जा सकता. बिहार में उन्होंने जातीय समुदायों के प्रमुख लोगों से मुलाकात के साथ-साथ सरकार की योजनाओं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशासनिक छवि को भी चुनावी रणनीति का हिस्सा माना. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की और भाजपा राज्य की 243 सदस्यीय विधानसभा में 89 सीटों के साथ पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

बिहार में तावड़े की भूमिका केवल जातीय समीकरणों के अध्ययन तक सीमित नहीं रही. उन्हें जनवरी 2024 में नीतीश कुमार के दोबारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए में लौटने के लिए बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला नेता भी माना गया. बिहार में भाजपा, जनता दल यूनाइटेड और सहयोगी दलों के बीच तालमेल बनाए रखना चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा था. चुनाव परिणामों के बाद भाजपा के भीतर तावड़े की भूमिका को लेकर चर्चा और बढ़ी. 

अब यही अनुभव उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए उपयोगी साबित हो सकता है. उत्तर प्रदेश की राजनीति बिहार की तरह ही जातीय और सामाजिक समीकरणों से प्रभावित होती है, लेकिन यहां राजनीतिक भूगोल और सामाजिक संरचना कहीं अधिक व्यापक है. भाजपा के सामने 2027 में सत्ता बरकरार रखने की चुनौती होगी. पार्टी को एक ओर योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर सकारात्मक माहौल बनाए रखना होगा, वहीं दूसरी ओर विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक संतुलन को लेकर उठने वाले सवालों का भी सामना करना होगा.

तावड़े इससे पहले भी उत्तर प्रदेश में सक्रिय रह चुके हैं. इस वर्ष उन्होंने लखनऊ का दौरा किया था और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ बंद कमरे में बैठक की थी. उन्होंने राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों, प्रदेश संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और पूर्व प्रदेश अध्यक्षों से भी मुलाकात की थी. इन बैठकों के दौरान मंत्रिमंडल विस्तार, संगठन में बदलाव और विभिन्न निगमों तथा आयोगों में रिक्त पदों पर नियुक्तियों को लेकर फीडबैक लिया गया था.

तावड़े ने उस दौरे के दौरान उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय राजनीतिक स्थिति को समझने की भी कोशिश की थी. उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण माना गया था. पार्टी के भीतर इस बात पर भी चर्चा थी कि मंत्रिमंडल विस्तार और संगठनात्मक बदलाव में जातीय तथा क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखा जाए. उत्तर प्रदेश भाजपा के संगठन में जून 2026 में किए गए बदलावों में भी गैर-यादव पिछड़े वर्गों, दलितों और विभिन्न सवर्ण समूहों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दिखाई दिया था. 

उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए जातीय समीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी को राज्य में अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा. इसके बाद संगठन ने दलित और पिछड़े वर्गों के बीच संपर्क बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय संतुलन पर भी जोर दिया. पार्टी के भीतर यह समझ बनी है कि 2027 का मुकाबला केवल संगठनात्मक मजबूती से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक गठजोड़ के आधार पर भी तय होगा. ऐसे में बिहार में तावड़े के अनुभव को उत्तर प्रदेश की रणनीति में इस्तेमाल किया जाना स्वाभाविक माना जा रहा है.

हालांकि उत्तर प्रदेश की चुनौती बिहार से अलग है. यहां भाजपा के सामने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी सहित विभिन्न राजनीतिक ताकतों की मौजूदगी है. जातीय समूहों के साथ-साथ क्षेत्रीय मुद्दे, बेरोजगारी, किसान, कानून-व्यवस्था, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दे भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए तावड़े के सामने केवल जातीय गणित तैयार करने की नहीं, बल्कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाते हुए अलग-अलग क्षेत्रों की राजनीतिक प्राथमिकताओं को समझने की चुनौती होगी.

भाजपा की ओर से तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के बाद अब उनकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. बिहार में उन्होंने जिस तरह चुनावी आंकड़ों, जातीय समीकरणों और स्थानीय संपर्क को रणनीति से जोड़ा, उसी मॉडल को उत्तर प्रदेश में कितना लागू किया जा सकता है, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा. पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह सामाजिक समीकरणों को साधते हुए अपने मौजूदा संगठनात्मक आधार को मजबूत बनाए रखे.

2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन भाजपा ने तैयारियां तेज कर दी हैं. संगठन में बदलाव, सामाजिक प्रतिनिधित्व और अब तावड़े को उत्तर प्रदेश की कमान दिया जाना इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा है. बिहार में चुनावी रणनीति को सफलता तक पहुंचाने के बाद अब तावड़े के सामने देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य उत्तर प्रदेश की चुनौती है. उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह बिहार के अनुभव को उत्तर प्रदेश की अलग सामाजिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप किस तरह ढाल पाते हैं. 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-