अवैध संबंधों के सबूतों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण आदेश निरस्त किया, पति ने लगाए थे आरोप

अवैध संबंधों के सबूतों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण आदेश निरस्त किया, पति ने लगाए थे आरोप

प्रेषित समय :16:24:54 PM / Tue, Aug 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. दिल्ली निवासी एक युवक की शादी छतरपुर की युवती से हुई थी. पति ने पत्नी पर कई पुरुषों से अवैध संबंध होने का आरोप लगाया था. इसी आधार पर उसने पत्नी के कथित संबंधों से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, सीडी और उनके ट्रांसक्रिप्ट छतरपुर फैमिली कोर्ट में पेश किए थे. पति का कहना था कि ऐसी परिस्थितियों में वह पत्नी के साथ नहीं रह सकता. हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इन साक्ष्यों पर पर्याप्त विचार किए बिना पत्नी को हर महीने 6 हजार रुपए भरण-पोषण देने का आदेश दिया था.

पति ने फैमिली कोर्ट के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी. सोमवार को जस्टिस डीडी बंसल की कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि पति ने पत्नी के कई पुरुषों के साथ अवैध संबंध होने का दावा करते हुए साक्ष्य पेश किए हैं. ऐसे में भरण-पोषण के अधिकार पर फैसला लेने से पहले इन साक्ष्यों की जांच जरूरी है.

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि फैमिली कोर्ट ने पति की ओर से पेश इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, सीडी और उनके ट्रांसक्रिप्ट पर पर्याप्त गंभीरता से विचार नहीं किया. कोर्ट ने मामले को नए सिरे से विचार के लिए फैमिली कोर्ट वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि पहले पति की ओर से पेश साक्ष्यों की सत्यता, प्रासंगिकता और स्वीकार्यता पर विचार किया जाए. इसके बाद दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देकर भरण-पोषण के संबंध में नया आदेश पारित किया जाए. गौरतलब है कि नई दिल्ली निवासी योगेश (बदला हुआ नाम) ने छतरपुर निवासी अपनी पत्नी प्रीति (बदला हुआ नाम) के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की थी.

छतरपुर फैमिली कोर्ट ने 24 जनवरी 2018 को पत्नी को भरण-पोषण के लिए हर महीने 6 हजार रुपए देने का आदेश दिया था. पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी. उसका आरोप था कि पत्नी के कई पुरुषों के साथ अवैध संबंध हैं और इस आधार पर वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है. पति के मुताबिक, उसने पत्नी के कथित व्यभिचार को साबित करने के लिए फैमिली कोर्ट में सीडी, ट्रांसक्रिप्ट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश किए थे, लेकिन इन पर उचित विचार किए बिना भरण-पोषण का आदेश पारित कर दिया गया.

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता परमानंद साहू ने हाईकोर्ट में पक्ष रखा. हाईकोर्ट ने फैसले में सीआरपीसी की धारा 125(4) का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यभिचार भरण-पोषण से इनकार का वैधानिक आधार हो सकता है. इसलिए इस आरोप से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को उनकी सत्यता और प्रासंगिकता की जांच किए बिना सीधे खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने शुरुआत में सीडी को सेकेंडरी एविडेंस के रूप में स्वीकार किया था, लेकिन बाद में पर्याप्त कानूनी आधार बताए बिना उसे एग्जिबिट के रूप में लेने से रोक दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को भी इन साक्ष्यों का खंडन करने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए था.

केस दोबारा फैमिली कोर्ट भेजा-

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण संबंधी आदेश निरस्त करते हुए मामला नए सिरे से विचार के लिए छतरपुर भेज दिया. फैमिली कोर्ट को निर्देश दिए गए हैं कि वह सीडी, उसके ट्रांसक्रिप्ट और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्याय दृष्टांतों के आधार पर नए सिरे से विचार करे. इसके बाद दोनों पक्षों को सुनकर भरण-पोषण के संबंध में नया आदेश पारित किया जाए. दोनों पक्षों को 16 सितंबर 2026 को छतरपुर फैमिली कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं.

नए आदेश तक 6 हजार रुपए देना होगा-

हाईकोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट के नए सिरे से निर्णय लेने तक योगेश को प्रीति को हर महीने 6 हजार रुपए भरण-पोषण के रूप में देना जारी रखना होगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-