नई दिल्ली. भारत में सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में अब एक ऐसा बदलाव सामने आ रहा है, जो देश की बिजली व्यवस्था की दिशा बदल सकता है. अब नवीकरणीय ऊर्जा केवल दिन में उपलब्ध होने वाली सस्ती बिजली का स्रोत नहीं रहेगी, बल्कि बैटरी स्टोरेज के सहारे इसे कोयले से बनने वाली बिजली की तरह लगातार और भरोसेमंद आपूर्ति के विकल्प के रूप में विकसित किया जा सकता है. सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) की 1,000 मेगावाट की राउंड-द-क्लॉक रिन्यूएबल एनर्जी नीलामी और उसके आधार पर किए गए एक नए अध्ययन ने इस संभावना को मजबूत किया है. इस नीलामी में बिजली की दर करीब ₹5.25 प्रति यूनिट तय हुई है और यह कीमत 25 साल तक नाममात्र रूप से स्थिर रहने वाली है.
इसका सीधा अर्थ यह है कि बिजली खरीदने वाली कंपनियों को लंबे समय तक ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा. पारंपरिक बिजली उत्पादन में कोयला, गैस और अन्य ईंधनों की कीमतों में बदलाव का असर बिजली की लागत पर पड़ सकता है, लेकिन सौर ऊर्जा और बैटरी आधारित व्यवस्था में एक बार परियोजना स्थापित होने के बाद उत्पादन लागत अपेक्षाकृत स्थिर रहती है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले स्थित India Energy & Climate Center (IECC) के नए अध्ययन में इसी मॉडल की आर्थिक और तकनीकी संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है. अध्ययन का शीर्षक ‘India’s Renewable Energy Breakthrough: Coal-Like Reliability at a Lower, Fixed Price’ है.
SECI की यह नीलामी सामान्य सौर ऊर्जा खरीद की व्यवस्था से अलग थी. इसमें केवल यह नहीं देखा गया कि दिन में कितनी बिजली पैदा की जा सकती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया कि जब बिजली की मांग सबसे ज्यादा हो, तब आपूर्ति उपलब्ध रहे. बिजली की मांग आमतौर पर शाम, रात और सुबह के समय बढ़ती है. इसी वजह से परियोजनाओं में बिजली उपलब्ध कराने की शर्तों को इस तरह तैयार किया गया कि नवीकरणीय ऊर्जा को जरूरत के समय इस्तेमाल किया जा सके. उत्पादकों को खरीदार द्वारा निर्धारित छह पीक घंटों में कम से कम 90 प्रतिशत क्षमता उपलब्ध करानी होगी. वहीं सूरज न होने वाले बाकी घंटों में कम से कम 70 प्रतिशत और दिन के सौर घंटों में 50 से 60 प्रतिशत क्षमता उपलब्ध रखने की शर्त है.
इस व्यवस्था में बिजली की आपूर्ति की निगरानी भी बेहद सख्त रखी गई है. प्रत्येक 15 मिनट के ब्लॉक में प्रदर्शन की जांच की जाएगी. यदि निर्धारित क्षमता के मुकाबले बिजली की आपूर्ति में कमी रहती है तो कॉन्ट्रैक्ट कीमत की 1.5 गुना दर से जुड़ा जुर्माना लगाया जा सकता है. इससे परियोजना संचालकों के लिए केवल सोलर पैनल स्थापित करना पर्याप्त नहीं रहेगा. उन्हें उस समय भी बिजली उपलब्ध करानी होगी जब सूर्य की रोशनी नहीं होगी. यही वह बिंदु है जहां बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है.
IECC के अध्ययन में भारत के 10 राज्यों के 10 वर्षों के हर घंटे के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. अध्ययन में यह पता लगाने की कोशिश की गई कि अलग-अलग राज्यों में चौबीसों घंटे भरोसेमंद नवीकरणीय बिजली उपलब्ध कराने के लिए सौर क्षमता और बैटरी स्टोरेज का कितना संयोजन सबसे कम लागत वाला हो सकता है. अध्ययन के अनुसार राजस्थान जैसे बेहतर सौर संसाधन वाले क्षेत्रों में 1,000 मेगावाट की ऐसी बिजली आपूर्ति के लिए करीब 3,000 मेगावाट सौर क्षमता और लगभग 12 गीगावाट-घंटे बैटरी स्टोरेज सबसे कम लागत वाला मॉडल हो सकता है.
जिन राज्यों में सौर संसाधन अपेक्षाकृत कम हैं या जहां मानसून के कारण सौर उत्पादन पर अधिक असर पड़ता है, वहां सौर क्षमता की आवश्यकता करीब 15 से 20 प्रतिशत अधिक हो सकती है. हालांकि ऐसे क्षेत्रों में भी बैटरी स्टोरेज की जरूरत लगभग 12 गीगावाट-घंटे के आसपास रह सकती है. इसका मतलब है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में परियोजनाओं का आकार मौसम और सौर संसाधनों के अनुसार बदल सकता है, लेकिन ऊर्जा भंडारण इस पूरे मॉडल का केंद्रीय हिस्सा बना रहेगा.
IECC के निदेशक और अध्ययन के मुख्य लेखक उमेद पालिवाल के मुताबिक भारत की भौगोलिक स्थिति इस व्यवस्था के लिए अनुकूल है. भारत भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब स्थित है, जिसके कारण वर्षभर सौर ऊर्जा उत्पादन में मौसमी अंतर यूरोप जैसे ऊंचे अक्षांश वाले देशों की तुलना में कम रहता है. भारत की सबसे बड़ी चुनौती दिन के समय उपलब्ध होने वाली बड़ी मात्रा में सौर बिजली को शाम और रात के घंटों तक पहुंचाने की है. बैटरी की लागत लगातार कम होने की स्थिति में यही तकनीक इस समस्या का प्रभावी समाधान बन सकती है.
नीलामी में सामने आई ₹5.25 प्रति यूनिट की कीमत भी इस पूरे बदलाव को महत्वपूर्ण बनाती है. इस प्रक्रिया में 16 कंपनियों ने बोली लगाई, जबकि सात डेवलपरों को क्षमता आवंटित की गई. खास बात यह रही कि विजेता बोलियां लगभग एक पैसे के दायरे में रहीं और करीब ₹5.25 से ₹5.26 प्रति यूनिट के आसपास थीं. IECC के सह-निदेशक और अध्ययन के सह-लेखक निकित अभ्यंकर के मुताबिक अलग-अलग कंपनियों का लगभग एक समान कीमत पर बोली लगाना संकेत देता है कि ₹5.25 की दर को केवल किसी एक कंपनी की आक्रामक बोली के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह भारत में भरोसेमंद नवीकरणीय बिजली की संभावित बाजार दर का संकेत हो सकती है.
25 साल तक नाममात्र रूप से कीमत स्थिर रहने का एक और बड़ा फायदा है. महंगाई को ध्यान में रखा जाए तो समय बीतने के साथ इस बिजली की वास्तविक कीमत और कम होती जाएगी. इसका अर्थ यह है कि परियोजना की शुरुआत में तय की गई दर लंबे समय में बिजली खरीदने वाली कंपनियों के लिए और अधिक आकर्षक हो सकती है. ऊर्जा की लागत में निश्चितता उन उद्योगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिनका उत्पादन चौबीसों घंटे बिजली पर निर्भर करता है.
डेटा सेंटर, एल्युमिनियम, स्टील और अन्य ऊर्जा-गहन उद्योगों में लगातार बिजली की जरूरत होती है. इन क्षेत्रों में बिजली की थोड़ी देर की कमी भी उत्पादन और संचालन को प्रभावित कर सकती है. ऐसे में ₹5.25 प्रति यूनिट की दर पर 25 साल तक उपलब्ध होने वाली भरोसेमंद और स्वच्छ बिजली इन उद्योगों के लिए बड़ा विकल्प बन सकती है. IECC के फैकल्टी निदेशक और अध्ययन के सह-लेखक अमोल फड़के के अनुसार प्रतिस्पर्धी कीमत, भरोसेमंद आपूर्ति और लंबे समय तक कीमत की निश्चितता भारत के विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ दे सकती है.
भारत ने पिछले डेढ़ दशक में सौर और पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता में तेजी से वृद्धि की है. अब ऊर्जा क्षेत्र के सामने अगली बड़ी चुनौती केवल नई क्षमता जोड़ना नहीं, बल्कि उपलब्ध बिजली को जरूरत के समय उपलब्ध कराना है. दिन में पैदा होने वाली अतिरिक्त सौर बिजली को बैटरी में संग्रहित करके शाम और रात के समय इस्तेमाल करने की क्षमता इस बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है.
SECI की नीलामी ने यह संकेत दिया है कि बैटरी स्टोरेज के साथ नवीकरणीय ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं रह गई है. यह लागत, विश्वसनीयता और दीर्घकालीन मूल्य स्थिरता के लिहाज से पारंपरिक बिजली उत्पादन को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच रही है. यदि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू किया जाता है तो भारत की बिजली व्यवस्था में कोयले पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने का रास्ता भी खुल सकता है. आने वाले वर्षों में सौर पैनल, पवन टर्बाइन और बड़े पैमाने की बैटरी स्टोरेज प्रणालियां मिलकर ऐसी बिजली व्यवस्था तैयार कर सकती हैं, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा केवल तब उपलब्ध न हो जब मौसम अनुकूल हो, बल्कि जरूरत पड़ने पर भी बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हो. SECI की यह नीलामी इसी बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

