इंदौर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने किरायेदार की बेदखली से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि मकान मालिक की वास्तविक और bona fide आवश्यकता स्थापित हो जाने के बाद यह तय करना कि उसके और उसके परिवार के लिए कौन सा शहर सुविधाजनक है, किरायेदार का अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि मकान मालिक और उसके परिवार के सदस्य अपनी जरूरतों के सबसे बेहतर निर्णायक होते हैं. यदि परिवार यह तय करता है कि पढ़ाई, इलाज या अन्य पारिवारिक जरूरतों के लिए किसी विशेष शहर में रहना उनके लिए सुविधाजनक है, तो किरायेदार केवल इस आधार पर उस निर्णय पर सवाल नहीं उठा सकता कि दूसरे शहर में भी यही जरूरत पूरी हो सकती थी.
मामला इंदौर के खजराना क्षेत्र स्थित एक मकान से जुड़ा है. मामले में मकान मालिक ने किरायेदार से परिसर खाली कराने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था. मकान मालिक की ओर से बताया गया कि परिवार को मकान की वास्तविक आवश्यकता है. उसके पति रक्तचाप की समस्या से जूझ रहे हैं और सेवानिवृत्ति के करीब हैं. परिवार के बड़े बेटे की पढ़ाई भी महत्वपूर्ण कारण थी. बेटा कंपनी सेक्रेटरी यानी सीएस का कोर्स कर रहा था और परिवार चाहता था कि वह इंदौर में रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखे. छोटे बेटे के लिए भी 12वीं के बाद इंदौर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराने की योजना बताई गई थी. इन परिस्थितियों को आधार बनाकर मकान खाली कराने की मांग की गई.
मकान मालिक के दावे का किरायेदार ने विरोध किया. उसका कहना था कि मकान का किराया बेहद कम है और वह लंबे समय से नियमित रूप से किराया चुका रहा है. किरायेदार ने यह भी दावा किया कि मकान का मासिक किराया केवल 60 रुपये था. इसके अलावा उसने वर्ष 2009 में मकान को तीन लाख रुपये में खरीदने के लिए कथित समझौते का हवाला देते हुए कहा कि मकान मालिक अब संपत्ति की कीमत बढ़ जाने के कारण बिक्री से पीछे हट रहा है और मकान खाली कराने के लिए वास्तविक आवश्यकता का आधार बनाया जा रहा है.
विवाद में किरायेदार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि मकान मालिक के बेटे के लिए सीएस की पढ़ाई करने के दौरान इंदौर में रहना आवश्यक है, ऐसा साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया है. किरायेदार का कहना था कि यदि कोर्स कहीं और से भी किया जा सकता है तो केवल इंदौर में रहने की इच्छा को मकान की वास्तविक आवश्यकता नहीं माना जा सकता. इसी तर्क को लेकर मामला पहले निचली अदालत और फिर अपीलीय अदालत से होते हुए हाईकोर्ट पहुंचा.
हाईकोर्ट ने किरायेदार के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने माना कि जब यह तथ्य सामने है कि मकान मालिक का बेटा सीएस कोर्स कर रहा है और परिवार यह चाहता है कि वह इंदौर में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करे, तो यह तय करना कि उसके लिए इंदौर में रहना सुविधाजनक है या किसी अन्य शहर में, परिवार का निजी निर्णय है. किरायेदार अदालत के सामने यह शर्त नहीं रख सकता कि मकान मालिक को पहले यह साबित करना होगा कि उसके बेटे की पढ़ाई के लिए केवल इंदौर ही एकमात्र संभव शहर है.
अदालत ने इसी संदर्भ में मकान मालिक और उसके परिवार को अपनी जरूरतों का बेहतर निर्णायक माना. न्यायालय की टिप्पणी का मूल आधार यह था कि वास्तविक आवश्यकता के मामले में अदालत को मकान मालिक की जरूरत की bona fide प्रकृति देखनी होती है, न कि उसकी पसंद को इस हद तक जांचना कि वह किसी दूसरे शहर में क्यों नहीं रह सकता. यानी मकान मालिक ने यदि अपनी जरूरत का विश्वसनीय आधार स्थापित कर दिया है तो किरायेदार उसकी पसंद पर अपनी सुविधा के आधार पर सवाल नहीं उठा सकता.
मामले में पति की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता को भी मकान मालिक की दलील का हिस्सा बनाया गया था. मकान मालिक ने बताया था कि उसके पति रक्तचाप के मरीज हैं और बेहतर चिकित्सा सुविधा तथा पारिवारिक परिस्थितियों के कारण इंदौर में रहना सुविधाजनक है. अदालत ने इस पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया. न्यायालय के मुताबिक यदि परिवार किसी स्थान को बेहतर इलाज या पारिवारिक जरूरतों के लिए उपयुक्त मानता है, तो केवल इस आधार पर उसकी आवश्यकता को काल्पनिक नहीं कहा जा सकता कि दूसरी जगह भी इलाज उपलब्ध हो सकता है.
मकान के किराए को लेकर भी दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग थे. किरायेदार ने जहां 60 रुपये मासिक किराया होने की बात कही, वहीं मकान मालिक ने वर्ष 2003 में मकान को 1100 रुपये मासिक किराए पर दिए जाने की बात कही थी. किराए की राशि को लेकर विवाद के बावजूद अदालत का मुख्य विचार मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता पर रहा. निचली अदालत ने मकान मालिक की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए किरायेदार को मकान खाली करने का आदेश दिया था. किरायेदार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली.
इसके बाद मामला हाईकोर्ट की दूसरी अपील तक पहुंचा. हाईकोर्ट ने निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया. अदालत ने माना कि दोनों अदालतों ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता को सही तरीके से स्वीकार किया है. इसलिए किरायेदार की चुनौती को खारिज कर दिया गया.
मामले में वर्ष 2009 में हुए कथित मौखिक बिक्री समझौते का मुद्दा भी उठा. किरायेदार ने दावा किया था कि मकान को तीन लाख रुपये में बेचने की बात हुई थी और मकान मालिक ने बाद में संपत्ति की कीमत बढ़ने के कारण सौदा पूरा नहीं किया. हालांकि अदालत ने इस पहलू पर यह भी गौर किया कि कथित समझौते के आधार पर किरायेदार ने अब तक specific performance यानी समझौते को लागू कराने के लिए आवश्यक मुकदमा दायर नहीं किया था. इस वजह से केवल कथित बिक्री समझौते के आधार पर मकान मालिक की बेदखली संबंधी मांग को खारिज करने का आधार नहीं बनता.
ट्रायल कोर्ट ने पहले किरायेदार को मकान खाली करने के साथ करीब 1.04 लाख रुपये का बकाया किराया चुकाने का आदेश भी दिया था. प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा. हाईकोर्ट ने भी दोनों अदालतों के निष्कर्षों में ऐसी कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं पाई, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जा सके. इसके साथ ही किरायेदार की दूसरी अपील खारिज कर दी गई.
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की पीठ के इस फैसले में यह महत्वपूर्ण बात सामने आई कि मकान मालिक की bona fide आवश्यकता का आकलन करते समय अदालत को उसकी पारिवारिक परिस्थितियों और वास्तविक जरूरतों को देखना होता है. मकान मालिक को यह साबित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि जिस शहर को उसने चुना है, वही शहर उसके लिए रहने का एकमात्र विकल्प है. यदि परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य वास्तविक जरूरतों के कारण किसी शहर में रहना चाहता है और उस आवश्यकता का आधार विश्वसनीय है, तो किरायेदार उसकी पसंद को चुनौती देकर बेदखली की कार्यवाही को रोक नहीं सकता.
इस फैसले का व्यापक अर्थ यह है कि किरायेदारी विवाद में मकान मालिक की संपत्ति पर उसका अधिकार केवल इसलिए कमजोर नहीं हो जाता कि किरायेदार लंबे समय से वहां रह रहा है या कम किराया दे रहा है. हालांकि हर मामले में बेदखली के लिए लागू कानूनी शर्तों और वास्तविक आवश्यकता को साबित करना जरूरी रहेगा, लेकिन एक बार bona fide आवश्यकता स्थापित हो जाने पर मकान मालिक की व्यक्तिगत और पारिवारिक पसंद में अदालत या किरायेदार अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकते. हाईकोर्ट का यह फैसला इसी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि मकान मालिक के लिए कहां रहना सुविधाजनक है, इसका अंतिम निर्णय उसकी अपनी जरूरतों और पारिवारिक परिस्थितियों से जुड़ा है, किरायेदार की सुविधा से नहीं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

