जबलपुर. एमपी हाईकोर्ट की युगलपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा कि मेरिट सूची में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों के हितों का किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत हनन नहीं किया जा सकता. जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की खंडपीठ ने एकलपीठ के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि ऐसी किसी भी व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जा सकता, जहां अधिक योग्य उम्मीदवार को कम अंक वाले उम्मीदवार की तुलना में निचले या नुकसानदायक स्थान पर रखा जाए.
यह मामला शिक्षक पात्रता परीक्षा 2018 के तहत स्कूल शिक्षा विभाग और आदिवासी कल्याण विभाग में हुई भर्तियों से संबंधित है. अपीलकर्ता रामनाथ शाह व अन्य ने बताया कि उन्होंने अनारक्षित श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे. इसके बावजूद, उन्हें आदिवासी कल्याण विभाग के स्कूल आवंटित कर दिए गए, जबकि उनकी पहली प्राथमिकता स्कूल शिक्षा विभाग थी. अपीलकर्ताओं के अनुसार, 2022 में जारी निर्देशों के तहत पहले से नियुक्त उम्मीदवारों को अगली काउंसलिंग से बाहर कर दिया गया.
इस कारण कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों को स्कूल शिक्षा विभाग में पदस्थापना मिल गई. अपीलकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताते हुए तर्क दिया कि भर्ती विज्ञापन में ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी. राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा कि एक बार आदिवासी कल्याण विभाग में नियुक्ति मिलने के बाद प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, और पुन: मौका देने से पहले से आवंटित पद खाली हो जाते. हालांकि, युगलपीठ ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया. खंडपीठ ने माना कि प्रशासनिक कारणों या विभागीय समायोजन की वजह से उच्च मेरिट वाले अभ्यर्थियों को नुकसान में नहीं धकेला जा सकता.
दोबारा मिलेगा चॉइस फिलिंग का मौका-
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए निर्देश दिया है कि मेरिट के आधार पर उनकी पसंद के अनुसार पदस्थापना पर विचार किया जाए. यदि संबंधित विभाग में पद रिक्त हैं, तो वहां समायोजन किया जाए. यदि वर्तमान में रिक्तियां उपलब्ध नहीं हैं, तो दो महीने के भीतर 'स्कूल चॉइस फिलिंग पॉलिसी' के
Source : palpalindia
ये भी पढ़ें :-

