नई दिल्ली. भारतीय बैडमिंटन के इतिहास में शनिवार का दिन महिला युगल के लिए एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज हो गया, जिसका इंतजार देश को 15 साल से था. ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद की भारतीय जोड़ी ने विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर न केवल देश को गौरवान्वित किया, बल्कि महिला युगल में लंबे समय से चले आ रहे पदक के सूखे को भी खत्म कर दिया. सेमीफाइनल में हार के बावजूद भारतीय जोड़ी की यह उपलब्धि ऐतिहासिक रही. भारत को महिला युगल में इससे पहले 2011 में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने लंदन विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक दिलाया था.
ट्रेसा और गायत्री की इस उपलब्धि की खास बात यह रही कि उन्होंने टूर्नामेंट में किसी बड़े दावेदार के रूप में शुरुआत नहीं की थी. भारतीय जोड़ी बिना वरीयता के कोर्ट पर उतरी थी, लेकिन जैसे-जैसे मुकाबले आगे बढ़े, दोनों का आत्मविश्वास और प्रदर्शन मजबूत होता गया. क्वार्टर फाइनल में उन्होंने चीन की चौथी वरीयता प्राप्त जिया यी फान और झांग शू शियान की जोड़ी को 16-21, 21-15, 21-13 से हराकर सेमीफाइनल में जगह बनाई. करीब 69 मिनट चले इस मुकाबले में भारतीय खिलाड़ियों ने पहला गेम गंवाने के बाद जिस तरह वापसी की, उसने उनकी मानसिक मजबूती का परिचय दिया.
क्वार्टर फाइनल की जीत के साथ ही भारत का पदक पक्का हो गया था. यह केवल ट्रेसा और गायत्री की व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि भारतीय महिला युगल बैडमिंटन के लिए एक लंबे इंतजार का अंत भी था. 2011 के बाद विश्व चैंपियनशिप में महिला युगल का पदक भारत से दूर रहा था. इस दौरान भारतीय बैडमिंटन ने पुरुष एकल और युगल के साथ-साथ महिला एकल में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं, लेकिन विश्व चैंपियनशिप के महिला युगल मंच पर देश को वैसी सफलता नहीं मिली. ट्रेसा और गायत्री ने इस खालीपन को भर दिया.
इस ऐतिहासिक जीत के बाद कोर्ट पर भावनाओं का ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने इस उपलब्धि को और खास बना दिया. जीत के बाद ट्रेसा भावुक होकर कोर्ट पर गिर पड़ीं, जबकि गायत्री ने अपने पिता और भारतीय बैडमिंटन के दिग्गज पुलेला गोपीचंद को गले लगा लिया. वर्षों की मेहनत, चोट, वापसी और बड़े मंच पर खुद को साबित करने की कोशिश के बाद हासिल हुआ यह पदक दोनों खिलाड़ियों के लिए सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष का परिणाम था.
गायत्री के लिए यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह भारतीय बैडमिंटन के दिग्गज पुलेला गोपीचंद की बेटी हैं. उनके पिता का नाम भारतीय बैडमिंटन के सबसे सफल खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों में लिया जाता है. ऐसे में गायत्री के सामने अपने प्रदर्शन से अलग पहचान बनाने की चुनौती भी रही है. उनके प्रशिक्षक बी. सुमीत रेड्डी ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि गोपीचंद की बेटी होने के कारण उन पर अपेक्षाओं का अतिरिक्त दबाव रहा. विश्व चैंपियनशिप का यह पदक इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि गायत्री ने अपने खेल से अपनी अलग पहचान को और मजबूत किया है.
दूसरी ओर ट्रेसा जॉली ने भी इस मुकाम तक पहुंचने के लिए मुश्किल दौर का सामना किया. इस साल प्रशिक्षण के दौरान उन्हें टखने में गंभीर चोट लगी थी. अभ्यास के दौरान गायत्री के पैर पर पैर पड़ने के कारण उनका टखना मुड़ गया था. जांच में लिगामेंट और मांसपेशियों से जुड़ी चोट सामने आई थी. इसके बाद उन्हें प्रतिस्पर्धी बैडमिंटन से कुछ समय दूर रहना पड़ा. चोट से उबरने के बाद दोनों ने इंडोनेशिया ओपन के जरिए वापसी की और फिर अमेरिकी ओपन में हिस्सा लिया. इसी महीने दोनों ने फिलीपींस इंटरनेशनल चैलेंज का खिताब भी जीता था.
इसलिए विश्व चैंपियनशिप का पदक दोनों खिलाड़ियों की उस यात्रा का हिस्सा है, जिसमें उतार-चढ़ाव लगातार आते रहे. चोट के बाद कोर्ट पर वापसी करना, लय हासिल करना और फिर दुनिया की शीर्ष जोड़ियों को चुनौती देना आसान नहीं था. क्वार्टर फाइनल में चीन की मजबूत जोड़ी के खिलाफ पहला गेम हारने के बाद भारतीय खिलाड़ियों ने जिस तरह अगले दोनों गेम अपने नाम किए, उससे उनकी तैयारी और संयम साफ दिखाई दिया.
सेमीफाइनल में भारतीय जोड़ी का सामना चीन की शीर्ष वरीयता प्राप्त लियू शेंग शू और तान निंग से हुआ. मुकाबले में ट्रेसा और गायत्री ने शुरुआत में संघर्ष किया और पहला गेम 21-18 से अपने नाम किया, लेकिन इसके बाद चीनी जोड़ी ने वापसी करते हुए दूसरा गेम 21-13 और तीसरा गेम 21-8 से जीत लिया. इस हार के साथ भारतीय जोड़ी का स्वर्ण या रजत पदक जीतने का सपना भले ही समाप्त हो गया, लेकिन कांस्य पदक पहले ही सुनिश्चित हो चुका था.
सेमीफाइनल की हार के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों का अभियान किसी मायने में कम नहीं हुआ. विश्व चैंपियनशिप जैसे बड़े मंच पर पदक जीतना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है और वह भी तब, जब महिला युगल में भारत को पिछली बार पदक के लिए 2011 तक इंतजार करना पड़ा था. ट्रेसा और गायत्री अब इस स्पर्धा में पदक जीतने वाली भारत की दूसरी महिला युगल जोड़ी बन गई हैं.
इस सफलता ने भारतीय महिला युगल बैडमिंटन को नई उम्मीद भी दी है. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बैडमिंटन में पुरुष युगल और एकल खिलाड़ियों की उपलब्धियों पर ज्यादा चर्चा हुई, लेकिन ट्रेसा और गायत्री ने विश्व मंच पर यह साबित किया कि महिला युगल में भी भारत मजबूत चुनौती पेश कर सकता है. उनकी सफलता आने वाले वर्षों में इस वर्ग के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन सकती है.
दोनों खिलाड़ियों की साझेदारी भी इस सफलता का महत्वपूर्ण आधार रही है. कोर्ट पर एक-दूसरे की कमियों को संभालना, दबाव के क्षणों में संयम बनाए रखना और लंबे मुकाबलों में वापसी करना उनकी जोड़ी की खासियत बनकर सामने आया है. चीन की चौथी वरीयता प्राप्त जोड़ी के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में मिली जीत इसका सबसे बड़ा उदाहरण रही. पहला गेम गंवाने के बाद भारतीय खिलाड़ियों ने मुकाबले की दिशा ही बदल दी और लगातार दो गेम जीतकर इतिहास रच दिया.
भारतीय बैडमिंटन के लिए यह पदक ऐसे समय आया है, जब देश में खेल के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ियों से बड़ी उम्मीदें की जाती हैं. ट्रेसा और गायत्री की सफलता इस बात का संकेत है कि भारत की महिला युगल जोड़ी भी अब विश्व स्तर की शीर्ष टीमों को चुनौती देने की क्षमता रखती है.
2011 में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा के कांस्य के बाद जो इंतजार शुरू हुआ था, वह 15 साल बाद ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद ने खत्म कर दिया. सेमीफाइनल में हार ने भले ही उनके अभियान को स्वर्ण पदक तक पहुंचने से रोक दिया, लेकिन इतिहास में उनका नाम दर्ज हो चुका है. एक तरफ कोर्ट पर संघर्ष के बाद ट्रेसा का भावुक होकर गिर पड़ना और दूसरी ओर गायत्री का पिता पुलेला गोपीचंद को गले लगाना उस पल की भावनात्मक तस्वीर बन गया, जिसमें वर्षों की मेहनत, उम्मीद और सफलता एक साथ दिखाई दी. यह कांस्य पदक भारतीय महिला बैडमिंटन के लिए सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का संकेत भी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

