जबलपुर. परीक्षा की उत्तर पुस्तिका देखकर विद्यार्थी की पहचान हो जाना अब बीते दौर की बात होने जा रही है. नाना देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय ने डिप्लोमा परीक्षाओं के मूल्यांकन की प्रक्रिया को अधिक गोपनीय और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है. नई व्यवस्था में उत्तर पुस्तिका पर परीक्षार्थी का अनुक्रमांक दिखाई नहीं देगा. उसकी जगह एक विशिष्ट बारकोड होगा, जिसके माध्यम से पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित किया जाएगा. इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि कॉपी जांचने वाले शिक्षक के सामने विद्यार्थी की पहचान से जुड़ी कोई सीधी जानकारी नहीं होगी.
विश्वविद्यालय के इस बदलाव को केवल परीक्षा व्यवस्था में तकनीकी परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे मूल्यांकन की निष्पक्षता मजबूत करने की कोशिश के रूप में माना जा रहा है. अभी तक उत्तर पुस्तिका के शुरुआती पृष्ठ पर विद्यार्थी से संबंधित विवरण दर्ज रहता था. इससे मूल्यांकन करने वाले को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह जानकारी मिल सकती थी कि उत्तर पुस्तिका किस परीक्षार्थी या संस्थान से संबंधित है. नई व्यवस्था में इसी संभावना को समाप्त करने का प्रयास किया गया है.
परीक्षा केंद्रों पर उत्तर पुस्तिकाओं की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनका डिजिटल स्कैन किया जाएगा. इसके बाद मूल्यांकन के लिए भेजी जाने वाली प्रतियों पर केवल सांकेतिक पहचान रहेगी. परीक्षक के लिए यह जानना संभव नहीं होगा कि उसके पास पहुंची उत्तर पुस्तिका किस जिले, महाविद्यालय या परीक्षा केंद्र की है. इस व्यवस्था से मूल्यांकन के दौरान किसी विद्यार्थी, शिक्षक अथवा संस्थान के प्रभाव की संभावना को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
इस बदलाव का दायरा भी सीमित नहीं है. प्रदेश के 11 संस्थानों में होने वाली पशुचिकित्सा डिप्लोमा की मुख्य और पूरक परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाएं इस प्रक्रिया से गुजरेंगी. इनमें पांच शासकीय और छह अशासकीय संस्थान शामिल हैं. लगभग चार हजार विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को इस नई प्रणाली में लाया जाएगा. विश्वविद्यालय ने पूरी कोडिंग और डिजिटल स्कैनिंग की जिम्मेदारी एमपी ऑनलाइन को सौंपी है.
मूल्यांकन व्यवस्था में एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है. अब संविदा आधार पर कार्यरत सहायक प्राध्यापक भी निर्धारित नियमों के तहत उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में शामिल हो सकेंगे. पहले कॉपियां जांचने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से नियमित शिक्षकों पर निर्भर थी. परीक्षार्थियों की संख्या अधिक होने और सीमित मूल्यांकनकर्ताओं के कारण परिणाम तैयार करने में समय लग जाता था. नए प्रावधान से मूल्यांकनकर्ताओं की संख्या बढ़ने और काम का विभाजन बेहतर होने की संभावना है.
विश्वविद्यालय का लक्ष्य केवल परीक्षा परिणाम जल्दी जारी करना नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को ऐसी प्रणाली में बदलना है जिसमें परीक्षक और परीक्षार्थी के बीच पहचान की दूरी बनी रहे. तकनीक के इस्तेमाल से मूल्यांकन में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ उत्तर पुस्तिकाओं की गोपनीयता बनाए रखने पर जोर दिया गया है. यदि व्यवस्था अपेक्षित रूप से लागू होती है तो आने वाले सत्रों में परीक्षा मूल्यांकन की प्रक्रिया अधिक सुरक्षित, व्यवस्थित और समयबद्ध दिखाई दे सकती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

