जबलपुर ने करोड़ों की स्वच्छ हवा योजना को बनाया असरदार, पीएम10 में करीब 10 प्रतिशत कमी

जबलपुर ने करोड़ों की स्वच्छ हवा योजना को बनाया असरदार, पीएम10 में करीब 10 प्रतिशत कमी

प्रेषित समय :19:53:26 PM / Wed, Aug 26th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. प्रदेश के सात शहरों में वायु प्रदूषण कम करने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जहां इंदौर, ग्वालियर और देवास में प्रदूषणकारी पीएम10 कणों का स्तर बढ़ गया, वहीं जबलपुर ने इस मोर्चे पर अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम दर्ज किया है. शहर में 2017-18 के मुकाबले 2023-24 में वार्षिक औसत पीएम10 का स्तर 101 से घटकर 91 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रह गया. यानी करीब 9.9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. प्रदूषण नियंत्रण की इस तस्वीर में जबलपुर उन शहरों में शामिल है, जहां सरकारी खर्च के साथ प्रदूषण के आंकड़ों में गिरावट भी दिखाई दी है.

जबलपुर को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 217.81 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी. इसमें से 149.61 करोड़ रुपये का उपयोग किया गया. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शहर में खर्च की गई राशि का असर वायु गुणवत्ता के एक महत्वपूर्ण संकेतक पीएम10 पर दिखाई दिया. हालांकि शहर का मौजूदा वार्षिक औसत अभी भी राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से काफी ऊपर है, लेकिन आधार अवधि की तुलना में करीब 10 प्रतिशत की कमी यह संकेत देती है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए किए गए कुछ उपायों का प्रभाव पड़ा है.

जबलपुर की स्थिति को प्रदेश के दूसरे शहरों के मुकाबले देखें तो अंतर और स्पष्ट होता है. इंदौर में 312.59 करोड़ रुपये जारी हुए और 250.19 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन पीएम10 का स्तर 82 से बढ़कर 99 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हो गया. ग्वालियर में 137.79 करोड़ रुपये जारी और 101.28 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद पीएम10 126 से बढ़कर 136 माइक्रोग्राम हो गया. देवास में 23.68 करोड़ रुपये जारी हुए और 9.70 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन पीएम10 83 से बढ़कर 99 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर पहुंच गया. इसके विपरीत जबलपुर में प्रदूषण के स्तर में गिरावट दर्ज हुई.

प्रदेश में जबलपुर के साथ उज्जैन भी उन शहरों में रहा जहां पीएम10 कम हुआ. उज्जैन में 2017-18 के 93 माइक्रोग्राम की तुलना में 2023-24 में यह स्तर 84 माइक्रोग्राम रह गया. यानी करीब 9.7 प्रतिशत कमी. भोपाल और सागर में स्थिति लगभग स्थिर रही. भोपाल में पीएम10 112 से मामूली बढ़कर 113 और सागर में 73 से बढ़कर 74 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हुआ.

जबलपुर के आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का उद्देश्य केवल योजनाएं बनाना या राशि खर्च करना नहीं, बल्कि शहरों में प्रदूषण के स्तर में वास्तविक कमी लाना है. केंद्र सरकार ने जनवरी 2019 में यह कार्यक्रम शुरू किया था. शुरुआत में 2017 को आधार वर्ष मानकर वर्ष 2024 तक पीएम10 और पीएम2.5 के स्तर में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था. बाद में लक्ष्य को संशोधित कर 2019-20 के आधार वर्ष की तुलना में 2025-26 तक पीएम10 में 40 प्रतिशत तक कमी लाने अथवा वार्षिक राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया.

इस कसौटी पर जबलपुर की उपलब्धि अभी लक्ष्य से काफी दूर है. करीब 10 प्रतिशत की कमी जरूर हुई है, लेकिन 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर का राष्ट्रीय मानक हासिल करने के लिए शहर को अभी लंबा रास्ता तय करना है. यही वजह है कि मौजूदा सुधार को अंतिम उपलब्धि के बजाय आगे की कार्रवाई के लिए आधार माना जाना चाहिए.

जबलपुर में प्रदूषण नियंत्रण की चुनौती मुख्य रूप से सड़क की धूल, बढ़ते यातायात, निर्माण गतिविधियों, खुले में कचरा और जैविक सामग्री जलाने तथा औद्योगिक उत्सर्जन से जुड़ी है. शहर में सड़क किनारे जमा मिट्टी और धूल वाहनों के गुजरने पर हवा में मिलती है. निर्माण स्थलों से निकलने वाली धूल और मलबा भी पीएम10 के स्तर को प्रभावित करता है. इसके अलावा खुले में कचरा जलाने और वाहनों से निकलने वाला धुआं भी वायु गुणवत्ता पर असर डालता है.

ऐसे में 149.61 करोड़ रुपये के उपयोग के बाद प्रदूषण में दर्ज कमी इस बात की ओर संकेत करती है कि स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत किए गए प्रयासों को निरंतर बनाए रखने की जरूरत है. केवल परियोजनाओं पर खर्च करने से स्थायी सुधार नहीं होगा, बल्कि यह देखना भी जरूरी होगा कि जिन क्षेत्रों को प्रदूषण के प्रमुख स्रोत के रूप में चिन्हित किया गया है, वहां नियंत्रण के उपाय वास्तव में कितने प्रभावी हैं.

जबलपुर के लिए अगली चुनौती पीएम10 में हुई करीब 10 प्रतिशत कमी को बनाए रखने के साथ इसे और नीचे लाने की है. शहर में यदि सड़क की धूल नियंत्रित करने, निर्माण स्थलों पर मानकों का पालन कराने, कचरा जलाने पर रोक लगाने और वाहनों के उत्सर्जन की निगरानी को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो प्रदूषण में और कमी की गुंजाइश है. इसके साथ ही औद्योगिक क्षेत्रों में उत्सर्जन की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी.

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में शामिल शहरों के लिए अब केवल राशि के उपयोग का आंकड़ा पर्याप्त नहीं है. असली कसौटी यह है कि खर्च के बाद हवा में प्रदूषणकारी कण कितने कम हुए. जबलपुर में जारी 217.81 करोड़ रुपये में से 149.61 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद पीएम10 का स्तर 101 से 91 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक आना इसी परिणाम आधारित दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण बनाता है.

हालांकि शहर अभी स्वच्छ हवा के लक्ष्य से दूर है, लेकिन प्रदेश के उन शहरों के बीच जबलपुर का प्रदर्शन बेहतर दिखाई देता है जहां करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद पीएम10 का स्तर बढ़ गया. अब निगाह इस बात पर रहेगी कि अगले चरण में जबलपुर प्रशासन और संबंधित विभाग प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों पर कितना प्रभावी नियंत्रण कर पाते हैं और करीब 10 प्रतिशत की कमी को कहीं अधिक ठोस सुधार में बदल पाते हैं. क्योंकि साफ हवा की वास्तविक सफलता बजट खर्च होने में नहीं, बल्कि शहर की हवा में प्रदूषण कम होने में है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-