जीतू कुमारी
लूणकरणसर, राजस्थान
गांव की किसी लड़की के हाथ में किताब दिखाई दे तो इसे बदलाव की तस्वीर माना जाता है. कुछ दशक पहले तक यही तस्वीर अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी. घर से स्कूल तक की दूरी, परिवार की सोच और सामाजिक बंदिशों के बीच लड़कियों का पढ़ने निकलना आसान नहीं था. आज हालात बदले हैं. ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में लड़कियां स्कूल जा रही हैं, 12वीं तक पढ़ रही हैं और कई परिवार अब उन्हें उच्च शिक्षा के लिए गांव से बाहर भेजने के बारे में भी सोचने लगे हैं. लेकिन इस बदलाव की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है. शिक्षा ने लड़कियों के हाथ में किताब तो दे दी, लेकिन क्या उनके हाथ में अपने जीवन का फैसला भी आया है?
यही वह सवाल है, जिस पर गांवों और पूरे समाज को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. क्योंकि लड़की का स्कूल जाना और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार—ये दोनों अलग-अलग बातें हैं. शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा पास करना या प्रमाणपत्र हासिल करना नहीं है. शिक्षा व्यक्ति को अपने बारे में सोचने, सवाल पूछने, सही-गलत को समझने और अपने भविष्य के लिए निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी देती है. यदि लड़की 12वीं तक पढ़ने के बाद भी यह तय नहीं कर सकती कि उसे आगे क्या पढ़ना है, किस क्षेत्र में जाना है या कब विवाह करना है, तो हमें यह पूछना ही होगा कि उसकी शिक्षा कितनी स्वतंत्र है.
राजस्थान के लूणकरणसर ब्लॉक से करीब 20 किलोमीटर दूर कुजटी गांव इस बदलते ग्रामीण समाज की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखता है. करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव में पुरुषों की साक्षरता दर 72 प्रतिशत बताई जाती है, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर करीब 40 प्रतिशत है. यह अंतर बताता है कि लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के मामले में अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है. लेकिन आंकड़ों से आगे एक और बदलाव दिखाई देता है—आज गांव की लड़कियां सवाल पूछ रही हैं. वे केवल यह नहीं पूछ रहीं कि उन्हें स्कूल कब जाना है, बल्कि यह भी पूछ रही हैं कि अपने जीवन के फैसले आखिर वे खुद कब लेंगी?
गांव की 21 वर्षीय कविता, जिनका नाम परिवर्तित किया गया है, इसी बदलती सोच की आवाज हैं. उनका कहना है कि गांव के कई परिवारों में आज भी यह धारणा मौजूद है कि लड़की को ज्यादा पढ़ाने से वह बिगड़ सकती है. परिवारों को यह आशंका रहती है कि पढ़ी-लिखी लड़की आगे चलकर अपनी पसंद से शादी का फैसला कर सकती है और इससे परिवार की कथित इज्जत प्रभावित होगी.
कविता का सवाल बेहद सीधा है—यदि लड़का अपनी पसंद से शादी करता है तो परिवार की इज्जत क्यों नहीं जाती और लड़की अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनती है तो इज्जत का सवाल क्यों खड़ा हो जाता है?
यह सवाल केवल विवाह तक सीमित नहीं है. यह उस सोच पर सवाल है जिसमें अधिकार का पैमाना लड़के और लड़की के लिए अलग-अलग बना दिया गया है. लड़के के लिए अपनी पसंद जीवन का स्वाभाविक अधिकार मानी जाती है, जबकि लड़की की पसंद को अक्सर परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है. आखिर ऐसा क्यों? यदि परिवार बच्चों के अच्छे-बुरे फैसलों की जिम्मेदारी साझा करता है तो सम्मान और प्रतिष्ठा का पूरा बोझ केवल बेटी के कंधों पर क्यों रखा जाता है?
ग्रामीण समाज में बदलाव की गति को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि आज लड़कियों की आकांक्षाएं पहले जैसी नहीं हैं. वे केवल पढ़ना नहीं चाहतीं, बल्कि पढ़ाई के बाद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं. वे करियर के बारे में सोचती हैं, अपने लिए बेहतर जीवन चाहती हैं और अपनी पसंद-नापसंद को लेकर स्पष्ट होना चाहती हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया है. एक पीढ़ी ने स्कूल की चौखट पार की है, दूसरी कॉलेज तक पहुंचने की कोशिश कर रही है और आने वाली पीढ़ी शायद अपने जीवन के फैसलों को लेकर और अधिक मुखर होगी.
लेकिन इस बदलाव को रोकने वाली सबसे बड़ी दीवार कई बार कोई कानून या व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सोच होती है. परिवार सुरक्षा के नाम पर बेटियों पर पाबंदियां लगाता है. कपड़ों से लेकर दोस्तों तक, पढ़ाई से लेकर आने-जाने तक और करियर से लेकर विवाह तक—कई फैसलों में लड़की की इच्छा को अंतिम स्थान दिया जाता है. सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सुरक्षा और नियंत्रण के बीच अंतर समझना भी उतना ही जरूरी है. यदि सुरक्षा के नाम पर लड़की की स्वतंत्रता ही खत्म कर दी जाए तो यह सुरक्षा नहीं, बल्कि उसके अधिकारों की सीमा तय करना बन जाता है.
कविता ने एक और सामाजिक परंपरा पर सवाल उठाया है. उनके गांव में विधवा महिला को शुभ नहीं माना जाता और कई शुभ अवसरों से उसे दूर रखने की सोच आज भी मौजूद है. इसके विपरीत, पत्नी की मृत्यु के बाद पुरुष के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता. सवाल फिर वही है—पति की मृत्यु के बाद महिला अशुभ कैसे हो गई और पत्नी की मृत्यु के बाद पुरुष सामान्य कैसे बना रहा?
किसी व्यक्ति की पहचान उसके जीवनसाथी की मृत्यु से शुभ या अशुभ कैसे तय की जा सकती है? शोक एक मानवीय भावना है, किसी महिला के सामाजिक मूल्य का प्रमाण नहीं. ऐसी परंपराओं पर सवाल उठाना परंपरा का अपमान नहीं है. बल्कि यह पूछना जरूरी है कि जो परंपरा किसी एक वर्ग पर अधिक बोझ डालती है, क्या उसे समय के साथ बदलने की जरूरत नहीं है?
समाज में बदलाव का मतलब यह नहीं कि हर पुरानी परंपरा को एक झटके में समाप्त कर दिया जाए. बदलाव का पहला कदम सवाल करना है. दूसरा कदम जवाब तलाशना है और तीसरा कदम ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें किसी के साथ केवल उसके लिंग के कारण अलग व्यवहार न हो.
लड़कियों को शिक्षा देना निस्संदेह जरूरी है, लेकिन शिक्षा के साथ निर्णय लेने की क्षमता और अधिकार देना उससे भी ज्यादा जरूरी है. उसे यह तय करने का अवसर मिलना चाहिए कि वह आगे क्या पढ़ना चाहती है, किस क्षेत्र में करियर बनाना चाहती है और जीवन में किन रास्तों पर आगे बढ़ना चाहती है. विवाह जैसे फैसलों में उसकी सहमति को औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविक अधिकार माना जाना चाहिए. उसके पहनावे, आवाजाही और सामाजिक जीवन से जुड़े फैसलों में भी उसकी इच्छा और सुरक्षा दोनों का संतुलन जरूरी है.
यहां परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है. बेटी को स्वतंत्र निर्णय लेने देना परिवार से दूरी बनाना नहीं है. इसके उलट, जिस परिवार में बेटी अपनी बात खुलकर कह सकती है, वहां भरोसे का रिश्ता मजबूत होता है. माता-पिता का काम केवल बेटी की रक्षा करना नहीं, बल्कि उसे इतना सक्षम बनाना भी है कि वह सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित कर सके.
कुजटी की कविता का सवाल दरअसल केवल एक लड़की का सवाल नहीं है. यह उन हजारों ग्रामीण लड़कियों की आवाज है जो पढ़ रही हैं, सपने देख रही हैं और अब अपने जीवन को लेकर अपनी बात भी रखना चाहती हैं. यह आवाज हमें बता रही है कि गांव बदल रहा है, लेकिन बदलाव की अगली मंजिल अभी बाकी है.
आज लड़कियां स्कूल तक पहुंच गई हैं. अब उन्हें अपने फैसलों तक पहुंचने का रास्ता भी देना होगा. क्योंकि किसी लड़की को पढ़ाना बदलाव की शुरुआत है, लेकिन उसे अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार देना ही उस बदलाव की असली मंजिल है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

