जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी का बंटवारा तय, चार संभागों तक सिमटा दायरा, उज्जैन को छह संभागों की कमान

जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी का बंटवारा तय, चार संभागों तक सिमटा दायरा, उज्जैन को छह संभागों की कमान

प्रेषित समय :20:44:10 PM / Sun, Aug 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश में मेडिकल यूनिवर्सिटी का विभाजन अब केवल कैबिनेट के फैसले तक सीमित नहीं रहा. राज्यपाल के आदेश के बाद अतिरिक्त सचिव की ओर से राजपत्र में अधिसूचना जारी होने के साथ नई व्यवस्था औपचारिक रूप से सामने आ गई है. इसके तहत जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का अधिकार क्षेत्र अब चार संभागों तक सीमित रहेगा, जबकि उज्जैन में गठित मध्यप्रदेश धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय को छह संभागों की जिम्मेदारी दी गई है. इस बदलाव को केवल प्रशासनिक पुनर्गठन मानने के बजाय इसके आंकड़ों और वित्तीय ढांचे के आधार पर देखें तो जबलपुर के विश्वविद्यालय का आकार पहले की तुलना में काफी छोटा होने जा रहा है. यही कारण है कि इसे जबलपुर की लंबे समय से चली आ रही ‘मेडिकल राजधानी’ की पहचान और महाकौशल के संस्थागत महत्व से जोड़कर देखा जा रहा है.

राजपत्र में सामने आई नई व्यवस्था के अनुसार जबलपुर विश्वविद्यालय के हिस्से में जबलपुर, सागर, रीवा और शहडोल संभाग रहेंगे, जबकि उज्जैन विश्वविद्यालय के अधीन इंदौर, उज्जैन, भोपाल, ग्वालियर, नर्मदापुरम और चंबल संभाग आएंगे. विधानसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान सरकार ने भी स्पष्ट किया था कि नए विश्वविद्यालय का उद्देश्य क्षेत्रफल के लिहाज से प्रशासन को बेहतर बनाना, समय पर परीक्षा और मूल्यांकन कराना तथा परिणाम और विद्यार्थियों के नामांकन की प्रक्रिया को गति देना है.

लेकिन इस पुनर्गठन का दूसरा पक्ष जबलपुर से जुड़ा है. राजपत्र में दिए गए आंकड़ों के अनुसार नई व्यवस्था में उज्जैन विश्वविद्यालय के दायरे में छह संभागों के करीब 70 कॉलेज और लगभग 60 हजार विद्यार्थी होंगे, जबकि जबलपुर के हिस्से में चार संभागों के करीब 15 कॉलेज और लगभग 12 हजार विद्यार्थी रह जाएंगे. यानी भौगोलिक अधिकार क्षेत्र के साथ-साथ संबद्ध संस्थानों और विद्यार्थियों की संख्या में भी बड़ा अंतर पैदा होगा. यही आंकड़ा इस फैसले को सामान्य प्रशासनिक फेरबदल से अलग बनाता है.

जबलपुर की चिंता केवल कॉलेज और विद्यार्थियों की संख्या तक सीमित नहीं है. विश्वविद्यालय के वित्तीय संसाधनों के बंटवारे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. उपलब्ध प्रस्तावित आंकड़ों के अनुसार करीब 110 करोड़ रुपये के बजट में जबलपुर के हिस्से में लगभग 10 करोड़ रुपये आने की बात कही जा रही है. इसी तरह लगभग 250 करोड़ रुपये के रिजर्व फंड के विभाजन में करीब 200 करोड़ रुपये उज्जैन और 50 करोड़ रुपये जबलपुर को मिलने का प्रस्ताव सामने आया है. यदि ये आंकड़े अंतिम वित्तीय व्यवस्था में भी कायम रहते हैं तो छोटे अधिकार क्षेत्र के साथ जबलपुर विश्वविद्यालय को संसाधनों के स्तर पर भी सीमित आधार से काम करना होगा.

यही वह बिंदु है जहां इस फैसले का व्यापक विश्लेषण जरूरी हो जाता है. विश्वविद्यालय का आकार छोटा होना अपने आप में उसकी गुणवत्ता कम होने का प्रमाण नहीं है. सरकार का तर्क है कि छोटे क्षेत्र में प्रशासन अधिक केंद्रित होगा और विद्यार्थियों को परीक्षा, मूल्यांकन तथा परिणाम के लिए कम इंतजार करना पड़ेगा. विधानसभा में उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने भी कहा था कि चिकित्सा शिक्षा तेजी से विस्तार कर रही है और नए विश्वविद्यालय का उद्देश्य समयबद्ध परीक्षा, मूल्यांकन, परिणाम और नामांकन के साथ शोध तथा अन्य व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना है.

दूसरी ओर जबलपुर के लिए सवाल यह है कि क्या छोटा प्रशासनिक क्षेत्र भविष्य में विश्वविद्यालय के विस्तार की क्षमता को सीमित कर देगा. यदि संबद्ध कॉलेजों की संख्या करीब 15 और विद्यार्थियों की संख्या लगभग 12 हजार के आसपास रहती है तथा वित्तीय संसाधन भी कम हो जाते हैं, तो विश्वविद्यालय के सामने नए पाठ्यक्रम, शोध, विशेषज्ञता और अधोसंरचना के विस्तार के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने की चुनौती रहेगी. यही वजह है कि शहर में इसे महाकोशल की शैक्षणिक भूमिका के कमजोर होने के संदर्भ में देखा जा रहा है.

इस विवाद की पृष्ठभूमि भी पुरानी है. विधानसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान जबलपुर पूर्व के विधायक लखन घनघोरिया ने शहर के शैक्षणिक महत्व और पूर्व में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के विभाजन का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि जबलपुर पहले भी संस्थागत विभाजन का असर झेल चुका है. चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि वर्तमान आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय घाटे में नहीं है और उसके पास स्वयं अर्जित राशि तथा बड़ा फंड मौजूद है.

आधिकारिक विधानसभा रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद अब नई व्यवस्था के तहत दो स्वास्थ्य विश्वविद्यालयों का ढांचा बनाया जा रहा है. 21 जुलाई को विधानसभा ने मध्यप्रदेश धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय विधेयक, 2026 पारित किया. सरकार ने सदन में कहा कि उज्जैन विश्वविद्यालय में छह संभाग और जबलपुर विश्वविद्यालय में चार संभाग रहेंगे.

इसके बाद नई व्यवस्था को संस्थागत रूप देने की दिशा में भी काम आगे बढ़ा है. 26 अगस्त की कैबिनेट बैठक में उज्जैन स्थित धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय के संचालन के लिए कुल 244 पद स्वीकृत किए गए. इनमें 154 नियमित, एक संविदा और 89 आउटसोर्स पद शामिल हैं. सरकार के अनुसार उज्जैन विश्वविद्यालय के अधीन इंदौर, उज्जैन, भोपाल, ग्वालियर, नर्मदापुरम और चंबल संभाग के 31 जिलों के स्वास्थ्य विज्ञान शिक्षण संस्थानों के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था होगी.

इससे यह भी स्पष्ट है कि उज्जैन को केवल नया नाम या नया मुख्यालय नहीं मिल रहा, बल्कि उसके लिए अलग प्रशासनिक ढांचा और मानव संसाधन तैयार किया जा रहा है. वहीं जबलपुर को मौजूदा विश्वविद्यालय के साथ चार संभागों का दायरा संभालना होगा. सरकार इसे विकेंद्रीकरण और बेहतर प्रशासन के रूप में देख रही है, लेकिन जबलपुर में इसे संस्थागत प्रभाव के घटने के रूप में देखा जा रहा है.

शहर के लिए यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चिकित्सा शिक्षा जबलपुर की पहचान का प्रमुख आधार रही है. मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, शोध संस्थान और चिकित्सा शिक्षा से जुड़े संस्थानों ने लंबे समय से शहर को महाकोशल क्षेत्र का बड़ा चिकित्सा केंद्र बनाया है. ऐसे में विश्वविद्यालय का अधिकार क्षेत्र घटने का असर केवल प्रशासनिक नक्शे पर नहीं, बल्कि शहर की शैक्षणिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है. हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव तभी सामने आएगा जब नई व्यवस्था पूरी तरह लागू होकर परीक्षा, संबद्धता, बजट, शोध और विद्यार्थियों से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव दिखाई देंगे.

इस बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि उज्जैन को छह संभाग और करीब 70 कॉलेजों का बड़ा दायरा मिल रहा है, तो जबलपुर के चार संभागों वाले विश्वविद्यालय के भविष्य के विस्तार की क्या योजना है. क्या महाकोशल और विंध्य क्षेत्र में नए मेडिकल कॉलेजों की संबद्धता, नए पाठ्यक्रम, शोध केंद्र और विशेषज्ञ चिकित्सा शिक्षा के लिए अलग निवेश होगा या छोटा हुआ विश्वविद्यालय धीरे-धीरे सीमित प्रशासनिक इकाई बनकर रह जाएगा.

यही आशंका अब जबलपुर में सबसे अधिक चर्चा का विषय है. विद्यार्थियों, शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों की नजर सरकार के अगले कदम पर है. मुख्यमंत्री से मांग उठ रही है कि विश्वविद्यालय के छोटे होते आकार की भरपाई के लिए जबलपुर में नए मेडिकल संस्थान, शोध सुविधाएं और पर्याप्त वित्तीय संसाधन विकसित किए जाएं. यदि ऐसा नहीं हुआ तो विभाजन का असर केवल विश्वविद्यालय की सीमा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जबलपुर की उस संस्थागत पहचान पर भी पड़ेगा, जिसे शहर ने दशकों में विकसित किया है.

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है. उज्जैन में नए विश्वविद्यालय को प्रभावी बनाना और साथ ही जबलपुर के विश्वविद्यालय को संसाधनों की कमी के कारण कमजोर होने से बचाना. प्रशासनिक विकेंद्रीकरण तभी सफल माना जाएगा जब इससे दोनों क्षेत्रों की चिकित्सा शिक्षा मजबूत हो. यदि एक विश्वविद्यालय के विस्तार की कीमत दूसरे विश्वविद्यालय के संसाधन और प्रभाव क्षेत्र में कमी बनती है, तो आने वाले वर्षों में यह फैसला केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के क्षेत्रीय शैक्षणिक संतुलन का बड़ा सवाल बन सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-