जानबूझकर तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

जानबूझकर तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रेषित समय :19:35:54 PM / Tue, Sep 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

प्रयागराज. अदालत के सामने जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना केवल किसी मुकदमे की रणनीति नहीं, बल्कि न्याय प्रशासन को प्रभावित करने वाला गंभीर आचरण है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए वकील की पेशेवर जिम्मेदारी की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता की जिम्मेदारी केवल अपने मुवक्किल के हितों तक सीमित नहीं होती. वह अदालत का अधिकारी भी है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायालय के सामने मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और दस्तावेजों को ईमानदारी से रखे.

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने यह टिप्पणी नेहरू विद्यापीठ इंटरमीडिएट कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान की. अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या संबंधित पक्ष और उसके अधिवक्ता ने 2009 में हुए चुनाव को निर्विवाद बताकर ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाया, जिनसे उस चुनाव की वैधता पर ही सवाल खड़े होते थे. सुनवाई के दौरान सामने आए दस्तावेजों और फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने मामले को गंभीरता से देखा.

मामले की शुरुआत उस समय हुई जब 5 मई 2026 को हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक को दो महीने के भीतर कॉलेज की प्रबंध समिति का चुनाव कराने का निर्देश दिया था. उस समय अदालत के सामने दोनों पक्षों की ओर से यह कहा गया था कि वर्ष 2009 में हुए चुनाव में इस्तेमाल की गई मतदाता सूची निर्विवाद है. इसी आधार पर अदालत ने उसी मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने का निर्देश दिया था.

बाद में मामले में प्रतिवादी नंबर छह के रूप में शामिल शिव शंकर सिंह ने पुनर्विचार याचिका दायर की. उन्होंने स्वयं को निर्वाचित प्रबंधक बताते हुए मूल याचिका की प्रक्रिया और उसमें अपने प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाया. उनका कहना था कि उन्होंने किसी अधिवक्ता को अपनी ओर से अदालत में पेश होने के लिए वकालतनामा नहीं दिया था और न ही अपनी ओर से कैविएट दाखिल करने के निर्देश दिए थे. इस दावे के बाद मामले में वकालतनामा और उस पर मौजूद हस्ताक्षर की प्रामाणिकता भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई.

कैविएट अधिवक्ता आरसी द्विवेदी ने दाखिल की थी. उनका पक्ष था कि वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर की पुष्टि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से नहीं की थी, बल्कि उनके क्लर्क ने इसकी प्रक्रिया पूरी की थी. उनके अनुसार संबंधित आवेदक और उसका भतीजा भोला यादव उनके कार्यालय आए थे, हस्ताक्षर किया हुआ वकालतनामा दिया था और 2,500 रुपये फीस भी दी थी. भोला यादव ने शपथपत्र देकर इस दावे का समर्थन किया, लेकिन संबंधित आवेदक की ओर से ऐसा शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया.

चूंकि आवेदक वर्ष 2015 से आरसी द्विवेदी को अपना अधिवक्ता नियुक्त करता रहा था, इसलिए अदालत ने विवादित हस्ताक्षर को विशेषज्ञ जांच के लिए भेज दिया. 27 जुलाई 2026 को फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट सामने आई. रिपोर्ट में कहा गया कि कैविएट के साथ दाखिल वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर नमूना हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते. यही नहीं, वे दो अन्य मामलों में उपलब्ध वकालतनामों और आवेदक के बैंक रिकॉर्ड में दर्ज हस्ताक्षरों से भी मेल नहीं खाते थे. इस रिपोर्ट पर कोई आपत्ति दाखिल नहीं की गई और वह रिकॉर्ड का अंतिम हिस्सा बन गई.

अदालत ने इसके बाद पूरे मामले को केवल हस्ताक्षर के विवाद तक सीमित नहीं रखा. उसने यह भी जांचा कि 2009 के चुनाव को निर्विवाद बताने के पीछे वास्तविक रिकॉर्ड क्या था. इस दौरान सामने आया कि संयुक्त शिक्षा निदेशक ने 16 अप्रैल 2016 के आदेश में वर्ष 2009 के चुनाव को संदिग्ध माना था और नए चुनाव कराने का निर्देश दिया था. इस आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका बाद में सहमति से निष्प्रभावी मानकर खारिज कर दी गई थी.

मामले में एक और महत्वपूर्ण दस्तावेज तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक मालती राय का 23 जुलाई 2016 का पत्र था. उन्होंने संयुक्त शिक्षा निदेशक को लिखकर स्पष्ट किया था कि उन्होंने वर्ष 2009 में ऐसा कोई चुनाव नहीं कराया था, जैसा कि उनके बारे में दावा किया जा रहा था. इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद अदालत ने माना कि 2009 के चुनाव को अंतिम और निर्विवाद चुनाव बताना रिकॉर्ड की पूरी तस्वीर सामने नहीं रखता.

अदालत ने लंबे समय से संबंधित पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता एससी द्विवेदी के संबंध में भी कहा कि वे इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों और घटनाक्रम से अनजान होने का दावा नहीं कर सकते. हाईकोर्ट ने माना कि वकील और उनके मुवक्किल की ओर से 25 अक्टूबर 2009 के चुनाव को अंतिम और निर्विवाद चुनाव बताने में सक्रिय रूप से तथ्य छिपाए गए. अदालत के अनुसार इससे न्याय प्रशासन प्रभावित हुआ.

हालांकि हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया. अदालत ने कहा कि जानबूझकर तथ्य छिपाने और जानकारी के अभाव में गलत तथ्य प्रस्तुत करने को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता. यदि कोई व्यक्ति या अधिवक्ता वास्तविक स्थिति से अनजान होने के कारण गलत तथ्य रखता है या किसी तथ्य की गलत व्याख्या करता है तो वह सक्रिय तथ्य छिपाने के समान नहीं है. लेकिन यदि किसी महत्वपूर्ण तथ्य की जानकारी होने के बावजूद उसे अदालत से छिपाया जाता है और उसके विपरीत स्थिति प्रस्तुत की जाती है, तो यह न्यायालय को गुमराह करने की श्रेणी में आता है.

इसी आधार पर अदालत ने आरसी द्विवेदी के आचरण को अलग माना. कोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने मुवक्किल की ओर से रखे गए दावे को स्वीकार किया था और 2009 के चुनाव को संदिग्ध बताने वाले दस्तावेज उनके सामने रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किए गए थे. इसलिए अदालत ने उनके आचरण को सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने या जानबूझकर झूठ बोलने के रूप में नहीं माना. कार्यालय स्तर पर हुई प्रक्रियात्मक कमियों के लिए उनकी बिना शर्त माफी भी अदालत ने स्वीकार कर ली.

वकालतनामे के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अधिवक्ता की अदालत में पेशी की वैधता एक प्रभावी और वैध वकालतनामे के अस्तित्व पर निर्भर करती है. जिस व्यक्ति की ओर से प्रतिनिधित्व करने का दावा किया जा रहा है, उसकी जानकारी या सहमति के बिना वकालतनामा दाखिल करना अदालत के समक्ष गलत प्रस्तुति की स्थिति पैदा कर सकता है. इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वकालतनामा महज औपचारिक कागज नहीं है, बल्कि वकील और मुवक्किल के बीच न्यायिक प्रतिनिधित्व की वैधानिक कड़ी है.

अदालत ने हालांकि इस मामले को बार काउंसिल के पास भेजने या अवमानना क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने से इनकार किया. इसके बावजूद याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर छह पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया. दोनों को यह राशि एक महीने के भीतर हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा करनी होगी. राशि जमा नहीं करने पर रजिस्ट्रार जनरल को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया है.

हाईकोर्ट ने कैविएट दाखिल करने की मौजूदा प्रक्रिया पर भी गंभीरता से विचार किया. अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम, 1952 के अध्याय 22 के नियम 5 का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल आवेदन देकर बिना सहायक शपथपत्र के कैविएट दाखिल की जा सकती है. अदालत ने माना कि ऐसी प्रक्रिया के दुरुपयोग की संभावना मौजूद है. इसलिए आदेश की प्रति प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि कैविएट आवेदन के साथ आवेदक का शपथपत्र अनिवार्य किए जाने के लिए नियम में संशोधन की संभावना पर विचार किया जा सके.

अंततः हाईकोर्ट ने माना कि वर्ष 2009 का चुनाव निर्विवाद नहीं था. इस निष्कर्ष के बाद अदालत ने 5 मई 2026 के अपने पूर्व आदेश की समीक्षा की और उसे वापस ले लिया. मामले को आगे की सुनवाई के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया.

इस फैसले में अदालत ने एक व्यापक सिद्धांत भी रेखांकित किया है कि न्यायिक प्रक्रिया केवल पक्षकारों के बीच विवाद निपटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि उसकी विश्वसनीयता सही तथ्यों पर भी निर्भर करती है. अधिवक्ता अपने मुवक्किल के हितों की पैरवी करते हुए भी अदालत के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता. महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखना, रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति से अदालत को अवगत कराना और प्रतिनिधित्व की वैधता सुनिश्चित करना इसी पेशेवर दायित्व का हिस्सा है. अदालत ने साफ संकेत दिया है कि न्याय पाने की प्रक्रिया में तथ्य जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण यह ईमानदारी भी है कि कोई पक्ष या उसका प्रतिनिधि जानबूझकर अदालत को अधूरी तस्वीर न दिखाए.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-