वायरल वीडियो पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिना जांच सोशल मीडिया से पूरी सामग्री हटाने का आदेश नहीं

वायरल वीडियो पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिना जांच सोशल मीडिया से पूरी सामग्री हटाने का आदेश नहीं

प्रेषित समय :20:26:04 PM / Wed, Sep 2nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. सोशल मीडिया पर वायरल किसी वीडियो को लेकर उठे विवाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल आरोपों के आधार पर संबंधित सामग्री को हटाने का व्यापक या ब्लैंकेट आदेश नहीं दिया जा सकता. अदालत ने कहा कि पहले यह जांचना जरूरी है कि वीडियो वास्तविक है या उसमें छेड़छाड़ की गई है, वह पूरा है या किसी हिस्से को काटकर प्रसारित किया गया है और पूरे घटनाक्रम का वास्तविक संदर्भ क्या है.

यह मामला भोपाल की एक आवासीय सोसायटी में हुए विवाद से जुड़े उस वीडियो से संबंधित है, जिसमें पूर्व मुख्य सचिव ए.वी. सिंह की बहू पर मंदिर को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया. याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि घटनाक्रम का एक बिना संपादन वाला वीडियो और सोसायटी के सीसीटीवी फुटेज मौजूद हैं, लेकिन बाद में मूल वीडियो के कुछ हिस्सों को काट-छांटकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया. आरोप है कि वीडियो के साथ लगाए गए शीर्षकों और प्रस्तुतिकरण के कारण पूरे विवाद को सांप्रदायिक रंग मिल गया.

जस्टिस हिमांशु जोशी ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इस स्तर पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि वीडियो मानहानिकारक, सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ अथवा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार किया गया है. इन दावों की पुष्टि के लिए मूल वीडियो, उसकी पूर्णता, उसके संदर्भ और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की जांच आवश्यक है. अदालत ने इस जांच की जिम्मेदारी सक्षम जांच एजेंसी पर छोड़ी है.

याचिकाकर्ता का कहना था कि वीडियो वायरल होने के बाद उसे और उसके परिवार को धमकी भरे फोन और संदेश भी मिले. उसने 29 जुलाई से पुलिस अधिकारियों, राज्य साइबर पुलिस और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायतें किए जाने की बात कही. उसके अनुसार 10 अगस्त को पुलिस ने बयान भी दर्ज किया, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई. इसी आधार पर उसने जांच किसी अन्य एजेंसी से कराने और सोशल मीडिया से संबंधित सामग्री हटाने की मांग की थी.

दूसरी ओर अधिकारियों की ओर से दलील दी गई कि मामला विवादित तथ्यों से जुड़ा है और कानून के मुताबिक कार्रवाई की जा रही है. सोशल मीडिया सामग्री को हटाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उसके तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी होने की बात भी अदालत के सामने रखी गई.

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत के दो प्रमुख पहलू हैं—कथित रूप से संपादित वीडियो का प्रसार और उसके बाद सामने आई धमकियां. दोनों की जांच सक्षम एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए. अदालत ने सोशल मीडिया से समस्त संबंधित सामग्री हटाने का व्यापक आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ता को संबंधित वीडियो के विशिष्ट यूआरएल और अन्य आपत्तिजनक सामग्री का विवरण सक्षम प्राधिकारी के समक्ष देने की स्वतंत्रता दी. प्राधिकारी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत शिकायत पर निर्णय ले सकेगा.

एफआईआर की मांग पर भी अदालत ने तत्काल निर्देश देने से इनकार किया. अदालत ने कहा कि पुलिस शिकायत पर विचार करेगी और यदि प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी. केवल आशंका के आधार पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता, विशेषकर तब जब मौजूदा जांच के निष्पक्ष नहीं होने के पर्याप्त आधार सामने न हों.

हालांकि, परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता को अदालत ने गंभीरता से लिया. भोपाल पुलिस आयुक्त को याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर विचार कर खतरे की स्थिति का आकलन करने और आवश्यकता होने पर एहतियाती सुरक्षा उपाय करने का निर्देश दिया गया. इस आदेश का व्यापक संदेश यही है कि सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री को हटाने का सवाल केवल उसके शीर्षक या आरोपों से तय नहीं होगा, बल्कि मूल सामग्री, डिजिटल साक्ष्य, संदर्भ और लागू कानून की जांच के बाद ही कार्रवाई का रास्ता तय होगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-