नवी मुंबई. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित तमिल साहित्यकार एवं राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित प्रसिद्ध तमिल गीतकार मा. श्री वैर मुत्तु के शुभहस्ते अंतरराष्ट्रीय बहुभाषी पत्रिका ‘अनुवाद सृष्टि’ के ‘प्राचार्य श्रीप्रकाश अधिकारी विशेषांक’ का लोकार्पण शनिवार, 29 अगस्त 2026 को कामोठे स्थित मोदक ग्रैंड बैंक्वेट हॉल में संपन्न हुआ. ‘शब्दसृष्टि’ प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित समारोह की अध्यक्षता प्रतिष्ठान के परामर्शदाता, समीक्षक एवं वरिष्ठ अनुवादक प्रा. डॉ. गजानन चव्हाण ने की.
समारोह में ‘शब्दसृष्टि’ के संरक्षक एवं अनुवादक श्री प्रकाश भातम्ब्रेकर, हिंदी फिल्म के संवाद लेखक-निर्देशक पथिक वत्स, वरिष्ठ मराठी लेखक एवं अनुवादक चंद्रकांत भोंजाल तथा हिंदी कवि, समीक्षक एवं पत्रकार राजेश कुमार सिन्हा प्रमुख रूप से उपस्थित थे. विशेषांक ‘शब्दसृष्टि’ द्वारा संचालित ‘डॉ. विजया स्मृति अंतरराष्ट्रीय अनुवाद व अनुसंधान केंद्र’ के मुखपत्र के रूप में प्रकाशित किया गया है. इसमें वरिष्ठ शिक्षक, अनुवादक और साहित्यसेवी प्राचार्य श्रीप्रकाश अधिकारी के व्यक्तित्व एवं अनुवाद-कर्म को केंद्र में रखा गया है.
वैर मुत्तु ने अपने संबोधन में कहा कि यह समारोह केवल एक पत्रिका के विशेषांक के लोकार्पण का अवसर नहीं, बल्कि शब्दों की उस यात्रा का उत्सव है जो एक भाषा से दूसरी भाषा और अंततः एक मनुष्य के हृदय से दूसरे हृदय तक पहुंचती है. उन्होंने कहा कि तमिल ने उन्हें पहला शब्द और साहित्यिक पहचान दी, लेकिन जब उनका साहित्य मराठी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों तक पहुंचता है तो यह उनके लिए विशेष आनंद का विषय है.
उन्होंने अनुवाद को केवल शब्दों का रूपांतरण न मानते हुए ‘आत्मा का प्रत्यारोपण’ बताया. अपने चर्चित उपन्यास ‘कल्लिक्काट्टू इथिहासम’ के मराठी अनुवाद के लिए श्रीप्रकाश अधिकारी की विशेष सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इस कृति में स्थानीय बोली, संस्कृति, वंचित समाज का जीवन, संघर्ष और संवेदनाएं गहराई से समाहित हैं. ऐसे साहित्य का अनुवाद केवल भाषा के ज्ञान से संभव नहीं होता, बल्कि अनुवादक को उस समाज, संस्कृति और जीवन-पद्धति की आत्मा को भी समझना पड़ता है. श्रीप्रकाश अधिकारी ने इस चुनौती को सफलतापूर्वक स्वीकार करते हुए तमिल और मराठी के बीच एक ‘सुवर्ण सेतु’ बनाया है.
वैर मुत्तु ने कहा कि भाषाओं की लिपियां अलग हो सकती हैं, लेकिन मानवीय भावनाओं की लिपि एक ही होती है. प्रेम, पीड़ा, भूख, संघर्ष, स्त्री के सपने और बच्चों की आकांक्षाएं किसी एक भाषा तक सीमित नहीं हैं. उन्होंने भारतीय भाषाओं के बीच अधिकाधिक अनुवाद की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जब भाषाओं का संवाद होता है तो विचारों का संवाद होता है और इससे भारत की सांस्कृतिक एकता और मजबूत होती है.
महनीय वक्ता राजेश कुमार सिन्हा ने कहा कि भारतीय साहित्य परंपरा में अनुवाद केवल भाषायी परिवर्तन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि संस्कृति, संवेदना, विचार और ज्ञान के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण सेतु रहा है. भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में इसकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्होंने ‘अनुवाद सृष्टि’ को भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को मजबूत करने वाला गंभीर और सार्थक प्रयास बताया.
सिन्हा ने कहा कि पत्रिका के प्रत्येक अंक में किसी अनुवादक के व्यक्तित्व और साहित्य को केंद्र में रखने की परंपरा विकसित हो रही है. पहले अंक में डॉ. गजानन चव्हाण, दूसरे में डॉ. रामजी तिवारी और तीसरे अंक में प्राचार्य श्रीप्रकाश अधिकारी को केंद्र बनाया गया है. उन्होंने कहा कि अधिकारी ने मूल तमिल से मराठी तथा मराठी से अंग्रेजी में साहित्य का अनुवाद कर भारतीय भाषाओं के बीच व्यापक साहित्यिक संवाद स्थापित करने का उल्लेखनीय कार्य किया है.
उन्होंने विशेषांक में डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर के संदर्भ को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हिंदी-मराठी साहित्य के पारस्परिक आदान-प्रदान की जिस समृद्ध अनुवाद परंपरा का विकास हुआ है, उसमें अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों और अनुवादकों का योगदान रहा है. श्रीप्रकाश अधिकारी इसी परंपरा की महत्वपूर्ण अगली कड़ी हैं.
सिन्हा के अनुसार, ‘अनुवाद सृष्टि’ का यह अंक व्यक्ति और साहित्य के साथ-साथ अनुवाद, संस्कृति, स्मृति और रचनात्मकता को एक सूत्र में जोड़ता है. कविताओं, कहानियों, उपन्यास-अंशों, सैद्धांतिक लेखों, संस्मरणों, साक्षात्कारों, आलोचनात्मक अध्ययनों, ग्रंथावलोकन और जीवन-वृत्त से समृद्ध यह अंक शोधार्थियों, साहित्यप्रेमियों और अनुवाद के अध्येताओं के लिए उपयोगी दस्तावेज है.
अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. गजानन चव्हाण ने श्रीप्रकाश अधिकारी के व्यक्तित्व और साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला. इस अवसर पर श्रीप्रकाश अधिकारी का डॉ. चव्हाण, श्री प्रकाश भातम्ब्रेकर और पथिक वत्स द्वारा सत्कार किया गया. अधिकारी ने अपने सम्मान और विशेषांक के प्रकाशन के लिए कृतज्ञता व्यक्त की. भातम्ब्रेकर, पथिक वत्स और चंद्रकांत भोंजाल ने भी अपने विचार रखे.
समारोह का प्रास्ताविक ‘शब्दसृष्टि’ के संस्थापक-अध्यक्ष एवं ‘अनुवाद सृष्टि’ के प्रमुख संपादक प्रा. डॉ. मनोहर ने किया. कार्यकारी संपादक डॉ. आशा रानी ने संपादकीय मनोगत व्यक्त किया. संचालन प्राचार्य मुकुंद आंधलकर ने किया, जबकि आभार-प्रदर्शन प्रणव अधिकारी ने किया. समारोह की सफलता में डॉ. अनिल गायकवाड, रवींद्र महाडिक, पूर्णा अधिकारी सहित ‘शब्दसृष्टि’ परिवार और श्रीप्रकाश अधिकारी के परिवार के सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

