भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाएगी. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की जयंती, जन्माष्टमी और कालाष्टमी का विशेष संयोग रहेगा. पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि रात 24:15 बजे तक रहेगी, इसके बाद नवमी तिथि प्रारंभ होगी. दिनभर रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो रात 23:04 बजे तक रहने के बाद मृगशीर्ष नक्षत्र में बदल जाएगा. चंद्रमा वृषभ राशि में रहेंगे. धार्मिक मान्यताओं में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का विशेष महत्व होने के कारण मंदिरों और घरों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारियां की जा रही हैं.
नई दिल्ली के अनुसार तैयार पंचांग में 4 सितंबर को शुक्रवार बताया गया है. इस दिन शक संवत 1948 और विक्रम संवत 2083 रहेगा. मास भाद्रपद यानी भादो का कृष्ण पक्ष चल रहा है. तिथि अष्टमी रात 24:15 बजे तक और उसके बाद नवमी होगी. पंचांग के अनुसार रोहिणी नक्षत्र रात 23:04 बजे तक रहेगा और इसके बाद मृगशीर्ष नक्षत्र शुरू होगा. योग हर्षण दोपहर 15:45 बजे तक रहेगा, जिसके बाद वज्र योग प्रारंभ होगा. करण बालव दोपहर करीब 13:22 बजे तक रहेगा और उसके बाद कौलव करण होगा.
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन चंद्रमा का वृषभ राशि में रहना भी पंचांग की महत्वपूर्ण जानकारी में शामिल है. हिंदू धार्मिक परंपरा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के साथ रोहिणी नक्षत्र का विशेष संबंध माना जाता है. इसी कारण जन्माष्टमी के अवसर पर तिथि और नक्षत्र की स्थिति को श्रद्धालु विशेष महत्व देते हैं. इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं. मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं, बाल गोपाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है और मध्यरात्रि में जन्मोत्सव के बाद पूजा-अर्चना की जाती है.
पंचांग के अनुसार 4 सितंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजे होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 6:39 बजे निर्धारित है. चंद्रोदय रात 23:22 बजे बताया गया है. सूर्यायण दक्षिणायन रहेगा और ऋतु शरद होगी. दिन में अभिजित मुहूर्त 11:55 बजे से 12:45 बजे तक रहेगा. वहीं राहुकाल सुबह 10:45 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक बताया गया है. दिशाशूल पश्चिम दिशा का रहेगा. पंचांग में यमघंटक सूर्योदय से रात 23:05 बजे तक रहने की जानकारी भी दी गई है.
जन्माष्टमी के अवसर पर धार्मिक दृष्टि से व्रत और पूजा की विशेष परंपरा है. श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार दिनभर उपवास रखते हैं. कई स्थानों पर फलाहार किया जाता है, जबकि कुछ श्रद्धालु मध्यरात्रि तक व्रत रखते हैं. भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा के लिए घरों में विशेष तैयारी की जाती है. पूजा स्थल को फूलों और सजावटी सामग्री से सजाया जाता है. बाल गोपाल को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उन्हें झूले में विराजमान कर जन्मोत्सव मनाने की परंपरा भी अनेक स्थानों पर निभाई जाती है.
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी झांकियां भी आकर्षण का केंद्र रहती हैं. मंदिरों में भक्तों की भीड़ जुटती है और श्रीकृष्ण के भजन तथा कीर्तन का आयोजन किया जाता है. रात में जन्म के समय विशेष आरती की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. यही वजह है कि जन्माष्टमी के अवसर पर पंचांग में तिथि और नक्षत्र की स्थिति को लेकर श्रद्धालुओं की विशेष रुचि रहती है.
4 सितंबर के बाद 5 सितंबर 2026 को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि रहेगी. पंचांग के अनुसार नवमी रात 21:55 बजे तक रहेगी और इसके बाद दशमी तिथि शुरू होगी. मृगशीर्ष नक्षत्र रात 21:32 बजे तक रहेगा, जिसके बाद आर्द्रा नक्षत्र प्रारंभ होगा. वज्र योग दोपहर 12:48 बजे तक रहेगा और उसके बाद सिद्धि योग शुरू होगा. करण तैतिल दोपहर 12:06 बजे तक रहेगा. चंद्रमा 5 सितंबर को वृषभ राशि में सुबह 10:17 बजे तक रहेंगे और इसके बाद मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे.
5 सितंबर का दिन भी धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा. इस दिन गोपाल काला और नन्दोत्सव मनाया जाएगा. जन्माष्टमी के अगले दिन नन्दोत्सव की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी से जुड़ी है. मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में विशेष आयोजन किए जाते हैं. कई स्थानों पर प्रसाद वितरण और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं. पंचांग में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस भी दर्ज है, इसलिए इस दिन धार्मिक आयोजन के साथ समाज में शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी रहेगा.
जन्माष्टमी के अवसर पर शहरों से लेकर गांवों तक धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है. मंदिरों में सजावट, भजन-कीर्तन और श्रीकृष्ण की झांकियों के माध्यम से श्रद्धालु जन्मोत्सव में शामिल होते हैं. बाजारों में भी जन्माष्टमी से संबंधित सामग्री की मांग बढ़ जाती है. छोटे बच्चों को कृष्ण और राधा के रूप में सजाने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है. घरों में माखन-मिश्री, फल और अन्य प्रसाद तैयार किए जाते हैं.
इस बार 4 सितंबर की पंचांग स्थिति में अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है. अष्टमी रात तक रहने के कारण जन्माष्टमी व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए तिथि की जानकारी महत्वपूर्ण होगी. पंचांग में दिए गए समय के अनुसार रात 24:15 बजे के बाद नवमी शुरू होगी. हालांकि पूजा और व्रत की विधि अलग-अलग परंपराओं और स्थानीय पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकती है. इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र और परंपरा के अनुसार पूजा का समय तय करने की सलाह दी जाती है.
धार्मिक दृष्टि से जन्माष्टमी केवल एक पर्व नहीं बल्कि भक्ति, आस्था और श्रीकृष्ण के जीवन संदेश को स्मरण करने का अवसर भी है. भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाएं धर्म, कर्म, कर्तव्य और मानव जीवन के विभिन्न पक्षों से संबंधित मानी जाती हैं. जन्माष्टमी पर श्रद्धालु भगवान के बाल स्वरूप की पूजा के साथ उनकी शिक्षाओं को भी याद करते हैं. मंदिरों में होने वाले भजन-कीर्तन और कथा आयोजन इसी आध्यात्मिक वातावरण को और गहरा करते हैं.
4 सितंबर को अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा की स्थिति के साथ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा. इसके अगले दिन 5 सितंबर को नवमी तिथि के साथ नन्दोत्सव और गोपाल काला का आयोजन होगा. इस तरह दो दिनों तक धार्मिक उत्सव का वातावरण बना रहेगा. जन्माष्टमी के लिए पंचांग में दिए गए तिथि, नक्षत्र, योग, करण, सूर्योदय-सूर्यास्त और अन्य समय श्रद्धालुओं के लिए दिन की धार्मिक गतिविधियों की योजना बनाने में उपयोगी रहेंगे. पंचांग में दी गई जानकारी नई दिल्ली के अनुसार है, इसलिए अन्य शहरों में समय में कुछ अंतर संभव है. पूजा, व्रत और जन्मोत्सव के विशेष समय के लिए स्थानीय पंचांग या धार्मिक आचार्य की सलाह लेना उचित रहेगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

