जबलपुर. सड़क हादसे के मामलों में दुर्घटना कैसे हुई, यह तय करने के लिए केवल एफआईआर में दर्ज विवरण को अंतिम और निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता. यदि एफआईआर में दर्ज घटना के विवरण के विपरीत किसी प्रत्यक्षदर्शी की गवाही अदालत के सामने विश्वसनीय और सुसंगत रूप से सामने आती है तथा अन्य परिस्थितियां भी उसकी पुष्टि करती हैं, तो केवल एफआईआर के आधार पर उस गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के उस आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें ट्रैक्टर से कुचलकर हुई मौत के मामले में बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त कर दिया गया था.
जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन ने Anil Kumar Patel vs. Smt. Munni Bai Barman and Others मामले में एक सितंबर 2026 को आदेश पारित करते हुए कहा कि एफआईआर अपने आप में मूल या ठोस साक्ष्य नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर का उपयोग मुख्य रूप से किसी तथ्य की पुष्टि या विरोधाभास दिखाने के लिए किया जा सकता है, लेकिन उसमें लिखे प्रत्येक कथन को केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर स्वतः सिद्ध नहीं माना जा सकता. हाई कोर्ट ने इस आधार पर बीमा कंपनी को दुर्घटना के मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त करने वाले अधिकरण के निष्कर्ष को गलत माना और बीमा कंपनी को अवार्ड की राशि अदा करने के लिए उत्तरदायी ठहराया.
मामला वर्ष 2016 का है. रामचरन वर्मा की मौत 11 अक्टूबर 2016 को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान सरस्वती घाट पर ट्रैक्टर की चपेट में आने से हुई थी. मृतक के परिजनों की ओर से दावा किया गया कि रामचरन सड़क पर ट्रैक्टर के आगे नाचते हुए चल रहा था. ट्रैक्टर प्रमोद यादव चला रहा था और उसके लापरवाही एवं तेज गति से वाहन चलाने के कारण रामचरन ट्रैक्टर की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई.
हालांकि, मृतक के चाचा बेदीलाल द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में हादसे का अलग विवरण सामने आया था. उसमें कहा गया था कि रामचरन ट्रैक्टर पर बैठा हुआ था और गिरने के बाद उसके पहिए के नीचे आ गया, जिससे उसकी मौत हो गई. इसी विवरण को दुर्घटना के कारण और मृतक की स्थिति निर्धारित करने में महत्वपूर्ण मानते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने बीमा कंपनी को राहत दे दी थी.
मामले की सुनवाई छठे अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, जबलपुर के समक्ष हुई थी. अधिकरण ने एफआईआर में दर्ज विवरण के आधार पर माना कि मृतक ट्रैक्टर पर सवार एक ऐसा यात्री था, जिसके लिए बीमा पॉलिसी में सुरक्षा उपलब्ध नहीं थी. ट्रैक्टर का बीमा कृषि उपयोग के लिए था. इस निष्कर्ष के आधार पर अधिकरण ने बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त करते हुए ट्रैक्टर के मालिक और चालक पर जिम्मेदारी तय की थी.
इस आदेश को ट्रैक्टर मालिक अनिल कुमार पटेल ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 173(1) के तहत हाई कोर्ट में चुनौती दी. अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की. इसी दौरान अदालत के सामने राम वर्मा उर्फ आशु की प्रत्यक्षदर्शी गवाही महत्वपूर्ण साबित हुई. वह हादसे के समय मृतक के साथ सड़क पर नाच रहा था और दुर्घटना में स्वयं भी घायल हुआ था.
हाई कोर्ट ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शी राम वर्मा की गवाही जिरह के दौरान कमजोर नहीं हुई. अदालत ने कहा कि उसकी गवाही पर अविश्वास करने का कोई ठोस आधार सामने नहीं आया. उसके स्वयं घायल होने की बात भी इस बात की पुष्टि करती थी कि वह घटना के समय मौके पर मौजूद था. इस प्रकार उसकी उपस्थिति केवल दावा भर नहीं थी, बल्कि उसकी चोटों से भी उसका घटनास्थल पर होना पुष्ट होता था.
कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि बीमा कंपनी की ओर से न तो किसी स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी को पेश किया गया और न ही एफआईआर लिखने वाले व्यक्ति को अदालत में बुलाकर यह साबित कराया गया कि मृतक दुर्घटना के समय ट्रैक्टर पर बैठा था. हाई कोर्ट ने कहा कि केवल एफआईआर में ऐसा लिखा होने से यह तथ्य स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता कि रामचरन ट्रैक्टर पर बैठा हुआ था.
अदालत ने साक्ष्य कानून के मूल सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि एफआईआर मूल साक्ष्य नहीं है. इसका इस्तेमाल परिस्थितियों के अनुरूप पुष्टिकरण के लिए किया जा सकता है और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 145 के तहत किसी गवाह के बयान में विरोधाभास दिखाने के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है. लेकिन एफआईआर में दर्ज किसी कथन को केवल उसके प्रदर्शित किए जाने के कारण दुर्घटना का निर्णायक तथ्य नहीं माना जा सकता.
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद चावला ने सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों वाली पीठ के फैसले Halappa v. Malik Sab का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अधिकरण के सामने विधिवत दर्ज साक्ष्य को केवल एफआईआर के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दूसरी ओर, बीमा कंपनी की ओर से अधिवक्ता आदित्य नारायण शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के Oriental Insurance Company Limited v. Premlata Shukla फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि एफआईआर में दर्ज सामग्री को प्रदर्शित किए जाने के बाद उस पर भरोसा किया जा सकता है.
हाई कोर्ट ने दोनों फैसलों पर विचार किया, लेकिन मामले के तथ्यों में अंतर पाया. अदालत ने विशेष रूप से इस बात को ध्यान में रखा कि Premlata Shukla का फैसला दो न्यायाधीशों की पीठ का था, जबकि Halappa v. Malik Sab का फैसला तीन न्यायाधीशों की पीठ ने दिया था. इसलिए संबंधित कानूनी सिद्धांत के संदर्भ में हाई कोर्ट ने तीन न्यायाधीशों वाली पीठ के निर्णय को प्राथमिकता दी.
फैसले में पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण माना गया. पुलिस जांच के बाद तैयार अंतिम रिपोर्ट में यह दर्ज था कि हादसे के समय मृतक और घायल प्रत्यक्षदर्शी सड़क पर नाच रहे थे और तभी ट्रैक्टर ने उन्हें टक्कर मारी. पुलिस ने चालक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304-ए के तहत आरोपपत्र भी दाखिल किया था. इस तथ्य ने प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को अतिरिक्त समर्थन दिया.
हाई कोर्ट ने समग्र साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए माना कि अधिकरण ने बिना विधिवत सिद्ध किए गए एफआईआर के विवरण को प्रत्यक्षदर्शी की विश्वसनीय और पुष्ट गवाही के ऊपर रखकर गलती की. अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के बीच प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को केवल एफआईआर में मौजूद विपरीत कथन के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने अधिकरण के आदेश को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जिसमें बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त किया गया था. अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अदालत ने बीमा कंपनी को मुआवजा अवार्ड की राशि अदा करने के लिए उत्तरदायी ठहराया, जबकि अधिकरण के आदेश के बाकी हिस्से को यथावत रखा गया.
यह फैसला मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में साक्ष्यों के मूल्यांकन के लिहाज से महत्वपूर्ण है. हाई कोर्ट ने साफ किया कि एफआईआर जांच की शुरुआत करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है, लेकिन उसमें दर्ज हर बात को स्वतः प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता. अदालत के सामने प्रस्तुत विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य, उसकी जिरह, चोटों जैसी परिस्थितिजन्य पुष्टि और पुलिस जांच के निष्कर्षों को भी समान रूप से देखा जाना आवश्यक है. खासकर तब, जब एफआईआर में दर्ज घटना का विवरण बाद में अदालत के सामने आए प्रत्यक्ष साक्ष्य से मेल नहीं खाता हो.
Case Title: Anil Kumar Patel vs. Smt. Munni Bai Barman and Others | Date of Order: September 1, 2026 | Bench: Justice Ratnesh Chandra Singh Bisen
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

