जबलपुर. मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण को लेकर वर्ष 2025 में बनाए गए नए नियमों की वैधानिकता पर चल रही कानूनी लड़ाई में गुरुवार को नया मोड़ आया. इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच में प्रस्तावित सुनवाई नहीं हो सकी. सुप्रीम कोर्ट में इसी विवाद से जुड़े प्रकरण की सुनवाई और वहां से मिले निर्देशों को देखते हुए हाई कोर्ट ने फिलहाल मामले को आगे नहीं बढ़ाया. न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने अगली सुनवाई के लिए एक दिसंबर की तारीख निर्धारित की है.
मामला मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2025 में लागू किए गए प्रमोशन में आरक्षण संबंधी नए नियमों से जुड़ा है. इन नियमों की वैधानिकता और उनके सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन पर पड़ने वाले प्रभाव को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं. भोपाल की वेटरनरी सर्जन डॉ. स्वाति तिवारी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष इन नियमों को चुनौती दी है. याचिकाकर्ताओं की ओर से नियमों के लागू होने से पदोन्नति की प्रक्रिया और कर्मचारियों के अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए हैं.
इस विवाद की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे जुड़े कुछ पहलू सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं. आरबी राय से संबंधित एक प्रकरण भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन बताया गया है. इससे पहले हाई कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर वहां से उचित मार्गदर्शन प्राप्त करने के निर्देश दिए थे. इसी पृष्ठभूमि में गुरुवार की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी.
सुनवाई के दौरान युगलपीठ के समक्ष सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और वहां से मिले निर्देशों की जानकारी रखी गई. बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल संबंधित मामलों की सुनवाई स्थगित रखने का निर्देश दिया है. इसके बाद हाई कोर्ट ने भी लंबित याचिकाओं पर आगे की सुनवाई नहीं की. अदालत ने मामले को एक दिसंबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया है. अब उस तारीख को यह देखा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित संबंधित प्रकरण की स्थिति क्या है और वहां से इस विवाद को लेकर क्या दिशा सामने आती है.
प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा मध्य प्रदेश में लंबे समय से न्यायिक और प्रशासनिक चर्चा का विषय रहा है. सरकारी सेवाओं में पदोन्नति के दौरान आरक्षण किस तरह लागू किया जाए, किन परिस्थितियों में आरक्षण का लाभ दिया जाए और पदोन्नति में वरिष्ठता तथा आरक्षण के बीच किस प्रकार संतुलन बनाया जाए, इन सवालों को लेकर पहले भी अदालतों में कई मामले सामने आ चुके हैं. ऐसे में वर्ष 2025 में बनाए गए नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का भविष्य भी व्यापक प्रशासनिक प्रभाव वाला माना जा रहा है.
याचिकाकर्ताओं ने नए नियमों की वैधानिकता को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इन याचिकाओं में नियमों के प्रावधानों और उनके आधार पर होने वाली पदोन्नति प्रक्रिया को चुनौती दी गई है. दूसरी ओर, राज्य सरकार के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नए नियमों के माध्यम से सरकारी विभागों में पदोन्नति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता तैयार किया गया है. न्यायालय में लंबित चुनौती के कारण इस पूरी प्रक्रिया पर कानूनी स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है.
गुरुवार को सुनवाई स्थगित होने के बाद फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है. हाई कोर्ट ने न तो नए नियमों को वैध ठहराया है और न ही उन्हें निरस्त किया है. अगली सुनवाई में अदालत सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले और वहां से जारी निर्देशों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्यवाही तय करेगी. इसलिए एक दिसंबर की सुनवाई इस विवाद की अगली दिशा के लिए महत्वपूर्ण होगी.
इस मामले का असर उन सरकारी कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है जो पदोन्नति की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. नए नियमों के तहत पदोन्नति की पात्रता, आरक्षण की व्यवस्था और संबंधित श्रेणियों में पदों के निर्धारण को लेकर कर्मचारियों की निगाहें अदालत की कार्यवाही पर बनी हुई हैं. हालांकि, जब तक अदालत से अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक केवल सुनवाई टलने को नियमों के पक्ष या विपक्ष में किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता.
मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है. हाई कोर्ट के सामने अब यह स्थिति है कि संबंधित विवाद का एक हिस्सा शीर्ष अदालत में लंबित है और वहां से फिलहाल सुनवाई स्थगित रखने के निर्देश मिले हैं. ऐसे में हाई कोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाओं पर आगे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होने वाली कार्यवाही से प्रभावित होना स्वाभाविक है. अदालत अब एक दिसंबर को उपलब्ध न्यायिक स्थिति और शीर्ष अदालत के निर्देशों के आधार पर मामले को आगे बढ़ाएगी.
प्रमोशन में आरक्षण से जुड़े इस विवाद में कर्मचारियों के हित, आरक्षण व्यवस्था और प्रशासनिक पदोन्नति प्रक्रिया तीनों महत्वपूर्ण पक्ष हैं. यही कारण है कि हाई कोर्ट में दाखिल याचिकाओं पर अंतिम निर्णय का इंतजार केवल याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी सेवाओं में पदोन्नति की प्रक्रिया से जुड़े व्यापक वर्ग की नजर भी इस मामले पर है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के कारण हाई कोर्ट की सुनवाई आगे बढ़ने के बजाय एक दिसंबर तक टल गई है और अब अगली न्यायिक दिशा शीर्ष अदालत में लंबित प्रकरण की स्थिति पर भी निर्भर करेगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

