जबलपुर. बालाघाट के बैहर और बिरसा क्षेत्र में 30 बच्चों की मौत के दावे ने जनहित याचिका के जरिये मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ध्यान खींचा है, लेकिन अदालत ने इस दावे के आधार पर तत्काल सरकारी जवाब या कार्रवाई का आदेश देने के बजाय पहले उसकी जमीनी सच्चाई सामने लाने का रास्ता चुना है. हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह प्रभावित क्षेत्रों में स्वयं जाएं, वहां की वास्तविक स्थिति देखें, संबंधित तथ्यों की पुष्टि करें और अपनी रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें. इसके बाद ही यह तय होगा कि जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दों पर आगे सुनवाई की जरूरत है या नहीं.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष शुक्रवार को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने बालाघाट जिले के बैहर और बिरसा क्षेत्रों में बच्चों की कथित मौतों का मुद्दा उठाया. याचिका में दावा किया गया है कि हाल के समय में 30 बच्चों की मौत हुई है. इनके पीछे मलेरिया, खसरा और कुपोषण जैसी वजहें बताई गई हैं. याचिका में यह आरोप भी लगाया गया है कि प्रभावित इलाकों में बच्चों के उपचार के लिए पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.
मामला गंभीर होने के बावजूद अदालत ने इन दावों को तत्काल स्थापित तथ्य नहीं माना. न्यायालय ने जिस बिंदु पर जोर दिया, वह जनहित याचिका की बुनियादी विश्वसनीयता से जुड़ा है. अदालत का स्पष्ट रुख रहा कि केवल समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर किसी गंभीर जनहित के मुद्दे को न्यायालय के सामने लाना पर्याप्त नहीं है. जब मामला बच्चों की मौत और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी संवेदनशील परिस्थितियों से जुड़ा हो तो याचिकाकर्ता को स्वयं प्रभावित क्षेत्र में जाकर वास्तविक स्थिति की जानकारी जुटानी चाहिए.
याचिकाकर्ता नरसिंहपुर जिले के करेली निवासी हैं. सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि याचिका का आधार मुख्य रूप से समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरें हैं. ऐसे में न्यायालय ने उन्हें मौके पर जाकर तथ्यों की पुष्टि करने की जिम्मेदारी दी है. यह निर्देश इस मामले को सामान्य शिकायत से अलग बनाता है. अदालत अब केवल याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर आगे नहीं बढ़ना चाहती, बल्कि यह देखना चाहती है कि जमीन पर वास्तव में स्थिति क्या है.
सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से एक अस्पताल की क्षमता और वहां उपचाररत बच्चों की संख्या को लेकर भी महत्वपूर्ण दावा किया गया. बताया गया कि 50 बिस्तरों की क्षमता वाले अस्पताल में करीब 400 बच्चों का उपचार किया जा रहा है. यदि मौके पर जांच में यह स्थिति सही पाई जाती है तो यह बाल स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर सकती है. लेकिन फिलहाल अदालत ने इस दावे को भी सत्यापित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है. यही कारण है कि न्यायालय ने पहले प्रत्यक्ष पड़ताल को प्राथमिकता दी.
अब याचिकाकर्ता के सामने केवल अदालत में दायर की गई याचिका के तथ्यों को दोहराने की स्थिति नहीं है, बल्कि उन्हें उन तथ्यों का आधार भी जुटाना होगा जिनके आधार पर न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की गई है. उन्हें प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर यह पता लगाना होगा कि कथित तौर पर कितने बच्चों की मौत हुई, उनके उपचार की स्थिति क्या थी, मृत्यु के कारण क्या दर्ज किए गए और संबंधित स्वास्थ्य केंद्रों में किस तरह की चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध है. यदि चिकित्सा सुविधाओं की कमी का आरोप है तो उसका स्वरूप और प्रभाव भी स्पष्ट करना होगा.
न्यायालय के इस रुख का एक व्यापक पहलू भी है. जनहित याचिका न्यायिक व्यवस्था में आम नागरिकों और कमजोर वर्गों से जुड़े गंभीर मुद्दों को सामने लाने का महत्वपूर्ण माध्यम है. लेकिन इसका आधार तथ्यात्मक रूप से विश्वसनीय होना भी उतना ही जरूरी है. अदालतें ऐसे मामलों में केवल आरोपों के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकतीं. खासकर तब, जब आरोप बड़ी संख्या में बच्चों की मौत और उनके स्वास्थ्य से जुड़े हों.
बालाघाट के बैहर और बिरसा जैसे क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर यदि वास्तव में गंभीर समस्या है तो मौके की जांच से कई सवालों के जवाब मिल सकते हैं. क्या पर्याप्त चिकित्सक उपलब्ध हैं, दवाओं की स्थिति क्या है, बच्चों को समय पर उपचार मिल रहा है या नहीं, गंभीर मरीजों को उच्च चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था कैसी है और कुपोषण या संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए प्रशासन की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं—जमीनी रिपोर्ट में इन पहलुओं का सामने आना महत्वपूर्ण होगा.
दूसरी ओर, यदि 30 बच्चों की मौत का आंकड़ा या उसके कारण याचिका में किए गए दावे से अलग निकलते हैं तो यह भी न्यायालय के लिए महत्वपूर्ण तथ्य होगा. इसलिए अदालत ने फिलहाल न तो दावे को खारिज किया है और न ही उसे सही मानते हुए सरकारी तंत्र को जिम्मेदार ठहराया है. उसने सत्यापन को अगली न्यायिक प्रक्रिया की पहली सीढ़ी बनाया है.
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने याचिकाकर्ता को केवल क्षेत्र का दौरा करने के लिए नहीं कहा, बल्कि वहां से तथ्यों की रिपोर्ट तैयार कर न्यायालय के समक्ष रखने को कहा है. इसका अर्थ है कि अगली सुनवाई में मामले की दिशा काफी हद तक उस रिपोर्ट पर निर्भर करेगी. यदि रिपोर्ट से याचिका में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो न्यायालय संबंधित विभागों से जवाब मांग सकता है और आवश्यक न्यायिक हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है.
फिलहाल बच्चों की कथित मौतों को लेकर सामने आया मामला संवेदनशील जरूर है, लेकिन इसके प्रत्येक दावे की पुष्टि होना बाकी है. न्यायालय ने इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए पहले तथ्य और फिर न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता चुना है. अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी. उस दिन यह महत्वपूर्ण होगा कि याचिकाकर्ता की जमीनी पड़ताल क्या तस्वीर सामने रखती है और क्या वह याचिका में किए गए दावों को ठोस तथ्यों से जोड़ पाते हैं.
बालाघाट मामले में हाई कोर्ट का निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे जनहित याचिकाओं में केवल सुर्खियों या प्रकाशित खबरों के आधार पर न्यायालय पहुंचने के बजाय प्रत्यक्ष तथ्य जुटाने की आवश्यकता रेखांकित होती है. बच्चों की मौत जैसे गंभीर विषय में भावनात्मक संवेदनशीलता के साथ तथ्यात्मक जिम्मेदारी भी जरूरी है. अब अदालत के सामने अगला कदम उसी जमीनी रिपोर्ट के बाद तय होगा, जो यह बताएगी कि बालाघाट में वास्तव में क्या हुआ और याचिका में उठाई गई चिंता किस हद तक तथ्यात्मक आधार रखती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

