नई दिल्ली. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' (पूर्व में Twitter) से पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खाते से जुड़ी जानकारी मांगने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस से जवाब तलब किया है. सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि पुलिस ने 'X' से किस प्रकार की जानकारी मांगी है और संबंधित जानकारी किस प्राथमिकी की जांच के लिए आवश्यक है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा मांगी गई जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए.
यह मामला पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ गाजियाबाद में दर्ज एक रोड-रेज संबंधी प्राथमिकी से जुड़ा है. उपाध्याय ने प्राथमिकी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. इसी मामले में उन्होंने हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' को भेजे गए नोटिस को भी चुनौती दी है. पुलिस के नोटिस में उनके सोशल मीडिया खाते से संबंधित विभिन्न जानकारियां मांगी गई थीं.
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की. सुनवाई के दौरान पीठ ने डिजिटल जानकारी हासिल करने की पुलिस की कार्रवाई की सीमा और उसके मामले से सीधे संबंध को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए.
रोड-रेज मामले में डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत क्यों
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने राज्य सरकार की ओर से पेश पक्ष से सवाल किया कि रोड-रेज के मामले में आरोपी के डिजिटल फुटप्रिंट की आवश्यकता क्यों है. अदालत का सवाल मुख्य रूप से इस बात को लेकर था कि जिस प्राथमिकी की जांच की जा रही है, उसमें सोशल मीडिया खाते से इतनी व्यापक जानकारी मांगने का औचित्य क्या है.
पीठ ने पुलिस से यह स्पष्ट करने की जरूरत महसूस की कि 'X' से मांगी गई जानकारी वास्तव में प्राथमिकी की जांच के लिए किस तरह उपयोगी है. अदालत यह जानना चाहती है कि पुलिस ने केवल घटना से संबंधित सीमित डिजिटल जानकारी मांगी है या सोशल मीडिया खाते से जुड़ी व्यापक जानकारी हासिल करने का प्रयास किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर से विस्तृत हलफनामा मांगा है.
पुलिस ने एक जून से मांगी जानकारी, घटना 18 अगस्त की
पत्रकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने अदालत के समक्ष दलील दी कि उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से 'X' को भेजा गया नोटिस अत्यधिक व्यापक है. उन्होंने बताया कि जिस रोड-रेज की घटना को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई है, वह कथित तौर पर 18 अगस्त की है, जबकि पुलिस ने सोशल मीडिया खाते से संबंधित जानकारी 1 जून से मांगी है.
बचाव पक्ष का कहना था कि जांच के लिए आवश्यक जानकारी और किसी व्यक्ति के पूरे डिजिटल इतिहास के बीच स्पष्ट सीमा निर्धारित होनी चाहिए. यदि किसी विशेष घटना की जांच की जा रही है तो उससे असंबंधित लंबे समय की सोशल मीडिया गतिविधियों की जानकारी मांगने का औचित्य भी स्पष्ट होना चाहिए.
वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी बताया कि पुलिस ने खाते में लॉग-इन करने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल उपकरण से संबंधित जानकारी तक मांगी है. इस तरह की मांग को लेकर उन्होंने डिजिटल निजता और पत्रकारिता से जुड़े विशेषाधिकारों पर चिंता जताई.
पत्रकार ने जताई स्रोतों तक पहुंचने की आशंका
पत्रकार की ओर से अदालत में आशंका जताई गई कि सोशल मीडिया खाते और उससे जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की व्यापक जानकारी हासिल करने का प्रयास पत्रकार के स्रोतों तक पहुंचने का माध्यम बन सकता है.
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने कहा कि पत्रकारों के लिए उनके स्रोतों की गोपनीयता महत्वपूर्ण होती है. यदि किसी पत्रकार के डिजिटल खाते, उपकरण और अन्य ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ी व्यापक जानकारी जांच के नाम पर हासिल की जाती है तो इससे उसके पत्रकारिता संबंधी स्रोत भी प्रभावित हो सकते हैं.
उन्होंने अदालत से डिजिटल जानकारी मांगने और उसके उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश निर्धारित करने की मांग की. उनका तर्क था कि पुलिस को जांच की जरूरत और व्यक्ति की निजता के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश ने भी निजता को लेकर उठाई चिंता
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी डिजिटल जानकारी एकत्र करने की सीमा और उससे जुड़े निजता के सवालों पर चिंता व्यक्त की. पीठ ने इस बात पर विचार किया कि जांच एजेंसी को किसी व्यक्ति की डिजिटल गतिविधियों तक किस सीमा तक पहुंच दी जा सकती है.
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी संकेत दिया कि जांच के दौरान यदि पुलिस के हाथ कोई गोपनीय जानकारी लगती है और उसे बाद में न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाता है तो संबंधित व्यक्ति की निजता प्रभावित हो सकती है.
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल फुटप्रिंट की जांच के लिए स्पष्ट सीमाएं और उचित दिशानिर्देश होना जरूरी है. आधुनिक तकनीक के दौर में किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन और सोशल मीडिया खाते में बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत जानकारी मौजूद रहती है. ऐसे में जांच के नाम पर मांगी जाने वाली जानकारी की सीमा और उसके उद्देश्य का स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है.
यूपी सरकार ने कहा जांच के लिए जरूरी है डिजिटल जानकारी
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पत्रकार की याचिका मूल रूप से प्राथमिकी निरस्त करने की मांग से संबंधित है. राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता को लगी चोटों से संबंधित मेडिको-लीगल केस रिपोर्ट मौजूद है और उसके आधार पर मामले की जांच आवश्यक है.
राज्य सरकार की ओर से यह जानकारी भी अदालत के समक्ष रखी गई कि पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ दो अन्य प्राथमिकी भी दर्ज हैं.
हालांकि, सुनवाई के दौरान मुख्य मुद्दा यह रहा कि मौजूदा प्राथमिकी की जांच के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' से आखिर किस सीमा तक जानकारी मांगी गई और उस जानकारी का मामले से सीधा संबंध क्या है.
पुलिस जांच में सहयोग करने को तैयार पत्रकार
पत्रकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वह पुलिस जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं. उनके वकील ने राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता के साथ इस विषय पर बातचीत करने की इच्छा भी जताई.
इससे यह संकेत मिला कि विवाद केवल जांच में सहयोग करने से इनकार का नहीं, बल्कि जांच के दौरान डिजिटल जानकारी हासिल करने के तरीके और उसकी सीमा से जुड़ा हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट अब गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर के हलफनामे के माध्यम से यह जानना चाहता है कि पुलिस ने 'X' से कौन-कौन सी जानकारी मांगी, वह जानकारी किस प्राथमिकी से संबंधित है और जांच के लिए उसकी वास्तविक आवश्यकता क्या है.
पहले ही मिल चुका है अंतरिम संरक्षण
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट इससे पहले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ किसी कठोर कार्रवाई से संरक्षण प्रदान कर चुका है. अदालत ने पुलिस को प्राथमिकी की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया था.
इसके बाद उपाध्याय की ओर से दाखिल एक अन्य हलफनामे में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई को लेकर आरोप लगाए गए थे. हलफनामे में दावा किया गया था कि उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टीम उनकी तलाश में पूर्वी दिल्ली के पूर्व महापौर फरहाद सूरी के आवास में दाखिल हुई थी.
पत्रकार की ओर से इस घटना को उनके खिलाफ पुलिस की अन्य कार्रवाइयों के साथ जोड़कर देखने और जांच शक्तियों के कथित चयनात्मक या अनुपातहीन इस्तेमाल की न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता जताई गई थी.
अब पुलिस कमिश्नर को बताना होगा जानकारी का उद्देश्य
सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करना होगा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' से पत्रकार के खाते के संबंध में किस प्रकार की जानकारी मांगी गई है.
अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि मांगी गई जानकारी संबंधित रोड-रेज प्राथमिकी या पत्रकार के खिलाफ पहले दर्ज किसी अन्य प्राथमिकी की जांच के लिए किस उद्देश्य से आवश्यक है.
इस आदेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने डिजिटल जांच की आवश्यकता पर सीधे रोक नहीं लगाई है, बल्कि पुलिस से उसकी आवश्यकता, सीमा और प्राथमिकी से संबंध स्पष्ट करने को कहा है. साथ ही मांगी गई जानकारी को सार्वजनिक नहीं करने का निर्देश देकर अदालत ने डिजिटल निजता से जुड़े पहलू को भी महत्व दिया है.
मामले की अगली सुनवाई में पुलिस के हलफनामे से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि 'X' से मांगी गई जानकारी कितनी व्यापक है और उसका संबंधित अपराध की जांच से क्या प्रत्यक्ष संबंध है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी डिजिटल युग में पुलिस जांच, व्यक्तिगत निजता और पत्रकारिता से जुड़े स्रोतों की गोपनीयता के बीच संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
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