नई दिल्ली. बिहार के एक हत्या मामले में प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में गंभीर विरोधाभास, पुलिस जांच में सामने आई कमियां और अभियोजन के साक्ष्यों से पैदा हुए उचित संदेह का लाभ देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो आरोपितों को बरी कर दिया. न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध मौखिक साक्ष्य पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है और जब अभियोजन की कहानी आरोपितों की निर्दोषता की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाती, तब उचित संदेह का लाभ दिया जाना आवश्यक है.
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 8 सितंबर 2026 को आपराधिक अपील संख्या 1223/2022 में अशोक उपाध्याय और एक अन्य आरोपित की अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया. दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सहपठित धारा 34 तथा आयुध अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया गया था. उच्च न्यायालय ने भी उनकी सजा बरकरार रखी थी.
नाली के विवाद से शुरू हुआ था मामला
मामला दो परिवारों के बीच नाली को लेकर हुए विवाद से जुड़ा था. अभियोजन के अनुसार, नाली अवरुद्ध होने के कारण मृतक के घर के बाहर पानी जमा हो रहा था. इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हुआ और बाद में स्थिति कथित तौर पर हिंसक हो गई.
अभियोजन का आरोप था कि विवाद के दौरान एक आरोपित ने मृतक को गोली मारी, जबकि दूसरे आरोपित ने दूसरे पक्ष के सदस्यों पर गोली चलाने की कोशिश की. मामले में शुरुआत में पांच लोगों के खिलाफ अभियोजन चलाया गया था. इनमें से तीन को निचली अदालत ने बरी कर दिया, जबकि दो को दोषी ठहराया गया. बाद में उच्च न्यायालय ने भी दोनों की दोषसिद्धि कायम रखी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन के प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही का बारीकी से परीक्षण किया. न्यायालय ने पाया कि अधिकांश कथित प्रत्यक्षदर्शी मृतक के करीबी रिश्तेदार थे. हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल रिश्तेदार होने के आधार पर किसी गवाह की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता, लेकिन इस मामले में बयानों के बीच मौजूद महत्वपूर्ण विरोधाभासों की अनदेखी नहीं की जा सकती.
गवाहों के बयानों में यह महत्वपूर्ण अंतर सामने आया कि घायल लोगों और मृतक को घटनास्थल से किस तरह ले जाया गया. प्रथम सूचना विवरण में कहा गया था कि मृतक के शव को पुलिस थाने ले जाया गया था, जबकि एक प्रत्यक्षदर्शी ने अपने बयान में शव को अस्पताल ले जाने की बात कही.
न्यायालय ने इन दोनों संस्करणों की तुलना जांच अधिकारी की गवाही और पंचनामा रिपोर्ट से की. इन दस्तावेजों और जांच अधिकारी के साक्ष्य से पुलिस थाने ले जाने वाला संस्करण अधिक समर्थित पाया गया.
पहले बयान में नहीं थीं कई अहम बातें
पीठ ने कथित रूप से घायल दो प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में भी महत्वपूर्ण विसंगतियां पाईं. न्यायालय ने गौर किया कि जिन घटनाओं और चोटों का विस्तार से उल्लेख इन गवाहों ने अदालत में अपनी गवाही के दौरान किया, उनमें से कई बातें उनके पुलिस के समक्ष दिए गए शुरुआती बयानों में मौजूद नहीं थीं.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बाद की गवाही में सामने आए इन अतिरिक्त विवरणों की विश्वसनीयता की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी थी. इसके साथ ही चिकित्सा साक्ष्य भी गवाहों द्वारा बताए गए चोटों की पूरी गंभीरता का समर्थन नहीं कर रहा था.
न्यायालय के अनुसार, जब मौखिक गवाही और चिकित्सा साक्ष्य के बीच महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है तथा गवाहों के पहले और बाद के बयानों में भी बदलाव मिलता है, तो ऐसी गवाही को दोषसिद्धि का एकमात्र मजबूत आधार मानना कठिन हो जाता है.
घटनास्थल का नक्शा तक तैयार नहीं किया गया
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस जांच में कई कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया. न्यायालय ने कहा कि कथित घटनास्थल का नक्शा तैयार नहीं किया गया, जबकि मामले में घटनास्थल की अलग-अलग जगहों का प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में महत्वपूर्ण उल्लेख था.
गवाहों ने हैंडपंप और भैंस के बाड़े जैसी जगहों का उल्लेख किया था. ऐसे में घटनास्थल का नक्शा यह समझने में मदद कर सकता था कि घटना के समय गवाह और अन्य संबंधित लोग वास्तव में कहां मौजूद थे तथा उन्होंने घटना को किस स्थिति में देखा होगा.
पीठ ने इस जांच संबंधी कमी को अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता के परीक्षण में महत्वपूर्ण माना.
कथित हथियार भी बरामद नहीं हुए
जांच में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए हथियारों की बरामदगी भी नहीं हो सकी. इसके अलावा एक आरोपित के नाम बताए गए हथियार के लाइसेंस को भी अदालत के सामने पेश नहीं किया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लाइसेंस पेश किए जाने से हथियार की प्रकृति के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती थी और उसके आधार पर आगे फॉरेंसिक जांच की संभावना भी बन सकती थी. लेकिन यह महत्वपूर्ण सामग्री न्यायालय के सामने नहीं लाई गई.
इस तरह मौखिक साक्ष्य की विसंगतियों के साथ जांच की इन कमियों ने अभियोजन की कहानी को और कमजोर किया.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी उठाया महत्वपूर्ण सवाल
मामले में पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक की गवाही भी सुप्रीम कोर्ट के विचार में महत्वपूर्ण रही. चिकित्सक ने बताया था कि मृतक को लगी घातक गोली की चोट के बाद उसके तीन से छह घंटे तक जीवित रहने की संभावना थी.
पीठ ने इस चिकित्सा राय को उस तथ्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना कि मृतक को अस्पताल ले जाने के बजाय पुलिस थाने ले जाने की बात सामने आई थी. न्यायालय ने इस परिस्थिति को अभियोजन की कहानी के दूसरे पहलुओं के साथ जोड़कर देखा.
इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया कि घटनास्थल से मृतक को वास्तव में कहां ले जाया गया था और प्रत्यक्षदर्शियों के अलग-अलग बयान किस हद तक विश्वसनीय माने जा सकते हैं.
विरोधाभासों के बीच संदेह का लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में मौजूद विसंगतियों और विरोधाभासों के कारण वह प्रत्यक्षदर्शियों की मौखिक गवाही पर भरोसा करने की स्थिति में नहीं है. जब अभियोजन की कहानी के संबंध में उचित संदेह बना रहता है और आरोपितों की निर्दोषता की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तो संदेह का लाभ आरोपितों को दिया जाना चाहिए.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतक के रिश्तेदार गवाह होने मात्र से उनकी गवाही खारिज नहीं की जा सकती. लेकिन जब रिश्तेदारी के साथ-साथ गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास, पहले बयान और अदालत में दिए गए बयान में अंतर, चिकित्सा साक्ष्य से असंगति और जांच में कमियां भी मौजूद हों, तो अदालत को अधिक सतर्कता से साक्ष्यों का मूल्यांकन करना पड़ता है.
दोनों आरोपितों को तत्काल रिहाई का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलकर्ताओं को उचित संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया और उनकी आपराधिक अपील स्वीकार कर ली. न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि दोनों किसी अन्य मामले में आवश्यक न हों और हिरासत में हों तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए.
यदि वे जमानत पर थे, तो उनके जमानत बांड रद्द करने का आदेश दिया गया.
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल आरोपों या संभावनाओं के आधार पर नहीं की जा सकती. अभियोजन को अपने मामले को विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होता है. जहां प्रत्यक्षदर्शी गवाही में गंभीर विरोधाभास हों, चिकित्सा साक्ष्य पूरी तरह समर्थन न करता हो और जांच में महत्वपूर्ण कमियां रह गई हों, वहां उत्पन्न उचित संदेह का लाभ आरोपित को मिलना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण सिद्धांत है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

