डीएनए रिपोर्ट से सहमति या असहमति तय नहीं हो सकती, दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में बरी करने का फैसला बरकरार रखा

डीएनए रिपोर्ट से सहमति या असहमति तय नहीं हो सकती, दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में बरी करने का फैसला बरकरार रखा

प्रेषित समय :21:38:08 PM / Tue, Sep 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा है कि डीएनए रिपोर्ट यौन संबंध होने और बच्चे की जैविक पितृत्व की पुष्टि कर सकती है, लेकिन अपने आप यह साबित नहीं करती कि संबंध सहमति से बने थे या बिना सहमति के. न्यायमूर्ति मधु जैन ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के आरोप को साबित करने के लिए केवल यौन संबंध स्थापित होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अभियोजन को यह भी साबित करना होगा कि संबंध बिना सहमति, दबाव, धमकी या अन्य आरोपित परिस्थितियों में बने थे.

अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114ए के तहत वैधानिक अनुमान लागू होने के बावजूद पीड़िता की गवाही न्यायिक जांच से परे नहीं हो जाती. गवाही की विश्वसनीयता, उसके पूर्व बयानों से सामंजस्य और मामले की परिस्थितियों की जांच अदालत कर सकती है. हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष की अपील खारिज करते हुए आरोपी को बरी करने का 7 अक्टूबर 2024 का फैसला बरकरार रखा.

डीएनए से साबित हुआ बच्चा आरोपी का जैविक पिता
मामला द्वारका उत्तर थाने में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है. अभियोजन के अनुसार पीड़िता अपने पति और दत्तक बच्चे के साथ रह रही थी. उसके पति को वर्ष 2007 में छत से गिरने के कारण 75 प्रतिशत दिव्यांगता हुई थी और वह जैविक संतान पैदा करने में सक्षम नहीं था. दंपती ने 2014 में एक बच्चे को गोद लिया था.

आरोप था कि आरोपी पीड़िता के परिवार को जानता था और वर्ष 2017 से उसके घर आता-जाता था. पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने धमकी और प्रलोभन देकर उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. एक घटना में नशीला पदार्थ देने का भी आरोप लगाया गया. अभियोजन के अनुसार बाद में भी कथित रूप से कई बार यौन संबंध बनाए गए और अप्राकृतिक यौन संबंध के साथ धमकी और दबाव के आरोप लगाए गए.

पीड़िता गर्भवती हुई और 20 जून 2019 को उसने बच्चे को जन्म दिया. जांच के दौरान पीड़िता, आरोपी और बच्चे के डीएनए नमूने लिए गए और उन्हें रोहिणी स्थित फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया. रिपोर्ट में आरोपी को बच्चे का जैविक पिता बताया गया.

2021 में दर्ज हुई प्राथमिकी
पीड़िता ने बाद में कथित घटनाओं की जानकारी अपने पति और परिवार के सदस्यों को दी. उसकी शिकायत के आधार पर 17 मार्च 2021 को द्वारका उत्तर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई. इसमें भारतीय दंड संहिता की धाराओं 376 और 377 के साथ धारा 506 के तहत आरोप लगाए गए. बाद में जांच के दौरान धारा 509 और 328 भी जोड़ी गईं.

मामले में आरोपी के खिलाफ धारा 328, 376(2)(एन), 377, 506 और 509 के तहत आरोप तय किए गए. सुनवाई के दौरान अभियोजन ने चार गवाह पेश किए. इनमें पीड़िता, उसका पति और जांच से जुड़े दो पुलिस अधिकारी शामिल थे. आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अपने बयान में पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन कहा कि संबंध सहमति से थे और पीड़िता के पति को इसकी जानकारी थी.

ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर 2024 में किया था बरी
द्वारका कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 7 अक्टूबर 2024 को आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की गवाही में सामने आई विसंगतियों, घटना की जानकारी देने और प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी तथा आरोपी की ओर से दिए गए सहमति वाले बचाव को भी ध्यान में रखा.

ट्रायल कोर्ट ने माना था कि पीड़िता की गवाही में सुधार और असंगतियां थीं और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधों के सहमति से होने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को धारा 376(2)(एन) सहित अन्य धाराओं के आरोपों से बरी कर दिया था.

इसके बाद पीड़िता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 419 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की और ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी.

हाईकोर्ट ने कहा गवाही विश्वसनीय होना जरूरी
हाईकोर्ट ने अपील पर विचार करते हुए कहा कि किसी दुष्कर्म मामले में पीड़िता की अकेली गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि हो सकती है, लेकिन ऐसी गवाही विश्वसनीय और भरोसा पैदा करने वाली होनी चाहिए. केवल यह सिद्धांत कि पीड़िता की गवाही अकेले पर्याप्त हो सकती है, अदालत को महत्वपूर्ण विरोधाभासों और असंगतियों की अनदेखी करने के लिए बाध्य नहीं करता.

अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की गवाही को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया कि वह अभियोजन पक्ष की गवाह थी. बल्कि उसके पहले बयानों, उसके पति की गवाही और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों के साथ तुलना करते हुए गवाही की विश्वसनीयता का परीक्षण किया गया था.

नशीला पदार्थ देने के आरोप में भी विरोधाभास
हाईकोर्ट ने नशीला पदार्थ दिए जाने के आरोप को भी महत्वपूर्ण माना. पीड़िता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के बयान में कहा था कि शुरुआती घटनाओं के दौरान आरोपी यौन संबंध बनाने से पहले उसे नशीला पदार्थ देता था. लेकिन शुरुआती शिकायत और ट्रायल कोर्ट के समक्ष दिए गए उसके बयान में इस बात का उसी तरह उल्लेख नहीं था.

पहली घटना को लेकर भी उसके बयानों में अंतर पाया गया. शिकायत में उसने कहा था कि आरोपी ने दूध में नशीला पदार्थ मिलाया था, जिसे उसने और उसके पति दोनों ने पिया. बाद की गवाही में उसने यह अतिरिक्त परिस्थिति बताई कि दूध तैयार करते समय उसका पति उसे बुलाने लगा और उसके रसोई से लौटने पर उसने आरोपी को वहां से निकलते देखा. अदालत ने माना कि कथित नशीला पदार्थ दूध में किस तरह मिलाया गया, इसे लेकर अलग-अलग चरणों में दिए गए बयान एक समान नहीं थे.

पहली घटना के दौरान होश में होने को लेकर भी अंतर
पीड़िता के बयान में पहली कथित घटना के दौरान उसकी चेतना की स्थिति को लेकर भी महत्वपूर्ण अंतर सामने आया. शिकायत में उसने बताया था कि दूध पीने के बाद उसे नींद आने लगी थी और वह देख पा रही थी कि आरोपी क्या कर रहा है, लेकिन हाथ-पैर हिलाने में सक्षम नहीं थी.

वहीं ट्रायल कोर्ट में गवाही के दौरान उसने शुरुआत में कहा कि आरोपी के उसे दूसरे कमरे में ले जाने के बाद उसे कुछ याद नहीं रहा और अगले दिन होश आया. बाद में अभियोजन पक्ष के वकील द्वारा जिरह के दौरान किए गए सुझाव से उसने सहमति जताई कि वह उस समय होश में थी, हालांकि हाथ-पैर नहीं हिला पा रही थी. हाईकोर्ट ने इस अंतर को इसलिए महत्वपूर्ण माना क्योंकि अभियोजन ने पहली घटना में सहमति के अभाव को कथित नशीले पदार्थ और उसके प्रभाव से जोड़ा था.

गर्भावस्था और पति को जानकारी की कहानी में भी अंतर
पीड़िता और उसके पति के बयानों में गर्भावस्था तथा बच्चे के पितृत्व को लेकर पति को कथित संदेह होने की परिस्थितियों में भी अंतर पाया गया.

धारा 164 के बयान में पीड़िता ने कहा था कि 2018 में गर्भावस्था की जानकारी देने पर उसके पति ने अपनी दिव्यांगता के कारण बच्चे के पिता होने पर संदेह किया था. बाद की गवाही में उसने घटनाक्रम को 2019 का बताते हुए कहा कि पति ने गर्भावस्था पर आपत्ति की, उसे अस्पताल ले गया और डीएनए जांच की मांग की.

हाईकोर्ट ने पाया कि उसका पति इस घटनाक्रम की पुष्टि नहीं करता था. उसने कहा था कि बच्चे के जन्म से पहले उसने पत्नी से न तो झगड़ा किया और न ही बच्चे के पितृत्व पर सवाल उठाया. अदालत ने इस अंतर को अभियोजन की पूरी कहानी की विश्वसनीयता परखने में प्रासंगिक माना.

अश्लील फोटो और वीडियो के आरोप को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का समर्थन नहीं
पीड़िता ने आरोपी पर अश्लील फोटो और वीडियो बनाकर उन्हें प्रसारित करने की धमकी देने के आरोप भी लगाए थे. हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि इन आरोपों को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से पुष्टि नहीं मिली.

पीड़िता अलग-अलग चरणों में कथित फोटो और वीडियो को लेकर अलग बातें कहती रही. जिरह के दौरान वह निश्चित रूप से यह नहीं बता सकी कि ऐसे फोटो या वीडियो बनाए गए थे या किसे भेजे गए थे. आरोपी के मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच की गई, लेकिन कथित फोटो, वीडियो या चैट बरामद नहीं हुए. हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट इन परिस्थितियों को धारा 506 और 509 से जुड़े आरोपों की जांच करते समय ध्यान में रखने के लिए स्वतंत्र था.

रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी अकेला आधार नहीं
हाईकोर्ट ने साथ ही महत्वपूर्ण रूप से कहा कि यौन अपराध के मामले में पीड़िता के व्यवहार को इस आधार पर नहीं परखा जा सकता कि एक कथित पीड़िता को किस तरह व्यवहार करना चाहिए. इसी तरह केवल प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी को अभियोजन के मामले को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता.

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब गवाही की विश्वसनीयता और दो विरोधी दावों के बीच तथ्यात्मक स्थिति तय करनी हो, तब घटनाओं के आसपास की परिस्थितियां पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हो जातीं. इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने किसी एक परिस्थिति को निर्णायक नहीं माना, बल्कि पूरे साक्ष्य का सामूहिक मूल्यांकन किया था.

बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप का आधार नहीं मिला
हाईकोर्ट ने कहा कि बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित होती है. यदि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर एक संभावित और उचित निष्कर्ष है तो केवल इस आधार पर अपीलीय अदालत उसे नहीं बदल सकती कि कोई दूसरा दृष्टिकोण भी संभव है.

अदालत ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने डीएनए साक्ष्य की अनदेखी नहीं की थी. डीएनए रिपोर्ट को सही रूप से इस सीमा तक माना गया कि उसने आरोपी के बच्चे का जैविक पिता होने और पक्षों के बीच यौन संबंध होने की पुष्टि की. लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि संबंध बिना सहमति के थे.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप गंभीर होने के बावजूद अपराध की गंभीरता आपराधिक मुकदमे में आवश्यक प्रमाण के स्तर का स्थान नहीं ले सकती. अभियोजन को आरोपी का अपराध उचित संदेह से परे साबित करना होता है और जहां साक्ष्य निर्दोषता के अनुरूप उचित निष्कर्ष की गुंजाइश छोड़ते हैं, वहां उसका लाभ आरोपी को मिलता है.

अंततः न्यायमूर्ति मधु जैन ने पीड़िता की अपील खारिज कर दी और द्वारका कोर्ट द्वारा 7 अक्टूबर 2024 को सुनाया गया बरी करने का फैसला बरकरार रखा. अदालत ने मामले का आदेश आवश्यक जानकारी और अनुपालन के लिए ट्रायल कोर्ट को भेजने का निर्देश भी दिया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-