संपत्ति का कम मूल्य बताने पर बिना धोखाधड़ी साबित किए स्टांप शुल्क की कार्रवाई हो सकती है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी पीठ को भेजा मामला

संपत्ति का कम मूल्य बताने पर बिना धोखाधड़ी साबित किए स्टांप शुल्क की कार्रवाई हो सकती है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी पीठ को भेजा मामला

प्रेषित समय :20:03:57 PM / Tue, Sep 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. संपत्ति के कम मूल्यांकन और अतिरिक्त स्टांप शुल्क से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल बड़ी पीठ के विचार के लिए भेज दिया है कि भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 47-ए के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए क्या संबंधित अधिकारी को संपत्ति का मूल्य जानबूझकर कम दिखाए जाने के साथ धोखाधड़ी की मंशा भी प्रथम दृष्टया साबित करनी होगी. न्यायालय ने इस मुद्दे पर पहले के तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसले से असहमति के गंभीर आधार पाए, लेकिन न्यायिक अनुशासन के कारण उस फैसले को स्वयं पलटने के बजाय मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना उचित माना.

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम जिला राजस्व अधिकारी (स्टांप्स) एवं अन्य मामले में 7 सितंबर 2026 को यह आदेश पारित किया.

सरकारी जमीन खरीदने के बाद शुरू हुआ विवाद
मामला भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा केंद्र सरकार से खरीदी गई जमीन से जुड़ा है. उपलब्ध विवरण के अनुसार, जमीन का पूरा विक्रय मूल्य वर्ष 2014 में चेक के माध्यम से चुका दिया गया था और 21 जनवरी 2014 को उसका कब्जा भी सौंप दिया गया था.

इसके बाद 24 जून 2016 को हस्तांतरण विलेख निष्पादित किया गया. दस्तावेज के पंजीकरण के समय बीपीसीएल ने विलेख में दर्शाए गए बिक्री मूल्य के आधार पर स्टांप शुल्क और पंजीकरण शुल्क का भुगतान किया.

बाद में पंजीयन प्राधिकारी ने संपत्ति के मूल्य को लेकर अंतर पाया. प्राधिकरण के अनुसार संबंधित संपत्ति का मार्गदर्शक मूल्य 500 रुपये प्रति वर्ग फुट था, जबकि दस्तावेज में मूल्य 168.30 रुपये प्रति वर्ग फुट दर्शाया गया था.

इसी अंतर के आधार पर मामला भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 47-ए के तहत राजस्व प्राधिकारी को भेजा गया और बीपीसीएल को अतिरिक्त स्टांप शुल्क जमा करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.

मद्रास हाई कोर्ट में भी उठा था सवाल
इस कार्रवाई के खिलाफ मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा. हाई कोर्ट की एकल पीठ ने कारण बताओ नोटिस को रद्द करते हुए कहा था कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि संपत्ति का मूल्य जानबूझकर कम दिखाया गया था या इसके पीछे धोखाधड़ी की मंशा थी.

हालांकि बाद में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को पलट दिया और राजस्व प्राधिकारी के समक्ष शुरू की गई कार्यवाही को बहाल कर दिया.

इसके बाद बीपीसीएल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल क्या था
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सामने इस स्तर पर यह तय करने का प्रश्न नहीं था कि संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य कितना था या अंततः बीपीसीएल को अतिरिक्त स्टांप शुल्क देना होगा या नहीं.

पीठ ने कहा कि तत्काल विचार का मुद्दा यह है कि धारा 47-ए के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए प्रारंभिक स्तर पर किन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है.

यानी सवाल यह था कि क्या पंजीयन प्राधिकारी को केवल यह विश्वास होने पर कि दस्तावेज में संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य सही ढंग से नहीं बताया गया है, कार्यवाही शुरू करने का अधिकार है या इसके लिए यह भी जरूरी है कि संपत्ति का मूल्य जानबूझकर कम दिखाने और स्टांप शुल्क से बचने की धोखाधड़ीपूर्ण मंशा का आधार मौजूद हो.

तीन न्यायाधीशों के पुराने फैसले से जुड़ा पेच
पीठ ने इस मामले में वी.एन. देवदास बनाम मुख्य राजस्व नियंत्रण अधिकारी-सह-निरीक्षक स्टांप मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के पहले के निर्णय पर भी विचार किया.

उस निर्णय में धारा 47-ए के इस्तेमाल के संदर्भ में जानबूझकर कम मूल्यांकन और स्टांप शुल्क से बचने की धोखाधड़ीपूर्ण मंशा को महत्वपूर्ण आधार माना गया था.

लेकिन मौजूदा दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस व्याख्या को लेकर गंभीर संदेह जताया. न्यायालय ने संकेत दिया कि अधिनियम की धारा के शब्दों में ऐसी अतिरिक्त शर्त स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती.

पीठ के अनुसार, धारा 47-ए में पंजीयन प्राधिकारी के पास यह विश्वास करने का आधार होना आवश्यक है कि संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य दस्तावेज में सही ढंग से दर्ज नहीं किया गया है. कानून की भाषा में आरोपी की दोषपूर्ण मानसिकता या धोखाधड़ी की मंशा को प्रारंभिक कार्रवाई की अनिवार्य शर्त के रूप में जोड़ना सवाल खड़ा करता है.

ईमानदार और संदिग्ध दोनों लेनदेन में पैदा हो सकती है कठिनाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की व्याख्या के व्यावहारिक प्रभावों पर भी विचार किया. न्यायालय के सामने यह तर्क महत्वपूर्ण रहा कि यदि धोखाधड़ी की मंशा को धारा 47-ए के तहत कार्यवाही शुरू करने की अनिवार्य शर्त बना दिया जाए तो कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं.

किसी संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य परिस्थितियों के कारण मार्गदर्शक मूल्य से कम हो सकता है. ऐसी स्थिति में यदि खरीदार ने ईमानदारी से कम मूल्य पर संपत्ति खरीदी है, तब भी शुरुआत में उसकी मानसिक मंशा की जांच करनी पड़ सकती है.

दूसरी ओर, यदि किसी लेनदेन में वास्तविक मूल्य छिपाने के लिए नकद भुगतान या अन्य गुप्त व्यवस्था की गई हो, लेकिन शुरुआती चरण में धोखाधड़ी की मंशा का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध न हो, तो प्राधिकारी के लिए जांच शुरू करना मुश्किल हो सकता है.

यही कारण है कि पीठ ने धारा 47-ए की इस व्याख्या पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की.

पुराने फैसले को दो न्यायाधीशों की पीठ नहीं पलट सकती
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान पीठ ने तीन न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय की शुद्धता को लेकर गंभीर सवाल उठाए, लेकिन उसने स्वयं उस फैसले को पलटने से इनकार किया.

पीठ ने न्यायिक अनुशासन के सिद्धांत को महत्वपूर्ण माना. दो न्यायाधीशों की पीठ तीन न्यायाधीशों की पीठ के पूर्व निर्णय को सीधे खारिज नहीं कर सकती.

इसी कारण न्यायालय ने इस कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्णय लिया.

अब बड़ी पीठ करेगी कानूनी स्थिति स्पष्ट
अब बड़ी पीठ यह तय करेगी कि भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 47-ए के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए क्या जानबूझकर किया गया कम मूल्यांकन और उसके साथ धोखाधड़ी की मंशा दोनों का होना जरूरी है या नहीं.

दूसरा विकल्प यह है कि यदि पंजीयन प्राधिकारी के पास यह मानने का पर्याप्त आधार है कि दस्तावेज में संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य सही ढंग से दर्ज नहीं किया गया है, तो वह केवल इसी आधार पर धारा 47-ए की प्रक्रिया शुरू कर सकता है.

इस निर्णय का प्रभाव केवल बीपीसीएल के मामले तक सीमित नहीं रह सकता. संपत्तियों के पंजीकरण, बाजार मूल्य के निर्धारण और अतिरिक्त स्टांप शुल्क से जुड़ी बड़ी संख्या में कार्यवाहियों में इस कानूनी प्रश्न की अहम भूमिका हो सकती है.

मुख्य विवाद का अंतिम फैसला अभी बाकी
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह अंतिम निर्णय नहीं दिया है कि बीपीसीएल की संपत्ति का वास्तविक मूल्य क्या था या कंपनी पर अतिरिक्त स्टांप शुल्क की देनदारी बनती है या नहीं. न्यायालय ने केवल धारा 47-ए की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेजा है.

पीठ ने मामले के कागजात उचित आदेश के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया है.

इस तरह अब बड़ी पीठ के फैसले पर यह निर्भर करेगा कि संपत्ति के कथित कम मूल्यांकन पर स्टांप शुल्क की जांच शुरू करने के लिए धोखाधड़ी की मंशा का प्रारंभिक प्रमाण अनिवार्य होगा या केवल वास्तविक बाजार मूल्य सही ढंग से दर्ज न होने का कारण ही धारा 47-ए की कार्रवाई के लिए पर्याप्त माना जाएगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-