नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने असम में दवाओं की कथित फर्जी खरीद और भुगतान से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए खानिंद्र कुमार दत्ता को बरी कर दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत दोषसिद्धि के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी ने कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ हासिल किया. केवल सरकारी धन के कथित गलत भुगतान या प्रक्रिया में भूमिका के आधार पर इस प्रावधान के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती.
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 8 सितंबर 2026 को आपराधिक अपील संख्या 1882/2024 में यह फैसला सुनाया. पीठ ने दत्ता की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि निरस्त कर दी.
करीब छह लाख रुपये के कथित नुकसान का मामला
मामला असम के पशुपालन विभाग से जुड़ा था. विभाग की शिकायत में करीब 5 लाख 97 हजार 200 रुपये के नुकसान का आरोप लगाया गया था. अभियोजन के अनुसार, दवाओं की ऐसी रसीद-सह-चालान तैयार किए गए थे, जिनके माध्यम से ऐसी दवाओं की आपूर्ति दर्शाई गई जो कथित तौर पर वास्तव में प्राप्त नहीं हुई थीं.
इन बिलों के आधार पर भुगतान एक ऐसी फर्म को किया गया, जिसे अभियोजन ने फर्जी बताया था. इसी मामले में सरकारी अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई.
अभियोजन का आरोप था कि सरकारी धन का भुगतान ऐसी दवाओं के नाम पर किया गया, जिनकी वास्तविक आपूर्ति नहीं हुई थी.
सात लोगों के खिलाफ दाखिल हुई थी चार्जशीट
मामले की जांच के बाद सात लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया. सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपितों को दोषी ठहराया, जबकि तीन को बरी कर दिया.
इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा. अपील के दौरान एक और आरोपित को बरी कर दिया गया. वहीं दत्ता, जो स्टोर इंचार्ज थे, तथा एक अन्य आरोपित, जो स्टोरकीपर था, के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत दोषसिद्धि कायम रखी गई.
हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत दोनों को राहत दी थी, लेकिन भ्रष्टाचार संबंधी आरोप में दोषसिद्धि बरकरार रखी.
दवा स्टोर में दर्ज करने और प्रमाणित करने की भूमिका
अभियोजन की कहानी के अनुसार स्टोरकीपर ने दवाओं की एंट्री स्टोर रजिस्टर में की थी, जबकि दत्ता ने उन दवाओं की प्राप्ति को प्रमाणित किया था. अभियोजन का कहना था कि जिन दवाओं की प्राप्ति दर्शाई गई, वे वास्तव में स्टोर में आई ही नहीं थीं.
इसी आधार पर दोनों की भूमिका को संदिग्ध माना गया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या इन तथ्यों से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत आवश्यक आर्थिक लाभ प्राप्त करने का तत्व साबित होता है.
हाई कोर्ट ने खुद माना था आर्थिक लाभ साबित नहीं हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के निष्कर्ष पर विशेष ध्यान दिया. पीठ ने पाया कि हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह माना था कि दत्ता या दूसरे आरोपित के द्वारा कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त किया जाना साबित नहीं हुआ.
इसके बावजूद धारा 13(1)(डी) के तहत दोषसिद्धि कायम रखी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने इसी बिंदु को निर्णायक माना. पीठ ने कहा कि जब संबंधित प्रावधान के तहत आर्थिक लाभ प्राप्त करने की आवश्यक शर्त ही साबित नहीं हुई, तो इस धारा के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती.
आर्थिक लाभ के बिना दोषसिद्धि का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 13(1)(डी) के तहत दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को यह स्थापित करना आवश्यक है कि आरोपी ने कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त किया.
पीठ ने कहा कि आर्थिक लाभ साबित नहीं होने की स्थिति में इस प्रावधान के तहत दोषसिद्धि नहीं हो सकती.
न्यायालय ने इस मामले में हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को भी महत्वपूर्ण माना, जिसमें उसने स्वयं कहा था कि आरोपितों के पक्ष में किसी मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ का प्रमाण नहीं मिला.
इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने दत्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी दोषसिद्धि को टिकाऊ नहीं माना.
धन के लेनदेन की कड़ी भी नहीं खोजी गई
पीठ ने जांच के तरीके पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. न्यायालय ने कहा कि विभागीय धन जारी होने के बाद उस धन के आगे के प्रवाह या मनी ट्रेल को जांच में पर्याप्त रूप से नहीं तलाशा गया.
मामले में सरकारी धन कथित रूप से फर्जी फर्म को भुगतान किए जाने की बात सामने आई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि भुगतान के बाद पैसा कहां गया और क्या आरोपितों को उससे कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिला, इसकी कड़ी स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं की गई.
ऐसे में केवल दस्तावेजों में दवाओं की प्राप्ति प्रमाणित करने की भूमिका को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ की ठोस स्थापना के बराबर नहीं माना जा सकता.
62 गवाहों की गवाही पर भी उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में बड़ी संख्या में गवाह पेश किए जाने के तरीके पर भी चिंता जताई. इस मामले में अभियोजन ने कुल 62 गवाहों की जांच कराई थी.
हालांकि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में केवल नौ गवाहों के साक्ष्य पर भरोसा किया था.
पीठ ने इस अंतर की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मुकदमों में बड़ी मात्रा में साक्ष्य प्रस्तुत करना अपने आप में अभियोजन के मामले को मजबूत नहीं करता. महत्वपूर्ण यह है कि उपलब्ध साक्ष्य आरोप के आवश्यक कानूनी तत्वों को साबित करते हैं या नहीं.
इस मामले में इतने बड़े साक्ष्य के बावजूद आरोपी द्वारा आर्थिक लाभ हासिल किए जाने का आवश्यक तथ्य स्थापित नहीं हो सका.
कई धाराओं में पहले ही मिल चुकी थी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि सीबीआई ने हाई कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोपितों को दी गई राहत को चुनौती नहीं दी थी.
इसका अर्थ यह हुआ कि उन आरोपों में हाई कोर्ट का निर्णय अंतिम स्थिति में था और सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धारा के तहत दोषसिद्धि का प्रश्न था.
पीठ ने उपलब्ध रिकॉर्ड और हाई कोर्ट के निष्कर्षों का परीक्षण करने के बाद पाया कि इस धारा के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते.
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर किया बरी
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खानिंद्र कुमार दत्ता की अपील स्वीकार कर ली और उनके खिलाफ धारा 13(1)(डी) के तहत कायम दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया.
न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि दत्ता किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं हैं और हिरासत में हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए. यदि वे जमानत पर हैं तो उनके जमानत बांड रद्द कर दिए जाएं.
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया कि भ्रष्टाचार के आरोप में केवल सरकारी प्रक्रिया में कथित अनियमितता या किसी भुगतान से जुड़ी भूमिका पर्याप्त नहीं है. जिस कानूनी प्रावधान के तहत दोषसिद्धि की जा रही है, उसके प्रत्येक आवश्यक तत्व को अभियोजन को साक्ष्य से साबित करना होगा.
मामले का शीर्षक खानिंद्र कुमार दत्ता बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो है और निर्णय आपराधिक अपील संख्या 1882/2024 में 8 सितंबर 2026 को सुनाया गया.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

