इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, छात्रा की रासुका निरुद्धता रद्द, डीएम समेत अधिकारियों के वेतन से वसूला जाएगा पांच लाख रुपये

इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, छात्रा की रासुका निरुद्धता रद्द, डीएम समेत अधिकारियों के वेतन से वसूला जाएगा पांच लाख रुपये

प्रेषित समय :17:08:14 PM / Tue, Sep 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

प्रयागराज. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा एवं कार्यकर्ता आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध किए जाने के मामले में प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है. न्यायालय ने निरुद्धता आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उपलब्ध सामग्री से छात्रा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने का पर्याप्त आधार नहीं बनता था. न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि निरुद्धता के आधार में ठोस सामग्री का अभाव था और आदेश पारित करते समय समुचित न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया.

अदालत ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया है. यह राशि गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी और मामले में जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूल की जाएगी. अदालत ने जिम्मेदारी की सीमा प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करने वाले थाना प्रभारी तक तय करने की बात कही है. न्यायालय ने अधिकारियों के आचरण पर अपनी अप्रसन्नता को उनके सेवा अभिलेख में दर्ज करने का निर्देश भी दिया है.

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल पर उठाया सवाल
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिक प्रदर्शन से जुड़ा है. प्रदर्शन में श्रमिक बेहतर मजदूरी और मानवीय कार्य परिस्थितियों की मांग कर रहे थे. इसी घटनाक्रम से जुड़े मामलों में आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया था. बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्धता की कार्रवाई की गई.

अदालत ने इस कार्रवाई की समीक्षा करते हुए पाया कि निरुद्धता के लिए जिस सामग्री पर भरोसा किया गया, उसमें ऐसा ठोस आधार नहीं था जिससे यह साबित हो कि छात्रा ने हिंसा भड़काई या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वैसा गंभीर खतरा पैदा किया था, जिसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी कठोर व्यवस्था का इस्तेमाल आवश्यक हो. न्यायालय ने कहा कि इस तरह के असाधारण कानून का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक कानून के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता.

अदालत ने कहा निरुद्धता के आधार में ठोस सामग्री नहीं
खंडपीठ ने कहा कि निरुद्धता आदेश और उसके आधार सामग्री से पर्याप्त रूप से समर्थित नहीं थे. अदालत के अनुसार आदेश में विचारों और आशंकाओं को तथ्यात्मक आधार से जोड़ने के बजाय अनुमान और राय पर अधिक भरोसा किया गया.

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करना असाधारण कार्रवाई है. इसलिए जिलाधिकारी को पुलिस रिपोर्ट और उपलब्ध सामग्री की बारीकी से जांच करनी चाहिए थी. केवल पुलिस रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों के आधार पर कठोर निरुद्धता आदेश पारित नहीं किया जा सकता.

न्यायालय ने यह भी माना कि आकृति चौधरी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और उपलब्ध सामग्री में उनके द्वारा हिंसा के लिए उकसाए जाने का स्पष्ट प्रमाण नहीं दिखता.

‘ओरवेलियन डिस्टोपिया’ की चेतावनी
फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नौकरशाही के मनमाने रवैये को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की. अदालत ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी इसी तरह निरंकुश तरीके से शक्तियों का इस्तेमाल करते रहे तो उत्तर प्रदेश को ‘ओरवेलियन डिस्टोपिया’ में बदलने में देर नहीं लगेगी.

‘ओरवेलियन डिस्टोपिया’ का संदर्भ जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 1984 से जुड़ा है, जिसमें अत्यधिक सरकारी नियंत्रण, नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन और सत्ता के मनमाने इस्तेमाल की तस्वीर सामने आती है. अदालत ने इस शब्द का इस्तेमाल प्रशासनिक शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल के संभावित खतरों को रेखांकित करने के लिए किया.

संविधान के प्रति निष्ठा पर अदालत की दो टूक
अदालत ने अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी को भी स्पष्ट किया. खंडपीठ ने कहा कि सरकारी अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति.

न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को व्यापक शक्तियां इसलिए दी जाती हैं, क्योंकि उनसे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, गरिमा और कल्याण की रक्षा की अपेक्षा की जाती है. इन शक्तियों का इस्तेमाल नागरिक स्वतंत्रता को दबाने या किसी व्यक्ति को उदाहरण बनाने के लिए नहीं किया जा सकता.

छात्रा को ‘उदाहरण’ बनाने की कोशिश पर सवाल
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि परिस्थितियों से ऐसा प्रतीत होता है कि जिलाधिकारी की मंशा छात्रा को ‘उदाहरण’ बनाकर दूसरे लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर अपने अधिकारों के समर्थन में आवाज उठाने से रोकने की थी.

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों और विचारों को सामने रखना संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों का हिस्सा है. केवल इस आशंका के आधार पर कि किसी प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, लोगों को सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होने या अपनी मांग उठाने से नहीं रोका जा सकता.

पुलिस की कार्रवाई में भी विसंगतियां मिलीं
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने छात्रा की गिरफ्तारी से जुड़े रिकॉर्ड में भी विसंगतियां पाईं. उपलब्ध विवरण के अनुसार आकृति को 11 अप्रैल को शाम करीब साढ़े पांच बजे नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई, जबकि राज्य की ओर से गिरफ्तारी की अलग तारीख बताई गई थी.

अदालत ने पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज सामान्य डायरी संख्या से संबंधित दस्तावेजों की भी जांच की. न्यायालय के अनुसार जिस दस्तावेज को गिरफ्तारी से पहले तैयार बताया गया, उसमें ऐसी सामान्य डायरी संख्या दर्ज थी जो बाद में दर्ज की गई थी. इस आधार पर अदालत ने प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए और इसे बाद में तैयार की गई कार्रवाई के रूप में देखा.

पांच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति का आदेश
न्यायालय ने छात्रा के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए पांच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति तय की. महत्वपूर्ण बात यह है कि इस राशि का भार सीधे सरकारी खजाने पर डालने के बजाय जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूल करने का निर्देश दिया गया है.

इसमें गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी के साथ वे अधिकारी भी शामिल किए जाएंगे, जिनकी भूमिका निरुद्धता की प्रक्रिया में सामने आती है. अदालत ने जिम्मेदारी की सीमा प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करने वाले थाना प्रभारी तक तय करने की बात कही है.

सेवा अभिलेख में दर्ज होगी अधिकारियों की अप्रसन्नता
अदालत ने केवल क्षतिपूर्ति तक मामला सीमित नहीं रखा. आदेश में जिलाधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्धता संबंधी दस्तावेज तैयार करने में शामिल पुलिस अधिकारियों के आचरण के प्रति न्यायालय की अप्रसन्नता को उनके सेवा अभिलेख में दर्ज करने का निर्देश भी दिया गया.

इस निर्देश का प्रशासनिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि सेवा अभिलेख में दर्ज टिप्पणी संबंधित अधिकारी के भविष्य के प्रशासनिक मूल्यांकन में प्रभाव डाल सकती है. अदालत ने इस माध्यम से यह संदेश दिया कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी कार्रवाई में अधिकारियों को अतिरिक्त सावधानी और जिम्मेदारी बरतनी होगी.

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की निरुद्धता रद्द लेकिन अन्य मामलों में हिरासत जारी
अदालत ने आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्धता को रद्द कर दिया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सभी मामलों में स्वतः मुक्त हो गई हैं. उपलब्ध न्यायालयीन विवरण के अनुसार वह मूल आपराधिक मामलों में न्यायिक हिरासत में बनी हुई हैं और अन्य मामलों में जमानत की स्थिति अलग है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है. अदालत ने साफ किया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी अधिकारियों को मिली है, लेकिन इस जिम्मेदारी का निर्वहन संविधान से ऊपर नहीं हो सकता. राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल भी ठोस और विश्वसनीय सामग्री के आधार पर ही किया जाना चाहिए.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-