रेगुलर होने से पहले की नौकरी भी पेंशन में जुड़ेगी, सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के हक में दिया फैसला

रेगुलर होने से पहले की नौकरी भी पेंशन में जुड़ेगी, सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के हक में दिया फैसला

प्रेषित समय :20:12:06 PM / Thu, Sep 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. किसी कर्मचारी को बाद में नियमित यानी रेगुलर कर दिया गया हो तो उसकी पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ तय करते समय केवल रेगुलर होने की तारीख को आधार नहीं बनाया जा सकता. नियमित होने से पहले की गई कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन या वर्क-चार्ज की सेवा को भी परिस्थितियों के अनुसार पेंशन के लिए पात्र सेवा में शामिल किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड से जुड़े मामले में यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है.

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड की अपील खारिज करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. हाई कोर्ट ने लंबे समय से काम कर रहे उन कर्मचारियों को पेंशन संबंधी लाभ देने का निर्देश दिया था, जिन्हें बाद में अगस्त 2004 में नियमित किया गया था.

वर्षों तक काम करने के बाद हुए थे रेगुलर
मामले में संबंधित कर्मचारियों की नियुक्तियां 1993 से 1996 के बीच क्लर्क और चपरासी के पदों पर हुई थीं. शुरुआत में उन्हें कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन और वर्क-चार्ज व्यवस्था के तहत काम पर रखा गया था. इनमें कई नियुक्तियां 89 दिनों की अवधि के लिए होती थीं.

समय के साथ कुछ कर्मचारियों को जूनियर असिस्टेंट और सीनियर असिस्टेंट के पद पर पदोन्नति भी मिली. हालांकि, उनकी सेवा व्यवस्था को लेकर लगातार विवाद चलता रहा. नौकरी समाप्त किए जाने, दोबारा नियुक्ति और नियमितीकरण को लेकर कर्मचारियों को कई बार कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी.

वर्ष 1995 में 224 एडहॉक क्लर्कों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं. इसके बाद इनमें से 184 कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट आधार पर फिर काम दिया गया. बाद में भर्ती प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन कर्मचारी अपनी सेवा जारी रखने और नियमित होने की मांग को लेकर अदालतों का दरवाजा खटखटाते रहे.

पेंशन की नई व्यवस्था से पैदा हुआ विवाद
मामले में पेंशन का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि एक जनवरी 2004 से नई परिभाषित अंशदायी पेंशन योजना लागू हुई थी. कर्मचारियों की सेवा इससे पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन उन्हें अगस्त 2004 में औपचारिक रूप से नियमित नियुक्ति पत्र दिए गए.

कर्मचारियों का कहना था कि उनकी वास्तविक सेवा नियमितीकरण से काफी पहले शुरू हो गई थी. इसलिए केवल अगस्त 2004 की तारीख को उनकी नियुक्ति की शुरुआत मानकर उन्हें नई पेंशन व्यवस्था में डालना उचित नहीं होगा.

दूसरी ओर पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड का तर्क था कि कर्मचारी अगस्त 2004 में नियमित नियुक्त हुए और इसी आधार पर उनकी पेंशन संबंधी स्थिति तय की जानी चाहिए.

बोर्ड ने कहा हम स्वायत्त संस्था हैं
सुप्रीम कोर्ट में बोर्ड की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड एक स्वायत्त संस्था है. इसलिए पंजाब सरकार द्वारा बनाई गई नियमितीकरण नीति उसे अपने आप लागू करने के लिए बाध्य नहीं करती थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट पहले ही यह मान चुका था कि बोर्ड को सरकार की नियमितीकरण नीति अपनाने या नहीं अपनाने की स्वतंत्रता थी.

लेकिन बाद में बोर्ड ने स्वयं उस नीति को आवश्यक बदलावों के साथ अपनाने का निर्णय लिया. इसलिए नीति को अपनाने के बाद उससे निकलने वाले परिणामों को बोर्ड नजरअंदाज नहीं कर सकता.

अपनी ही अपनाई नीति से पीछे नहीं हट सकता बोर्ड
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बोर्ड ने जब नियमितीकरण की नीति को अपनाने का निर्णय स्वयं लिया तो बाद में केवल स्वायत्त संस्था होने का तर्क देकर उसके प्रभाव से बचने की कोशिश नहीं की जा सकती.

अदालत के अनुसार, किसी संस्था को अपनी प्रशासनिक स्थिति का लाभ लेकर कर्मचारियों के लंबे समय से चले आ रहे सेवा संबंध को केवल तकनीकी आधार पर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

यही वजह रही कि कर्मचारियों की पूर्व सेवा को पेंशन के लिए पात्र सेवा मानने के हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा.

सिर्फ रेगुलर होने की तारीख से कर्मचारी की सेवा नहीं मानी जाएगी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि यदि कर्मचारी ने नियमित होने से पहले लंबे समय तक लगातार सेवा की है और बाद में उसे नियमित भी कर दिया गया, तो केवल नियमितीकरण की तारीख के आधार पर उसकी पिछली सेवा को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि नियमित होने से पहले कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन या वर्क-चार्ज के आधार पर की गई सेवा को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए पात्र सेवा के रूप में गिना जाना चाहिए, खासकर तब जब सेवा में आया अंतर केवल कागजी या बनावटी हो अथवा प्रशासनिक परिस्थितियों या न्यायालय के आदेशों के कारण हुआ हो.

इसका सीधा मतलब यह है कि किसी कर्मचारी ने वर्षों तक वास्तविक रूप से काम किया है तो बाद में नियमित नियुक्ति होने मात्र से उसकी पहले की सेवा को हमेशा शून्य नहीं माना जा सकता.

पहले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
पीठ ने हरबंस लाल बनाम पंजाब राज्य मामले में दिए गए अपने पुराने फैसले का भी उल्लेख किया. उस मामले में एक कर्मचारी 1988 से दैनिक वेतन पर पंप ऑपरेटर के रूप में काम कर रहा था और वर्ष 2005 में नियमित हुआ था.

सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि नियमित होने से पहले की उसकी दैनिक वेतन वाली सेवा को पेंशन के लिए गिना जाना चाहिए. बाद में नियमित किए जाने से वह लागू पेंशन व्यवस्था के संदर्भ में बिल्कुल नया कर्मचारी नहीं बन जाता.

वर्तमान मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत को लागू किया.

पेंशन सिर्फ भुगतान नहीं, सामाजिक सुरक्षा है
अदालत ने संविधान पीठ के डीएस नकारा बनाम भारत संघ के फैसले का भी उल्लेख किया. इस फैसले में पेंशन को केवल सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली रकम नहीं, बल्कि लंबे समय तक की गई सेवा से जुड़ा सामाजिक कल्याण लाभ माना गया था.

इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी ने यदि वर्षों तक लगातार सेवा की है और अंत में उसे नियमित भी कर दिया गया, तो केवल तकनीकी या बनावटी कारणों के आधार पर उसे पेंशन से जुड़े लाभों से वंचित करना सामान्य तौर पर उचित नहीं होगा.

सेवा में कागजी अंतर से अधिकार खत्म नहीं होगा
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू सेवा में आने वाले कथित अंतर को लेकर भी है. कई बार कर्मचारी को कुछ समय के लिए तकनीकी रूप से सेवा से बाहर दिखाया जाता है और बाद में फिर नियुक्त कर दिया जाता है. यदि ऐसा अंतर वास्तविक रूप से सेवा समाप्त होने के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया, परिस्थितियों या न्यायालय के आदेश के कारण पैदा हुआ है तो उसे कर्मचारी के पेंशन अधिकारों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

अदालत ने इसी कारण वास्तविक सेवा संबंध को तकनीकी नियुक्ति पत्र या बाद की नियमित नियुक्ति से अधिक महत्व दिया.

पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड की अपील खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने सभी परिस्थितियों को देखते हुए पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड की अपील खारिज कर दी. इसके साथ ही हाई कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा गया, जिसमें कर्मचारियों की नियमित होने से पहले की सेवा को पेंशन संबंधी लाभों के लिए ध्यान में रखने का निर्देश दिया गया था.

फैसले से यह सिद्धांत सामने आता है कि पेंशन का अधिकार तय करते समय कर्मचारी की वास्तविक और लंबे समय तक की गई सेवा को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसे नियमित नियुक्ति बाद में मिली थी.

यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए विशेष महत्व रखता है, जिन्होंने वर्षों तक कॉन्ट्रैक्ट, एडहॉक, दैनिक वेतन या वर्क-चार्ज व्यवस्था में काम करने के बाद नियमित नियुक्ति हासिल की है और जिनकी पेंशन संबंधी पात्रता केवल नियमितीकरण की तारीख के कारण विवाद में आ जाती है.

मामला — पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड एवं अन्य बनाम सतनाम सिंह एवं अन्य

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-