एनजीटी की 500 मीटर की पाबंदी से क्रशर संचालकों में खलबली, अब रीवा सतना प्रशासन को करना होगा संयुक्त सर्वे

एनजीटी की 500 मीटर की पाबंदी से क्रशर संचालकों में खलबली, अब रीवा सतना प्रशासन को करना होगा संयुक्त सर्वे

प्रेषित समय :16:08:38 PM / Thu, Sep 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. सतना जिले के कोठार-देवरा क्षेत्र में पत्थर तोड़ने वाले संयंत्रों और खनन गतिविधियों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश के बाद अब प्रशासन के सामने क्रशर इकाइयों का नए सिरे से भौतिक सत्यापन करने की चुनौती खड़ी हो गई है. अधिकरण ने आबादी क्षेत्र, मंदिर और नए अथवा सरकारी निर्माण से 500 मीटर के दायरे में पत्थर तोड़ने वाले संयंत्रों के संचालन को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं. ऐसे में अब रीवा और सतना प्रशासन को संयुक्त सर्वेक्षण कर यह तय करना होगा कि कौन-कौन से संयंत्र निर्धारित दूरी के भीतर संचालित हो रहे हैं.

एनजीटी ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि केवल पुरानी पर्यावरण मंजूरी के आधार पर खनन गतिविधियां जारी नहीं रखी जा सकतीं. मामले में सामने आई जांच रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र में 14 पत्थर तोड़ने वाले संयंत्र पाए गए थे. इनमें एक पहले से बंद था, जबकि शेष 13 में केवल सात के पास संचालन की वैध सहमति थी. छह संयंत्र ऐसे मिले जिनके पास केवल स्थापना की सहमति थी अथवा वे वैध संचालन अनुमति के बिना संचालित हो रहे थे.

500 मीटर की दूरी अब सबसे अहम
एनजीटी के आदेश के बाद क्रशर इकाइयों की स्थिति निर्धारित करने में 500 मीटर की दूरी सबसे महत्वपूर्ण मानक बन गई है. आबादी, मंदिर या नए अथवा सरकारी निर्माण के आसपास संचालित क्रशर इकाइयों का संयुक्त सर्वेक्षण किया जाना है. सर्वेक्षण के दौरान यह देखा जाएगा कि संबंधित संयंत्र संवेदनशील क्षेत्र से कितनी दूरी पर है और उसके संचालन के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमति मौजूद है या नहीं.

इससे पहले संयुक्त समिति की जांच में क्रशर इकाइयों के बीच औसत दूरी 100 मीटर से भी कम पाई गई थी. धूल नियंत्रण की व्यवस्थाएं भी पर्याप्त नहीं मिली थीं. इन परिस्थितियों को देखते हुए अधिकरण ने पर्यावरणीय नियमों के पालन को लेकर सख्त रुख अपनाया.

13 में सात के पास ही वैध संचालन सहमति
संयुक्त समिति की जांच रिपोर्ट ने क्रशर संचालन की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए थे. क्षेत्र में मिले 14 संयंत्रों में से एक पहले ही बंद था. शेष 13 संयंत्रों में सात के पास संचालन की वैध सहमति मिली, जबकि छह संयंत्रों के संबंध में संचालन की वैधानिक स्थिति संतोषजनक नहीं पाई गई.

इस रिपोर्ट के आधार पर मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने 12 संयंत्रों के विरुद्ध बंद करने और पर्यावरण क्षतिपूर्ति से संबंधित कार्रवाई की थी. अब एनजीटी के आदेश के बाद इन इकाइयों की स्थिति और भी महत्वपूर्ण हो गई है. प्रशासन को यह देखना होगा कि जिन इकाइयों पर कार्रवाई की गई थी, वे वास्तव में बंद हैं या नहीं और निर्धारित दूरी के नियम का पालन किस स्तर तक हो रहा है.

पुरानी पर्यावरण मंजूरी से नहीं चलेगा काम
एनजीटी ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की है कि पुरानी पर्यावरण मंजूरी को आधार बनाकर खनन गतिविधि को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता. पर्यावरणीय मंजूरी और संचालन से संबंधित वर्तमान नियमों का पालन करना आवश्यक होगा.

इस निर्देश का असर उन खनन और क्रशर इकाइयों पर पड़ सकता है जो वर्षों पुरानी अनुमति या मंजूरी का हवाला देकर गतिविधियां संचालित कर रही हैं. अब अनुमति की वैधता, उसकी शर्तों और वर्तमान परिस्थितियों के बीच सामंजस्य की जांच करना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी.

धूल नियंत्रण की व्यवस्था पर भी सवाल
संयुक्त समिति की जांच में क्रशर संयंत्रों पर धूल नियंत्रण की व्यवस्था अपर्याप्त पाई गई थी. पत्थर तोड़ने और उससे जुड़ी गतिविधियों के दौरान निकलने वाली धूल आसपास के वातावरण को प्रभावित कर सकती है. आबादी के नजदीक क्रशर होने पर इसका प्रभाव सीधे स्थानीय लोगों तक पहुंचने की आशंका रहती है.

इसी वजह से एनजीटी ने केवल दूरी के मानक पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन को भी महत्वपूर्ण माना है. अब निरीक्षण के दौरान यह देखना होगा कि बंद करने के निर्देश वाले संयंत्र वास्तव में बंद हैं या नहीं तथा संचालन की अनुमति वाले संयंत्र निर्धारित पर्यावरणीय शर्तों का पालन कर रहे हैं या नहीं.

रीवा-सतना प्रशासन को संयुक्त सर्वेक्षण
एनजीटी ने रीवा और सतना प्रशासन को संयुक्त सर्वेक्षण तथा निगरानी के निर्देश दिए हैं. यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामले में क्रशर और खनन गतिविधियों की वास्तविक स्थिति का मौके पर जाकर सत्यापन करना होगा.

सर्वेक्षण में आबादी, मंदिर और सरकारी या नए निर्माण से संबंधित दूरी का निर्धारण किया जाएगा. साथ ही प्रत्येक क्रशर की अनुमति और संचालन की स्थिति का परीक्षण किया जा सकता है. इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि एनजीटी के 500 मीटर के मानक की जद में कितनी इकाइयां आती हैं.

बंद इकाइयों के दोबारा संचालन पर भी नजर
एनजीटी के आदेश के बाद प्रशासन के सामने एक और चुनौती उन इकाइयों की निगरानी की है, जिनके खिलाफ पहले से बंद करने की कार्रवाई की जा चुकी है. यदि कोई संयंत्र कार्रवाई के बावजूद दोबारा संचालित पाया जाता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार आगे की कार्रवाई की आवश्यकता होगी.

इसके लिए केवल कागजी रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं होंगे. मौके पर निरीक्षण और नियमित निगरानी से ही यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आदेश का वास्तविक रूप से पालन हो रहा है.

पर्यावरण क्षतिपूर्ति का मामला भी महत्वपूर्ण
12 संयंत्रों के खिलाफ पर्यावरण क्षतिपूर्ति की कार्रवाई पहले ही सामने आ चुकी है. अब यह देखना होगा कि संबंधित इकाइयों से पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए कितनी राशि निर्धारित की जाती है और उसकी वसूली किस स्थिति में है.

एनजीटी के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को केवल सामान्य प्रशासनिक अनियमितता के रूप में नहीं देखा जा सकता. क्रशर संचालन के दौरान दूरी, अनुमति और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े नियमों का पालन आवश्यक है.

आदेश के बाद कार्रवाई का इंतजार
फिलहाल एनजीटी के निर्देशों के बाद सबसे अधिक नजर अब प्रशासन के संयुक्त सर्वेक्षण पर है. सर्वेक्षण से ही यह तस्वीर साफ होगी कि कोठार-देवरा क्षेत्र में कौन से क्रशर 500 मीटर के प्रतिबंधित दायरे में आते हैं और कौन से संयंत्र नियमानुसार संचालन की स्थिति में हैं.

आने वाले चरण में प्रशासन की रिपोर्ट और मौके पर होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी. यदि सर्वेक्षण में प्रतिबंधित दायरे में क्रशर संचालित मिलते हैं तो उन्हें बंद करने की कार्रवाई करनी होगी. वहीं जिन इकाइयों के पास संचालन की वैध सहमति नहीं है, उनकी स्थिति भी जांच के दायरे में आएगी.

एनजीटी के आदेश ने फिलहाल गेंद रीवा और सतना प्रशासन के पाले में डाल दी है. अब देखना यह होगा कि संयुक्त सर्वेक्षण कितनी जल्दी होता है और उसके बाद प्रतिबंधित दायरे में संचालित क्रशर इकाइयों के खिलाफ जमीन पर कितनी प्रभावी कार्रवाई दिखाई देती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-