भोपाल में वन भूमि पर कब्जे को लेकर एनजीटी सख्त, तीन महीने में सीमांकन और कार्रवाई के निर्देश

भोपाल में वन भूमि पर कब्जे को लेकर एनजीटी सख्त, तीन महीने में सीमांकन और कार्रवाई के निर्देश

प्रेषित समय :16:38:02 PM / Sat, Aug 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भोपाल. राजधानी में वन भूमि के संरक्षण और सरकारी जमीन पर बढ़ते अतिक्रमण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मध्य प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय करते हुए सख्त रुख अपनाया है. ट्रिब्यूनल के निर्देश का असर केवल मौजूदा कब्जों को हटाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भोपाल जिले में वन भूमि की वास्तविक स्थिति का तकनीकी आधार पर नए सिरे से निर्धारण भी करना होगा. इसके लिए प्रशासन को पारंपरिक राजस्व अभिलेखों के साथ आधुनिक तकनीक का सहारा लेने के निर्देश दिए गए हैं.

एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने भोपाल कलेक्टर और संभागीय वन अधिकारी को संयुक्त रूप से वन भूमि का सर्वे करने को कहा है. सर्वे में जीआईएस, जीपीएस और उपग्रह चित्रों का उपयोग किया जाना है, ताकि जमीन की सीमा को लेकर भविष्य में किसी तरह का विवाद न रहे. इस प्रक्रिया के बाद तैयार रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि अभिलेखों में दर्ज वन भूमि का वास्तविक भू-भाग कितना है और उसके किस हिस्से पर वर्तमान में गैरकानूनी गतिविधियां या कब्जे मौजूद हैं.

ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां अतिक्रमण सामने आता है और उसे हटाने में कोई न्यायिक अथवा अन्य कानूनी बाधा नहीं है, वहां प्रशासन को तीन महीने के भीतर कार्रवाई पूरी करनी होगी. इस निर्देश से वन भूमि पर लंबे समय से चले आ रहे कब्जों के मामलों में प्रशासनिक निष्क्रियता पर भी सवाल उठे हैं. आदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कार्रवाई केवल कब्जा हटाने तक सीमित न रहकर भविष्य में दोबारा अतिक्रमण रोकने की व्यवस्था से भी जुड़ी है.

भोपाल की सड़कों के बीच बने केंद्रीय वर्ज पर कब्जों को लेकर भी एनजीटी ने अलग से दिशा-निर्देश दिए हैं. ऐसे स्थानों को संरक्षित करने के लिए तार की बाड़ लगाने, पौधारोपण करने और जियो-टैगिंग कराने जैसे उपाय अपनाने को कहा गया है. इसका उद्देश्य सड़क किनारे और मध्य भाग की हरित पट्टियों को धीरे-धीरे व्यावसायिक या अन्य निर्माण गतिविधियों में बदलने से रोकना है.

ग्रीन बेल्ट के संदर्भ में भी ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट संदेश दिया है. हरित क्षेत्र में कंक्रीट आधारित निर्माण को रोकने का निर्देश इस चिंता से जुड़ा है कि शहर के विकास के नाम पर खुले और हरित क्षेत्रों का स्वरूप लगातार बदल रहा है. भोपाल जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में इसका सीधा संबंध जल निकासी, भूजल पुनर्भरण, तापमान नियंत्रण और पर्यावरणीय संतुलन से भी है.

मामले की सुनवाई के दौरान वन क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों पर भी ट्रिब्यूनल ने गंभीर टिप्पणी की. भारतीय राज्य वन रिपोर्ट 2023 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि भोपाल जिले के कुल क्षेत्रफल में वन क्षेत्र की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत से भी कम है. वर्ष 2021 से 2023 के बीच जिले के वन क्षेत्र में करीब 0.54 वर्ग किलोमीटर की कमी दर्ज की गई. ट्रिब्यूनल ने वन क्षेत्र में वृद्धि के आंकड़ों के आकलन पर भी सवाल उठाते हुए इसे गलत तरीके से गणना किए जाने की बात कही.

एनजीटी के आदेश का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें वन संरक्षण को केवल विभागीय कार्रवाई का विषय न मानकर राजस्व, वन और स्थानीय प्रशासन के समन्वित प्रयास से जोड़ दिया गया है. तकनीकी सीमांकन के बाद तैयार होने वाला रिकॉर्ड भविष्य में भूमि उपयोग और अतिक्रमण संबंधी विवादों में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है.

ज्यूडिशियल मेंबर न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने ये निर्देश डॉ. सुभाष सी. पांडे बनाम भोपाल नगर निगम एवं अन्य मामले में दिए. निर्देशों के साथ ट्रिब्यूनल ने याचिका का निपटारा कर दिया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-