पुलिस में अच्छी नीयत से शिकायत करना मानहानि नहीं, गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

पुलिस में अच्छी नीयत से शिकायत करना मानहानि नहीं, गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

प्रेषित समय :19:10:20 PM / Sat, Sep 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

अहमदाबाद. किसी व्यक्ति के खिलाफ कथित आपराधिक कृत्य को लेकर ऐसे अधिकारी के समक्ष शिकायत करना, जिसे उस मामले की कानूनी जांच या कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है, हर स्थिति में मानहानि का अपराध नहीं बनता. गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि शिकायत संबंधित अधिकारी के समक्ष अच्छी नीयत से की गई है, तो केवल शिकायत किए जाने के आधार पर उसे मानहानि नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायत को मानहानिकारक बताने के लिए उसके आधार और आरोपों का ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर होना जरूरी है.

न्यायमूर्ति जेएल ओदेदरा की पीठ ने मामले में याचिकाकर्ता की उस चुनौती को खारिज कर दिया, जिसमें मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा मानहानि की शिकायत पर आगे कार्रवाई से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि निचली दोनों अदालतों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है.

जमीन को लेकर पुलिस शिकायत से शुरू हुआ विवाद
मामला नर्मदा जिले में जमीन के एक टुकड़े से जुड़े विवाद का था. याचिकाकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादी नंबर दो ने पुलिस के समक्ष संबंधित जमीन को वन भूमि बताते हुए शिकायत या आवेदन दिया था. याचिकाकर्ता के अनुसार इस शिकायत के बाद उसके खिलाफ जमीन से जुड़े आपराधिक कृत्य के आरोप सामने आए.

विवाद उस समय और बढ़ गया जब एक फेसबुक उपयोगकर्ता की ओर से सोशल मीडिया पर इस मामले से संबंधित जानकारी और तस्वीरें पोस्ट किए जाने का दावा किया गया. याचिकाकर्ता का आरोप था कि फेसबुक पोस्ट में यह बताया गया कि पुलिस के समक्ष ऐसी शिकायत दी गई है, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता और उसके साथियों के कहने पर मवेशियों ने जमीन पर खड़ी फसल चर ली.

याचिकाकर्ता ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उसका जमीन से जुड़े किसी भी आपराधिक कृत्य से कोई संबंध नहीं था. उसका दावा था कि इस तरह की जानकारी सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों के जरिए सामने आने से उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा.

मानहानि की कार्रवाई के लिए मजिस्ट्रेट अदालत पहुंचे
याचिकाकर्ता ने डेडियापाड़ा के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत का रुख किया. उसने भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत मानहानि की कार्रवाई की मांग की. याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष ‘गुजरात समाचार’ के वडोदरा संस्करण और ‘संदेश’ के भरूच-नर्मदा संस्करण की समाचार कटिंग भी पेश कीं.

उसका आरोप था कि प्रतिवादी नंबर दो के कहने पर उसके खिलाफ दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित कराई गई. याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि प्रतिवादी के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई जाए.

हालांकि मजिस्ट्रेट अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने पाया कि जिस कथित पुलिस शिकायत को आधार बनाकर मानहानि का आरोप लगाया गया था, वह दस्तावेज याचिकाकर्ता ने रिकॉर्ड पर पेश ही नहीं किया था.

मजिस्ट्रेट ने कहा शिकायत की सत्यता जांच का विषय
मजिस्ट्रेट अदालत ने यह भी कहा कि कथित पुलिस शिकायत में लगाए गए आरोप वास्तव में झूठे थे या सही, यह अपने आप में जांच का विषय है. केवल यह आरोप लगा देना कि पुलिस में किसी के खिलाफ शिकायत की गई और इससे उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई, मानहानि का मामला स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने पुनरीक्षण अदालत का रुख किया. हालांकि वहां भी उसे राहत नहीं मिली और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा गया. इसके बाद याचिकाकर्ता ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी.

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर दस्तावेज नहीं मिलने पर उठाया सवाल
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान सबसे पहले उस कथित पुलिस शिकायत के रिकॉर्ड पर होने की स्थिति को देखा, जिसे मानहानि के आरोप का मुख्य आधार बनाया गया था.

न्यायमूर्ति जेएल ओदेदरा ने पाया कि पुलिस के पास मौजूद बताए जा रहे उस दस्तावेज को याचिकाकर्ता ने मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया था. इतना ही नहीं, पुनरीक्षण कार्यवाही के दौरान भी वह दस्तावेज रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया गया.

अदालत ने इसी बिंदु को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि जिस दस्तावेज के आधार पर याचिकाकर्ता प्रतिवादी पर मानहानि का आरोप लगा रहा है, वही दस्तावेज न्यायिक रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है. ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई आगे बढ़ाने का आधार नहीं बनता.

फेसबुक पोस्ट को लेकर भी अदालत ने देखी स्थिति
हाईकोर्ट ने फेसबुक पोस्ट से जुड़े पहलू को भी देखा. अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट अदालत की कार्यवाही में संबंधित फेसबुक उपयोगकर्ता को पक्षकार नहीं बनाया गया था. याचिकाकर्ता का आरोप था कि फेसबुक उपयोगकर्ता ने प्रतिवादी नंबर दो के कहने पर उसके खिलाफ सामग्री प्रकाशित की थी.

लेकिन अदालत के सामने इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं रखा गया. केवल सोशल मीडिया पर किसी सामग्री के प्रकाशित होने और उसके पीछे किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका होने का आरोप लगाने से आपराधिक मानहानि की कार्रवाई का आधार तैयार नहीं हो जाता.

अदालत ने इस पहलू को भी याचिकाकर्ता के दावे की कमजोरी के रूप में देखा.

अखबार की खबरों में भी नाम स्पष्ट नहीं था
मामले में पेश की गई अखबार की खबरों को लेकर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण तथ्य देखा. अदालत ने पाया कि जिन समाचारों का हवाला याचिकाकर्ता ने मानहानि के समर्थन में दिया, उनमें संबंधित जमीन और फसल चराने के मामले का उल्लेख तो था, लेकिन याचिकाकर्ता का नाम स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया था.

अदालत के अनुसार समाचार रिपोर्ट में किसी व्यक्ति को स्पष्ट रूप से उस कथित कृत्य से जोड़ना ही स्थापित नहीं हुआ तो केवल समाचार कटिंग के आधार पर मानहानि की आपराधिक कार्रवाई को आगे बढ़ाने का आधार कमजोर हो जाता है.

अच्छी नीयत से सक्षम अधिकारी को शिकायत पर कानून की सुरक्षा
मामले में हाईकोर्ट ने मानहानि कानून के उस महत्वपूर्ण सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप ऐसे अधिकारी के सामने अच्छी नीयत से लगाए जाते हैं, जिसके पास उस मामले की कानूनी जांच या कार्रवाई का अधिकार है, तो ऐसी शिकायत को परिस्थितियों के आधार पर मानहानि का अपराध नहीं माना जाता.

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी कथित अपराध के संबंध में पुलिस या अन्य सक्षम अधिकारी के पास शिकायत करता है, तो केवल शिकायत करने की वजह से उसके खिलाफ मानहानि का मामला नहीं बनाया जा सकता. शिकायत की प्रकृति, उद्देश्य और परिस्थितियों को भी देखा जाना आवश्यक है.

यह सुरक्षा हालांकि हर प्रकार की शिकायत पर स्वतः लागू नहीं होती. शिकायत में दुर्भावना, जानबूझकर झूठे आरोप या किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की मंशा साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य हों तो स्थिति अलग हो सकती है. लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसा ठोस आधार नहीं मिला.

अदालत ने कहा आरोपों की जांच के लिए ठोस आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता मजिस्ट्रेट अदालत या पुनरीक्षण कार्यवाही के दौरान अपने आरोपों की जांच आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त और ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर पाया.

अदालत ने यह भी कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि प्रतिवादी नंबर दो ने पुलिस के समक्ष कोई आवेदन दिया था, तब भी केवल इस कारण से कि किसी व्यक्ति ने ऐसे अधिकारी को शिकायत दी, जिसके पास संबंधित मामले में कानूनी अधिकार है, उसे मानहानि नहीं माना जा सकता, बशर्ते शिकायत कानून में निर्धारित अपवाद की शर्तों के अनुरूप अच्छी नीयत से की गई हो.

इस आधार पर हाईकोर्ट ने डेडियापाड़ा के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित जांच संख्या 02/2022 को फिर से शुरू करने का कोई निर्देश देने से इनकार कर दिया.

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
सभी तथ्यों और निचली अदालतों के आदेशों की समीक्षा करने के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. अदालत ने माना कि मजिस्ट्रेट अदालत और पुनरीक्षण अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर जो निष्कर्ष निकाला है, उसमें हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त कारण नहीं है.

इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने पुलिस में शिकायत करने के अधिकार और मानहानि के आरोप के बीच अंतर को रेखांकित किया है. किसी कथित अपराध की जानकारी सक्षम अधिकारी तक पहुंचाना अपने आप में मानहानि नहीं बन जाता. शिकायतकर्ता की नीयत, शिकायत का उद्देश्य, शिकायत किस अधिकारी के समक्ष की गई और आरोपों के समर्थन में उपलब्ध सामग्री जैसे पहलुओं को भी न्यायिक जांच में महत्व दिया जाएगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-