मौत की सजा और न्यायिक टिप्पणियों को लेकर फिर चर्चा में जज रवि कुमार दिवाकर

मौत की सजा और न्यायिक टिप्पणियों को लेकर फिर चर्चा में जज रवि कुमार दिवाकर

प्रेषित समय :20:53:49 PM / Sat, Sep 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मुजफ्फरनगर. मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर अपने एक फैसले के कारण चर्चा में हैं. 7 सितंबर 2026 को हत्या के एक मामले में आरोपी नदीम को मृत्युदंड सुनाते हुए दिए गए 38 पन्नों के फैसले में न्यायाधीश ने न्यायिक कर्तव्य, दबाव और अपनी भूमिका को लेकर बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. फैसले में दर्ज टिप्पणी—“कायर जज कहलाने के बजाय मैं मरना पसंद करूंगा”—ने न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच बहस को नया विषय दे दिया है.

हालांकि, इस मामले को केवल न्यायाधीश की टिप्पणी तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा. फैसले में मृत्युदंड दिए जाने के कारण, अदालत द्वारा अपराध की गंभीरता का आकलन, पूर्ववर्ती न्यायिक फैसलों का उल्लेख और न्यायिक कार्य में कथित दबाव का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है. खास बात यह है कि सेशंस कोर्ट से सुनाई गई मौत की सजा के बाद भी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती. मृत्युदंड पर अमल से पहले संबंधित हाईकोर्ट की पुष्टि आवश्यक होती है.

10 मामलों में 22 को मौत की सजा का दावा
जज रवि कुमार दिवाकर के हालिया न्यायिक कार्य को लेकर सबसे अधिक चर्चा मृत्युदंड के आंकड़े को लेकर हो रही है. उपलब्ध विवरण के अनुसार अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच उनकी अदालत ने 10 मामलों में 22 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी. 7 सितंबर को नदीम को सुनाई गई सजा के बाद यह संख्या 23 बताई जा रही है.

मृत्युदंड भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में सबसे कठोर दंड है. इसलिए किसी सेशंस कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाया जाना अपने आप में अंतिम निर्णय नहीं माना जाता. दंड प्रक्रिया के तहत हाईकोर्ट को ऐसे मामले में सजा की पुष्टि करनी होती है. हाईकोर्ट मामले के रिकॉर्ड और साक्ष्यों की स्वतंत्र रूप से समीक्षा कर सकता है और कानून के अनुसार निर्णय ले सकता है.

यही कारण है कि सेशंस कोर्ट के स्तर पर सुनाई गई मौत की सजा और अंतिम रूप से मृत्युदंड दिए जाने के बीच महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया मौजूद रहती है.

नदीम मामले में ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ का परीक्षण
7 सितंबर के फैसले में अदालत ने नदीम को हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड दिया. अदालत ने अपने निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का सहारा लिया. इनमें बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य और मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य जैसे फैसले शामिल हैं.

भारतीय न्यायशास्त्र में मृत्युदंड के संदर्भ में ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है. सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि मौत की सजा सामान्य दंड नहीं है और इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए. अदालत को अपराध की प्रकृति और गंभीरता के साथ आरोपी की परिस्थितियों तथा सुधार की संभावना जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होता है.

नदीम मामले में सेशंस कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामला इस उच्च कसौटी पर खरा उतरता है और उम्रकैद पर्याप्त दंड नहीं होगी. हालांकि अंतिम रूप से यह दृष्टिकोण हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा.

97 गंभीर मामलों की फाइलें वापस लिए जाने का उल्लेख
फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा अदालत से गंभीर आपराधिक मामलों की फाइलें वापस लिए जाने को लेकर है. न्यायाधीश ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि उनकी अदालत से 97 गंभीर आपराधिक मामलों की फाइलें वापस ली गईं.

फैसले में यह भी कहा गया कि इस घटनाक्रम के संबंध में उन्हें धमकी भरे संदेश मिले. न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस तरह के कथित दबाव या धमकियां उन्हें अपने न्यायिक कर्तव्य से पीछे हटने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं.

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायिक स्वतंत्रता केवल अदालत के बाहर की राजनीतिक या सामाजिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि न्यायिक अधिकारी बिना भय या बाहरी दबाव के मामलों की सुनवाई कर सकें.

हालांकि, किसी भी कथित धमकी, संदेश या मामलों के स्थानांतरण के संबंध में लगाए गए आरोपों को उनके आधिकारिक रिकॉर्ड और सक्षम संस्थाओं की जांच के संदर्भ में ही अंतिम रूप से देखा जाना चाहिए.

ज्ञानवापी आदेश के बाद राष्ट्रीय पहचान
रवि कुमार दिवाकर का नाम राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार 2022 में व्यापक रूप से चर्चा में आया था. उस समय वे वाराणसी में सिविल जज के पद पर कार्यरत थे और ज्ञानवापी परिसर से संबंधित एक मामले में उनके आदेश के बाद मामला राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया था.

उस अवधि में उन्होंने अपने और अपने परिवार को लेकर कथित दबाव तथा सुरक्षा संबंधी चिंताओं का भी उल्लेख किया था. इसके बाद उनका न्यायिक करियर लगातार सार्वजनिक और न्यायिक चर्चाओं के केंद्र में रहा.

ज्ञानवापी मामले के बाद उनके विभिन्न आदेशों और टिप्पणियों को लेकर भी सार्वजनिक बहस होती रही है. हालांकि किसी न्यायिक अधिकारी की लोकप्रियता अथवा विवाद का आकलन उसके प्रत्येक आदेश की कानूनी वैधता के बजाय संबंधित मामले के रिकॉर्ड और उच्च न्यायालयों में हुई न्यायिक समीक्षा के आधार पर किया जाना अधिक उचित है.

मुख्यमंत्री पर टिप्पणी के बाद हाईकोर्ट की आपत्ति
मार्च 2024 में बरेली में तैनाती के दौरान भी जज दिवाकर का एक आदेश चर्चा में आया था. इस आदेश में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तुलना प्लेटो की ‘फिलॉसफर किंग’ की अवधारणा से की थी.

बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश के इन हिस्सों को हटाते हुए इन्हें न्यायिक आदेश के लिए अनावश्यक टिप्पणी माना था. हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों में राजनीतिक रंग और निजी विचारों की झलक होने की बात कही थी.

यह घटनाक्रम न्यायिक आदेशों में भाषा और टिप्पणी की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण बहस का हिस्सा बना. न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने फैसलों में कानून, तथ्य और न्यायिक तर्क पर केंद्रित रहें तथा ऐसी टिप्पणियों से बचें जिनका मामले के निर्णय से प्रत्यक्ष संबंध न हो.

मृत्युदंड पर फिर बहस का केंद्र
मुजफ्फरनगर के हालिया मामले ने एक साथ कई सवाल सामने रख दिए हैं. पहला सवाल मृत्युदंड की न्यायिक कसौटी का है. दूसरा न्यायिक अधिकारियों पर कथित दबाव और धमकियों का है. तीसरा अदालत के आदेशों में न्यायिक टिप्पणी की सीमा से जुड़ा है. वहीं 97 गंभीर मामलों की फाइलें वापस लिए जाने का उल्लेख न्यायिक प्रशासन और मामलों के स्थानांतरण की प्रक्रिया को भी चर्चा में लाता है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सेशंस कोर्ट द्वारा मृत्युदंड सुनाया जाना और आरोपी को वास्तव में फांसी दिया जाना दो अलग-अलग चरण हैं. हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना मौत की सजा लागू नहीं की जा सकती. इसके अलावा दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ उपलब्ध वैधानिक उपाय भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं.

इसलिए 7 सितंबर का फैसला फिलहाल सेशंस कोर्ट का निर्णय है, जिसके आगे उच्च न्यायिक परीक्षण की प्रक्रिया मौजूद है. इसके बावजूद फैसले में इस्तेमाल की गई भाषा और मृत्युदंड के लगातार मामलों ने जज रवि कुमार दिवाकर को एक बार फिर राष्ट्रीय न्यायिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

मामले का विवरण: नदीम हत्या प्रकरण, निर्णय दिनांक 7 सितंबर 2026; अदालत—अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, मुजफ्फरनगर. फैसले में मृत्युदंड के लिए सुप्रीम कोर्ट के बचन सिंह और मच्छी सिंह संबंधी सिद्धांतों का संदर्भ लिया गया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-