भोपाल. फर्जी रसीद, संदिग्ध जीएसटी नंबर, कागजों पर मशीनों की खरीद और बैंकिंग प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के जरिए एमएसएमई ऋण स्वीकृत कराने के मामले का आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने खुलासा किया है. भोपाल के एक युवा व्यवसायी की शिकायत पर हुई विस्तृत जांच में सामने आया कि उसके नाम पर उसकी जानकारी के बिना 10 लाख रुपये का एमएसएमई ऋण स्वीकृत कराया गया.
शिकायतकर्ता के अनुसार उसे न तो मशीन मिली और न ही ऋण की राशि उसके उपयोग में आई. जांच में ऋण की 8.85 लाख रुपये की राशि मशीन के नाम पर निकालकर संबंधित लोगों के बीच बांटे जाने की बात सामने आई है. मामले में ईओडब्ल्यू भोपाल ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र की एमपी नगर शाखा के शाखा प्रबंधक राहुल भोसले सहित पांच लोगों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया है.
तीन से चार घंटे में पूरा कर दिया गया ऋण का खेल
ईओडब्ल्यू की जांच में ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर तथ्य सामने आए हैं. शिकायतकर्ता के नाम पर 21 मार्च 2024 को ऋण आवेदन से लेकर राशि जारी होने तक की पूरी प्रक्रिया महज तीन से चार घंटे में एक ही बैठक में पूरी कर दी गई. जांच के अनुसार ऋण से संबंधित अधिकांश कागजात शिकायतकर्ता के मामा पहले ही बैंक में जमा कर चुके थे.
इसके बाद शिकायतकर्ता को शाखा प्रबंधक के सामने बैठाकर पहले से तैयार दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए. जांच में यह भी पाया गया कि बैंक की ओर से न तो उस स्थान का निरीक्षण किया गया जहां मशीन लगाई जानी थी और न ही मशीन सप्लाई करने वाली फर्म के पते का समुचित सत्यापन किया गया. शिकायतकर्ता की मशीन विक्रेता से मुलाकात भी नहीं कराई गई.
मार्जिन मनी की रसीद भी जांच के घेरे में
जांच में एमएसएमई ऋण के लिए मार्जिन मनी दिखाने के नाम पर चार लाख रुपये और एक लाख 15 हजार रुपये की दो रसीदें लगाए जाने की जानकारी सामने आई. इन रसीदों में विशाल इंटरप्राइजेस को भुगतान किया जाना दर्शाया गया था.
ईओडब्ल्यू के अनुसार जांच के दौरान ऐसा कोई वास्तविक भुगतान सामने नहीं आया. संबंधित फर्म के बैंक खाते में यह राशि जमा नहीं हुई और शिकायतकर्ता अथवा उसके परिवार के खातों में भी इतनी रकम उपलब्ध होने के प्रमाण नहीं मिले. इसके बावजूद शाखा प्रबंधक ने इन रसीदों को स्वीकार कर लिया.
फर्म का पता और जीएसटी नंबर भी संदिग्ध मिला
जांच में मशीन सप्लाई करने वाली विशाल इंटरप्राइजेस के बैंक में दर्ज पते को फर्जी पाया गया. इसके दस्तावेजों में इस्तेमाल किया गया जीएसटी नंबर भी किसी अन्य व्यक्ति का बताया गया है. जांचकर्ताओं के अनुसार बैंक के अपने जीएसटी पोर्टल पर फर्म के मालिक का नाम अलग दिखाई दे रहा था.
इसके बावजूद शाखा स्तर पर इस विसंगति को नजरअंदाज करते हुए ऋण स्वीकृत कर दिया गया. फर्म के सत्यापन की प्रक्रिया भी केवल कोटेशन पर दर्ज मोबाइल नंबर पर फोन करने तक सीमित रहने की बात जांच में सामने आई है.
मशीन के बजाय रकम दूसरे खातों में पहुंची
ऋण की राशि मशीन खरीदने के लिए विशाल इंटरप्राइजेस के खाते में पहुंची, लेकिन शिकायतकर्ता को मशीन नहीं मिली. जांच के अनुसार इसके बाद फर्म संचालकों ने राशि को अपनी दूसरी फर्म ग्लोबल मार्केटर्स के माध्यम से शिकायतकर्ता की मां के खाते में भेजा.
वहां से रकम उसी दिन या अगले दिन शिकायतकर्ता के मामा और उनके बताए लोगों के खातों तक पहुंच गई. जांच में 18 मार्च 2024 को 3.91 लाख रुपये और 22 मार्च 2024 को तीन लाख रुपये इसी तरह घुमाए जाने की जानकारी सामने आई है.
इसके अलावा ऋण स्वीकृति वाले दिन फाइनेंशियल एडवाइजर राजीव राजपूत को 50 हजार रुपये और शिकायतकर्ता के मामा को 2.46 लाख रुपये भेजे जाने का भी उल्लेख जांच में किया गया है. फर्म संचालक ने कथित तौर पर मशीन के बदले पैसा भेजे जाने और इस लेन-देन में उसे 40 हजार रुपये मिलने की बात स्वीकार की.
मशीन आई नहीं और बैंक ने बीमा भी करा दिया
जांच में बैंकिंग प्रक्रिया से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया. जिस मशीन की खरीद के नाम पर ऋण स्वीकृत किया गया, उसके बिना ही बैंक ने उसका बीमा करा दिया और केंद्रीय रजिस्ट्री में उसका पंजीयन भी कर दिया. बीमा की राशि शिकायतकर्ता के खाते से काटे जाने की बात जांच में सामने आई है.
ऋण स्वीकृत होने के बाद शिकायतकर्ता के मामा खुद और अपने परिचितों के माध्यम से इसकी किस्तें जमा करते रहे. शिकायतकर्ता को बताया जाता रहा कि ऋण बंद कराने की प्रक्रिया चल रही है. जुलाई 2024 में जब बैंक ने किस्त के संबंध में शिकायतकर्ता को फोन किया, तब उसे पूरे मामले की जानकारी हुई.
इसके बाद शिकायतकर्ता ने मामले की शिकायत की. मशीन विक्रेता फर्म ने बैंक को मशीन दिए जाने की रसीदों की प्रतियां भेजीं. जांच के अनुसार शाखा प्रबंधक ने मूल दस्तावेज देखे बिना और शिकायतकर्ता से पुष्टि किए बिना इन रसीदों को सही मान लिया.
एक मामला नहीं कई ऋणों का पैटर्न सामने आया
ईओडब्ल्यू की जांच में यह मामला अकेला नहीं पाया गया. जांच के दौरान सामने आया कि मार्च 2024 में शिकायतकर्ता के मामा ने इसी शाखा से करीब 10 से 15 दिन के भीतर पांच ऋण स्वीकृत कराए थे. इनमें एक को छोड़कर अन्य ऋण लेने वालों को मशीन नहीं मिलने की बात जांच में सामने आई.
तीन अन्य पीड़ितों के मामले भी जांच के दायरे में आए. एक प्रिंटिंग प्रेस संचालक को 9.90 लाख रुपये का ऋण और चार लाख रुपये की नकद ऋण सीमा इसी तरह दिलाई गई. दबाव के बाद उसे मशीन तो मिली, लेकिन कथित रूप से फर्जी बिल के आधार पर 1,88,988 रुपये जीएसटी के नाम पर काटे गए और बीमा की राशि दो बार वसूले जाने की बात भी जांच में सामने आई.
सात लाख के ऋण में भी मशीन नहीं मिली
जांच में एक महिला का मामला भी सामने आया, जो स्वर्ण आभूषण का काम करती थी. उसे 14 मार्च 2024 को सात लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया, लेकिन उसे मशीन नहीं मिलने की बात जांच में दर्ज है.
एक अन्य युवक होम लोन लेने के उद्देश्य से बैंक गया था. जांच के अनुसार उससे मार्जिन मनी के नाम पर 2.40 लाख रुपये नकद लिए गए और उसकी इच्छा के बिना एमएसएमई ऋण कर दिया गया. इसके बदले उसे भी कोई मशीन नहीं मिली. जांच में बताया गया है कि ये सभी ऋण बाद में एनपीए हो गए.
शिकायतों के बावजूद दबाव बनाने का आरोप
ईओडब्ल्यू की जांच में यह भी सामने आया कि इन मामलों की जानकारी होने के बाद भी शाखा प्रबंधक ने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं दी और न ही कोई कार्रवाई शुरू की. इसके बजाय पीड़ितों पर ऋण चुकाने के लिए दबाव बनाए जाने की बात जांच में सामने आई है.
बैंकिंग प्रक्रिया और दस्तावेजों की जांच होगी
ईओडब्ल्यू भोपाल ने जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर शाखा प्रबंधक राहुल भोसले, फाइनेंशियल एडवाइजर राजीव राजपूत, विशाल इंटरप्राइजेस की प्रोपराइटर नईमा अली, संचालक कमर अली और ग्लोबल मार्केटर्स की प्रोपराइटर उमर अली के विरुद्ध अपराध क्रमांक 99/2026 दर्ज किया है. प्रकरण में भारतीय दंड विधान की धारा 420 और 120-बी के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया है. आगे की विवेचना जारी है.
जांच का अगला चरण ऋण से जुड़े मूल दस्तावेजों, बैंक खातों, रसीदों, जीएसटी विवरण, मशीनों की वास्तविक उपलब्धता, बीमा और केंद्रीय रजिस्ट्री में किए गए पंजीयन सहित संबंधित वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को जोड़ना होगा. उपलब्ध प्रेस ब्रीफ के अनुसार फिलहाल ईओडब्ल्यू की विवेचना जारी है और मामले की पूरी तस्वीर आगे की जांच में और स्पष्ट होगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

