जबलपुर. वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व की मोहली रेंज से गंभीर हालत में रेस्क्यू की गई मादा बाघिन ने जानलेवा कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण को मात दे दी है. नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ चिकित्सकों की करीब दो माह से अधिक समय तक चली गहन देखरेख और उपचार के बाद बाघिन को स्वस्थ घोषित किया गया. इसके बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यप्राणी, भोपाल के निर्देश पर उसे विशेष सुरक्षित वाहन से भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान भेज दिया गया. अब स्वस्थ हुई बाघिन वन विहार के सुरक्षित बाड़े में रहेगी.
गंभीर हालत में पहुंची थी बाघिन
मोहली रेंज में बाघिन के गंभीर अवस्था में मिलने के बाद वन विभाग की टीम ने उसे रेस्क्यू कर नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ वाइल्ड लाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ पहुंचाया था. 9 जुलाई को केंद्र में लाए जाने के बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों ने उसकी विस्तृत जांच की. परीक्षण में बाघिन में कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण की पुष्टि हुई.
कैनाइन डिस्टेंपर वन्य मांसाहारी प्राणियों के लिए गंभीर संक्रमण माना जाता है. संक्रमण के कारण बाघिन की स्थिति काफी कमजोर हो गई थी. ऐसे में चिकित्सकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संक्रमण को नियंत्रित करने के साथ उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और सामान्य शारीरिक स्थिति को वापस लाना था.
विशेष निगरानी में शुरू हुआ उपचार
संक्रमण की पुष्टि होते ही बाघिन को विशेष पिंजरे में रखकर लगातार निगरानी शुरू की गई. डॉ. अमूल रोकड़े के नेतृत्व में मेडिकल टीम ने उसकी नियमित शारीरिक जांच की और आवश्यकता के अनुसार दवाइयां दीं. उपचार के दौरान बाघिन की गतिविधियों, खानपान और स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न मापदंडों पर लगातार नजर रखी गई.
पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय जबलपुर के मेडिसिन विभाग की फैकल्टी ने भी उपचार में आवश्यक चिकित्सीय सहयोग दिया. संक्रमण के कारण कमजोर हुई बाघिन की रिकवरी के लिए उसके खानपान पर विशेष ध्यान दिया गया. उसके लिए ऐसा वातावरण तैयार किया गया, जिसमें तनाव कम रहे और वह धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट सके.
कई बार बदली उपचार की रणनीति
बाघिन के उपचार के दौरान चिकित्सकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उसके स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव भी आते रहे. इसके चलते मेडिकल टीम को उपचार और प्रबंधन की रणनीति में आवश्यक बदलाव करने पड़े. हर चरण में बाघिन की स्थिति का आकलन करने के बाद आगे का उपचार तय किया गया.
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनदीप शर्मा ने उपचार और देखरेख को लेकर विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए थे. स्कूल संचालक डॉ. राजेश कुमार शर्मा, डॉ. अमूल रोकड़े, डॉ. काजल जाधव सहित विशेषज्ञ टीम बाघिन की स्थिति पर लगातार नजर बनाए रही.
वन विभाग के साथ लगातार समन्वय
बाघिन के उपचार के साथ उसके आगे के प्रबंधन को लेकर विश्वविद्यालय और वन विभाग के अधिकारियों के बीच लगातार समन्वय बना रहा. करीब एक माह तक इस बात को लेकर पत्राचार और विचार-विमर्श चलता रहा कि पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद बाघिन को कहां रखा जाए.
वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग के अधिकारियों के बीच बाघिन की स्वास्थ्य स्थिति तथा उसके भविष्य के प्रबंधन को लेकर जानकारी साझा की जाती रही. इस दौरान यह भी सुनिश्चित किया गया कि बाघिन को ऐसे स्थान पर भेजा जाए जहां उसकी निगरानी और आवश्यक देखभाल की समुचित व्यवस्था उपलब्ध हो.
स्वास्थ्य मापदंड सामान्य होने के बाद मिली अनुमति
लगातार उपचार और निगरानी के बाद बाघिन की स्थिति में सुधार आने लगा. चिकित्सकों ने उसके शारीरिक मापदंडों का लगातार परीक्षण किया. जब उसकी स्वास्थ्य स्थिति स्थिर पाई गई और वह स्थानांतरण के लिए उपयुक्त स्थिति में पहुंची, तब वन विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई.
स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार के बाद बाघिन को भोपाल स्थानांतरित करने की अनुमति दी गई. इसके बाद उसके सुरक्षित परिवहन की तैयारी की गई. विशेष वाहन और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था के साथ उसे वन विहार राष्ट्रीय उद्यान भेजा गया.
विशेषज्ञों के उपचार से मिली नई जिंदगी
इस पूरे उपचार अभियान में विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सकों और वन विभाग के बीच समन्वय महत्वपूर्ण रहा. कुलपति डॉ. मनदीप शर्मा, स्कूल संचालक डॉ. राजेश कुमार शर्मा, डॉ. अमूल रोकड़े और डॉ. काजल जाधव के साथ भोपाल से आए आरएफओ नीलेश की टीम ने बाघिन की देखभाल और स्थानांतरण की प्रक्रिया में भूमिका निभाई.
चिकित्सकों के अनुसार गंभीर संक्रमण से जूझ रही बाघिन का स्वस्थ होकर उपचार केंद्र से निकलना वन्यजीव चिकित्सा के लिहाज से महत्वपूर्ण उपलब्धि है. लगातार निगरानी, समय पर उपचार, संतुलित आहार और उपयुक्त वातावरण ने उसकी रिकवरी में मदद की.
अब वन विहार में होगी निगरानी
भोपाल पहुंचने के बाद बाघिन को वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में सुरक्षित बाड़े में रखा गया है. यहां भी उसकी स्वास्थ्य स्थिति पर निगरानी रखी जाएगी. वन विभाग उसके व्यवहार, खानपान और स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों पर नजर रखेगा, ताकि उपचार के बाद उसके स्वास्थ्य में किसी तरह की परेशानी सामने आने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जा सके.
मोहली रेंज से गंभीर अवस्था में रेस्क्यू की गई यह बाघिन अब बीमारी से उबरकर सुरक्षित वातावरण में पहुंच चुकी है. करीब दो माह से अधिक समय तक चले उपचार के बाद उसका स्वस्थ होना वन विभाग और नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय की संयुक्त कोशिशों का परिणाम बताया जा रहा है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

