नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी की संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और ऐसी भाषा में उपलब्ध कराना जरूरी है, जिसे वह समझता हो. यदि इस संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन कर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है और बाद में उसकी रिहाई होती है, तो दोबारा हिरासत में लेने की प्रक्रिया पहले जैसी नहीं रह सकती. ऐसी स्थिति में जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी और गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करनी होगी.
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंद्रकुड़कर की पीठ ने यह फैसला जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य, आपराधिक अपील संख्या 4234/2026 में दिया. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय 21 सितंबर 2026 का है.
गिरफ्तारी के आधार बताना मौलिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार की जानकारी को महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना. कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि उसे किन आधारों पर गिरफ्तार किया गया है, ताकि वह अपने वकील से सलाह ले सके, रिमांड का विरोध कर सके और कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपना सके.
पीठ ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित होने चाहिए और उनकी प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को उपलब्ध कराई जानी चाहिए. यह सुरक्षा अपराध की प्रकृति या आरोपों की गंभीरता पर निर्भर नहीं करती.
लिखित आधार नहीं मिले तो गिरफ्तारी असंवैधानिक
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी और उसके आधार पर जारी रिमांड की प्रक्रिया प्रभावित होती है. बाद में आरोपपत्र दाखिल हो जाने या अदालत द्वारा मामले में संज्ञान ले लिए जाने से शुरुआती गैरकानूनी गिरफ्तारी स्वतः वैध नहीं हो जाती.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत केवल किसी एक विशेष कानून के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों तक सीमित नहीं है. संविधान में दी गई यह सुरक्षा सामान्य आपराधिक कानून और विशेष कानूनों के मामलों में भी लागू होती है.
दोबारा गिरफ्तारी पर भी तय की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण सवाल यह था कि यदि गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए जाने के कारण किसी व्यक्ति को रिहा करना पड़े, तो क्या जांच एजेंसी उसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार कर सकती है.
पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में दोबारा गिरफ्तारी की शक्ति उसी अधिकारी के विवेक पर नहीं छोड़ी जा सकती जिसने पहली बार संवैधानिक प्रावधान का पालन नहीं किया था.
यदि जांच एजेंसी को लगता है कि आगे की जांच के लिए आरोपी की हिरासत जरूरी है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन करना होगा. इससे पहले आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध कराने होंगे. आवेदन में यह भी बताना होगा कि पहली गिरफ्तारी के समय आधार उपलब्ध क्यों नहीं कराए गए थे और अब हिरासत की आवश्यकता क्यों है.
मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद ही दोबारा हिरासत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोबारा गिरफ्तारी का निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए. संबंधित मजिस्ट्रेट को यह देखना होगा कि पहली बार गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराने के पीछे वास्तविक और उचित कारण था या नहीं.
इसके साथ यह भी देखा जाएगा कि बाद में गिरफ्तारी के आधार आरोपी को उपलब्ध करा दिए गए हैं और आगे की जांच के लिए उसकी दोबारा गिरफ्तारी वास्तव में आवश्यक है या नहीं.
अदालत ने इस तरह की अर्जी पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए जल्द निर्णय लेने की आवश्यकता बताई है. फैसले में पहले के मिहिर राजेश शाह मामले में दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया गया है.
उसी अधिकारी को दोबारा गिरफ्तारी का अधिकार नहीं
पीठ ने विशेष रूप से इस पहलू को रेखांकित किया कि जिस पुलिस अधिकारी ने गिरफ्तारी के संवैधानिक अधिकार का पालन नहीं किया, उसी अधिकारी को आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की स्वतंत्र शक्ति नहीं दी जानी चाहिए.
इसके पीछे अदालत ने जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया की सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना. यदि गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराने में चूक हुई है तो आगे की कार्रवाई में वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका भी सुनिश्चित की गई है.
जांच दूसरे पुलिस अधिकारी को सौंपनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर भी प्रक्रिया निर्धारित की है. यदि रिहा किए गए व्यक्ति की दोबारा हिरासत की मांग की जाती है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी को उस आवेदन का परीक्षण करना होगा.
वरिष्ठ अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि आगे की जांच उसी अधिकारी के पास न रहे जिसने संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया था. ऐसे मामले में जांच दूसरे पुलिस अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया गया है.
लापरवाही पर विभागीय जांच और सेवा अभिलेख में प्रविष्टि
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारी की जवाबदेही को केवल मौखिक चेतावनी तक सीमित नहीं रखा. कोर्ट ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए.
यदि विभागीय जांच में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष सामने आता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी. फैसले के अनुसार ऐसी कार्रवाई का उल्लेख संबंधित अधिकारी के सेवा अभिलेख में भी किया जाएगा.
मामला नाबालिग से संबंधित आरोपों से जुड़ा था
यह मामला पंजाब में दर्ज एक प्राथमिकी से जुड़ा था, जिसमें अपीलकर्ता जसकरण जीत सिंह देओल पर नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न से संबंधित आरोप लगाए गए थे. मामले की सुनवाई के दौरान गिरफ्तारी के समय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, यह मुख्य प्रश्न बन गया.
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि उसने अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है. निर्णय का केंद्र गिरफ्तारी, हिरासत और संविधान के अनुच्छेद 22(1) तथा 22(2) में निर्धारित सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रिया रही.
24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना भी अनिवार्य
पीठ ने अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की संवैधानिक आवश्यकता का भी उल्लेख किया. कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में संविधान में निर्धारित दोनों सुरक्षा प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए.
अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन की परिस्थितियों में हाई कोर्ट सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजे पर भी विचार कर सकता है. इसके अलावा प्रभावित व्यक्ति को निजी दीवानी कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपनाने की स्वतंत्रता भी रहती है.
गंभीर आरोप भी संवैधानिक सुरक्षा को खत्म नहीं करते
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी आरोप की गंभीरता संवैधानिक सुरक्षा के पालन का विकल्प नहीं हो सकती. व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए संविधान और कानून ने जो प्रक्रिया निर्धारित की है, उसका पालन आवश्यक है.
पीठ ने कहा कि संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन अपराध की प्रकृति या गंभीरता के आधार पर अलग-अलग नहीं किया जा सकता. व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन हर मामले में आवश्यक है.
सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंचेगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का निर्देश दिया है. इससे निर्णय में तय प्रक्रिया को पुलिस और न्यायिक तंत्र तक पहुंचाने का रास्ता भी साफ हुआ है.
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के 29 मई 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि यदि जांच एजेंसी को अब भी आरोपी की हिरासत में पूछताछ आवश्यक लगती है तो उसे मिहिर राजेश शाह मामले और वर्तमान फैसले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा. हालांकि, अदालत ने आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

