वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाना अनिवार्य करने के नियम को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाना अनिवार्य करने के नियम को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

प्रेषित समय :18:52:35 PM / Tue, Sep 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन को सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में अनिवार्य किए जाने तथा इससे जुड़े 2026 के कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह यह तय करने के लिए नहीं बैठी है कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए या उसके कितने अंतरे होने चाहिए. अदालत का परीक्षण मुख्य रूप से इस सवाल पर रहेगा कि अंतरात्मा या धार्मिक आधार पर वंदे मातरम् नहीं गाने वाले व्यक्ति को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है या नहीं.

विवाद के केंद्र में छह अंतरों का गायन
कृष्णा ने अपनी याचिका में गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और 9 जुलाई 2026 के निर्देशों के साथ-साथ Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में 2026 में किए गए संशोधन को चुनौती दी है. याचिका का दावा है कि इन निर्देशों के जरिए वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों को आधिकारिक रूप से गाए जाने की व्यवस्था की गई है. 

याचिका में विशेष रूप से अंतिम चार अंतरों पर आपत्ति दर्ज की गई है. याचिकाकर्ता के अनुसार इनमें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक संदर्भ आते हैं. उनका तर्क है कि किसी व्यक्ति को इन अंतरों का अनिवार्य रूप से गायन करने के लिए बाध्य करना उसकी अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के सवाल को जन्म देता है.

अदालत ने राष्ट्रीय गीत की परिभाषा पर क्या कहा
सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से संकेत दिया कि राष्ट्रीय गीत की पहचान या उसके आधिकारिक स्वरूप का निर्धारण अदालत के विचार का मुख्य विषय नहीं है. अदालत इस बात की जांच करना चाहती है कि राष्ट्रीय गीत के गायन से संबंधित व्यवस्था का उल्लंघन करने पर किसी व्यक्ति को आपराधिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं या नहीं, विशेषकर तब जब उसका इनकार अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास पर आधारित हो.

इस संदर्भ में पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने बिजो एमैनुअल बनाम केरल राज्य फैसले का उल्लेख किया. 1986 के इस फैसले में अदालत ने उन स्कूली बच्चों को राहत दी थी, जिन्होंने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, जबकि वे उसके सम्मान में खड़े रहे थे. मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने इसी संवैधानिक सिद्धांत की प्रासंगिकता पर ध्यान दिलाया. 

2026 के संशोधन से क्या बदला
2026 में संसद ने Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act पारित किया. इसके जरिए 1971 के कानून की धारा 3 का दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को भी शामिल किया गया. संशोधित प्रावधान के तहत राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने अथवा ऐसे गायन में लगी सभा में व्यवधान पैदा करने पर तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. 

राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह संशोधन कानून बन चुका है. सरकारी विवरण के अनुसार इसका उद्देश्य वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण देना है.

याचिकाकर्ता का तर्क है कि कानून में राष्ट्रीय गीत को संरक्षण देना एक बात है, लेकिन गृह मंत्रालय के निर्देशों में पूरे छह अंतरों के गायन की व्यवस्था और उसके साथ आपराधिक प्रावधान को जोड़कर देखने पर अलग संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है.

मौलिक अधिकारों का भी उठाया गया सवाल
कृष्णा की याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(ए), 21 और 25(1) का हवाला दिया गया है. याचिका का मुख्य तर्क यह है कि धार्मिक संदर्भ वाले गीत के किसी विशेष रूप को अनिवार्य रूप से गाने के लिए बाध्य करने की स्थिति में व्यक्ति की अभिव्यक्ति, अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों पर विचार करना जरूरी है.

याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि कानून में इस्तेमाल किया गया ‘डिस्टर्बेंस’ यानी व्यवधान शब्द कितना स्पष्ट है. याचिकाकर्ता के अनुसार यदि इसकी व्याख्या व्यापक तरीके से की गई तो अकादमिक चर्चा, कलात्मक अभिव्यक्ति या ऐतिहासिक-साहित्यिक अध्ययन से जुड़े मामलों में भी कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं.

1937 के फैसले का भी उल्लेख
याचिका में वंदे मातरम् के ऐतिहासिक इस्तेमाल का हवाला देते हुए कहा गया है कि 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं में इसके पहले दो अंतरों तक गायन की व्यवस्था स्वीकार की थी. याचिका में इस ऐतिहासिक घटनाक्रम और उस समय विभिन्न नेताओं के बीच हुए विचार-विमर्श का उल्लेख किया गया है.

हालांकि केंद्र सरकार की ओर से 2026 में लाए गए कानून का आधार अलग है. सरकार के अनुसार संशोधन का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत को भी उस वैधानिक संरक्षण के दायरे में लाना है जो पहले राष्ट्रीय गान को प्राप्त था. 

पिछली याचिका से इस मामले में क्या अंतर
वंदे मातरम् से संबंधित एक अन्य याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 25 मार्च 2026 को हस्तक्षेप से इनकार किया था. वर्तमान याचिका में कृष्णा की ओर से तर्क दिया गया है कि उस समय स्थिति अलग थी, क्योंकि राष्ट्रीय गीत के गायन से संबंधित आपराधिक दंड का वर्तमान प्रावधान मौजूद नहीं था.

अब 2026 के संशोधन के बाद वंदे मातरम् को धारा 3 के तहत वैधानिक संरक्षण मिल चुका है. इसी बदली हुई कानूनी स्थिति को वर्तमान याचिका में महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है.

सुनवाई के दौरान वकीलों के बीच तीखी बहस
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने याचिका की ओर से दलीलें रखीं. उन्होंने संशोधित कानून में National Song की स्पष्ट परिभाषा और गृह मंत्रालय के निर्देशों की कानूनी स्थिति को लेकर सवाल उठाए.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका के तर्कों पर आपत्ति जताई. सुनवाई के दौरान उनकी एक टिप्पणी को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस भी हुई. इस हिस्से को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में सुनवाई का विवरण सामने आया है. 

अब संवैधानिक सवाल पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल वंदे मातरम् के छह अंतरों को राष्ट्रीय गीत मानने या न मानने पर कोई फैसला नहीं दिया है. अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और संकेत दिया है कि सुनवाई का महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि किसी व्यक्ति के अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के आधार पर गीत न गाने की स्थिति में उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं.

इस मामले में एक तरफ 2026 के संशोधन से राष्ट्रीय गीत को मिले वैधानिक संरक्षण का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ मौलिक अधिकारों और बिजो एमैनुअल में स्थापित संवैधानिक सिद्धांत की प्रासंगिकता है. आगे की सुनवाई में इन्हीं दोनों पहलुओं के बीच कानूनी संबंध पर अदालत का रुख महत्वपूर्ण होगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-