चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुनवाई में उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ को भेजा मामला

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुनवाई में उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ को भेजा मामला

प्रेषित समय :16:41:37 PM / Wed, Sep 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई. इस दौरान कोर्ट ने मामले को पीठ के पास भेजने का आदेश दिया. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की.

हालांकि दो सदस्यीय पीठ के दोनों न्यायाधीश इस बात पर अलग-अलग राय रखते थे कि मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं, लेकिन देरी से बचने के लिए दोनों जस्टिस ने मामले को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष रखने का निर्देश दिया. सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि मामले को पहले तीन जजों की पीठ के पास यह तय करने के लिए भेजना कि इसे संविधान पीठ को भेजा जाए या नहीं, कार्यवाही में अनावश्यक देरी पैदा करेगा. इसलिए अब सीजेआई उचित संख्या वाली संविधान पीठ का गठन करेंगे.

नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर जस्टिस दत्ता ने उठाए सवाल

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और  चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में कार्यपालिका को प्रभावी भूमिका मिलने के कारण नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं. बता दें कि 2023 के कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं. जस्टिस दत्ता ने कहा कि ऐसी व्यवस्था में कार्यपालिका का प्रभाव काफी अधिक दिखाई देता है और इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर जनता के विश्वास और निष्पक्षता की धारणा' प्रभावित हो सकती है. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए केवल चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे जनता की नजर में भी स्वतंत्र दिखाई देना चाहिए.

कैबिनेट मंत्री को शामिल करने पर भी सवाल

जस्टिस दत्ता ने चयन समिति में केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि कार्यपालिका से जुड़े सदस्यों की मौजूदगी किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष चयनकर्ता की भूमिका का प्रभावी विकल्प नहीं हो सकती. उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित सदस्य से प्रधानमंत्री के विरुद्ध रुख अपनाने की अपेक्षा करना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है. इस आधार पर उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के प्रभाव की संवैधानिक वैधता की जांच की आवश्यकता बताई.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-