सीता, लूणकरणसर, राजस्थान
सुबह की पहली किरण के साथ गांव की महिलाएं अपने काम में जुट जाती हैं. किसी के हाथ में चूल्हे की जिम्मेदारी होती है, कोई पशुओं के लिए चारा जुटा रही होती है तो कोई खेत में परिवार के साथ काम कर रही होती है. दिन चढ़ने के साथ जिम्मेदारियां कम नहीं होतीं, बल्कि उनका दायरा बढ़ता जाता है. घर, खेत, पशु और परिवार के बीच बीतने वाला यह श्रम शाम तक जारी रहता है. लेकिन दिन खत्म होने पर जब कमाई का सवाल सामने आता है तो अक्सर महिला के हाथ खाली रह जाते हैं.
यही ग्रामीण महिलाओं के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है. जिस श्रम के बिना परिवार और गांव की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती, उसकी आर्थिक कीमत अक्सर तय ही नहीं होती. लूणकरणसर जैसे ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के पास मेहनत भी है और हुनर भी, लेकिन इन दोनों को नियमित आमदनी में बदलने के अवसर अब भी सीमित हैं.
शिक्षा की दूरी से रोजगार तक की चुनौती
राजस्थान में ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए शिक्षा की तस्वीर को देखना भी जरूरी है. 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला साक्षरता दर 58.75 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों की ग्रामीण साक्षरता दर 78.57 प्रतिशत थी. यानी दोनों के बीच करीब 20 प्रतिशत अंक का अंतर था.
बीते वर्षों में शिक्षा के अवसर बढ़े हैं, लेकिन ग्रामीण समाज के कई हिस्सों में लड़कियों की पढ़ाई अब भी परिवार की प्राथमिकताओं में पीछे रह जाती है. आर्थिक कमजोरी, स्कूल की दूरी, घरेलू जिम्मेदारियां और कम उम्र में विवाह जैसी परिस्थितियां कई लड़कियों की शिक्षा को बीच में रोक देती हैं. विवाह के बाद जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं और कई महिलाओं का जीवन घर की चारदीवारी तक सिमट जाता है.
शिक्षा का यह अंतर आगे चलकर रोजगार के अवसरों पर भी असर डालता है. जब शिक्षा, कौशल और बाजार की जानकारी का अभाव हो तो महिला के पास मेहनत करने की क्षमता होने के बावजूद अपनी आय का स्वतंत्र रास्ता तैयार करना कठिन हो जाता है.
अपनी कमाई केवल पैसा नहीं, निर्णय की ताकत भी है
महिला के पास अपनी आमदनी न होने का असर केवल उसकी जेब पर नहीं पड़ता. रोजमर्रा की छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए उसे परिवार के पुरुष सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता है. यही आर्थिक निर्भरता कई बार उसके निर्णय लेने की क्षमता को भी सीमित कर देती है.
घर में किसी तरह का तनाव, हिंसा या दुर्व्यवहार होने की स्थिति में आर्थिक मजबूरी उसके विकल्पों को और कम कर सकती है. इसलिए ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ना केवल परिवार की आय बढ़ाने का विषय नहीं है. यह उनके सम्मान, निर्णय लेने की क्षमता और अपने जीवन के बारे में आवाज उठाने के अधिकार से भी जुड़ा सवाल है.
एक महिला की अपनी आय उसके लिए आर्थिक सुरक्षा का आधार बन सकती है. इससे वह परिवार की जरूरतों में योगदान देने के साथ अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर भी अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकती है.
सिलाई से लेकर अचार तक हुनर की लंबी सूची
ग्रामीण महिलाओं के पास ऐसे अनेक पारंपरिक कौशल हैं जिन्हें रोजगार में बदला जा सकता है. सिलाई और कढ़ाई इसका सबसे सरल उदाहरण है. राजस्थान के गांवों में बड़ी संख्या में महिलाएं सिलाई, कढ़ाई और पारंपरिक हस्तकला का काम जानती हैं. लेकिन हुनर और बाजार के बीच की दूरी के कारण यह कौशल अक्सर घरेलू उपयोग तक सीमित रह जाता है.
यदि महिलाओं को आधुनिक डिजाइन, बेहतर प्रशिक्षण, कच्चा माल और तैयार उत्पाद के लिए बाजार उपलब्ध कराया जाए तो यही काम नियमित आमदनी का माध्यम बन सकता है.
इसी तरह पापड़, अचार, मसाले और दूसरे खाद्य उत्पाद ग्रामीण महिलाओं के पारंपरिक कौशल का हिस्सा रहे हैं. इन्हें केवल घरेलू गतिविधि मानने के बजाय छोटे कारोबार के रूप में विकसित किया जा सकता है. महिलाओं के समूह बनाकर उत्पादन, पैकेजिंग और स्थानीय बिक्री की व्यवस्था की जा सकती है. आगे चलकर यही उत्पाद बड़े बाजार और ऑनलाइन माध्यमों तक भी पहुंच सकते हैं.
लेकिन केवल प्रशिक्षण देने से बदलाव नहीं आएगा. महिलाओं को उत्पाद की गुणवत्ता, लागत, कीमत तय करने, बचत, बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और बाजार की मांग की जानकारी भी देनी होगी. तभी घर में तैयार हुआ उत्पाद बाजार में अपनी जगह बना पाएगा.
खेत और पशुपालन में महिलाओं का श्रम भी अर्थव्यवस्था है
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका सिलाई या घरेलू उद्योग तक सीमित नहीं है. खेतों में बीज बोने, निराई-गुड़ाई, फसल से जुड़े विभिन्न कार्यों से लेकर पशुपालन तक महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी रहती है.
पशुओं के लिए चारा लाना, उनकी देखभाल करना, दूध निकालना और उससे जुड़े कई काम महिलाओं की दैनिक जिम्मेदारियों में शामिल होते हैं. इसके बावजूद इन गतिविधियों से होने वाली आय पर उनका नियंत्रण अक्सर नहीं होता.
जरूरत इस बात की है कि महिला के श्रम को केवल परिवार की मदद मानने के बजाय कृषि और पशुपालन अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाए. यदि महिलाओं को दूध, घी, दही और अन्य उत्पादों की बिक्री से जोड़ा जाए तो पशुपालन भी उनकी नियमित आमदनी का माध्यम बन सकता है.
कुजटी गांव दिखाता है अवसर और चुनौती दोनों
बीकानेर जिले के लूणकरणसर ब्लॉक का कुजटी गांव इस स्थिति को समझने का एक उदाहरण है. करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव में लगभग 900 महिलाएं हैं. स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इनमें केवल 50 से 60 महिलाएं ही किसी न किसी प्रत्यक्ष रोजगार से जुड़ी हैं.
कुछ महिलाएं सिलाई का काम करती हैं, जबकि कुछ सड़क निर्माण, तालाब की सफाई और पौधारोपण जैसे कामों में पुरुषों के साथ काम करती हैं. लेकिन महिलाओं के श्रम और मजदूरी को लेकर समानता का सवाल अब भी बना हुआ है.
कुजटी जैसे गांवों में बदलाव की शुरुआत किसी बड़े उद्योग से नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों और महिलाओं के मौजूदा कौशल से की जा सकती है. सिलाई जानने वाली महिलाओं को बाजार से जोड़ा जाए. खाद्य पदार्थ बनाने वाली महिलाओं के समूह तैयार किए जाएं. पशुपालन करने वाली महिलाओं को दूध और उससे बने उत्पादों की बिक्री से जोड़ा जाए. इस तरह रोजगार के ऐसे रास्ते तैयार हो सकते हैं जिनके लिए महिलाओं को अपना गांव छोड़ने की जरूरत न पड़े.
रोजगार के साथ कमाई पर अधिकार भी जरूरी
महिला को रोजगार मिल जाना ही आर्थिक सशक्तीकरण की पूरी कहानी नहीं है. यह भी जरूरी है कि उसकी कमाई उसके अपने बैंक खाते में पहुंचे और उसे अपनी आय तथा बचत के बारे में निर्णय लेने का अधिकार मिले.
यदि महिला दिनभर काम करती है, लेकिन उसकी कमाई पर उसका नियंत्रण नहीं है तो आर्थिक आत्मनिर्भरता अधूरी रह जाती है. परिवार के आर्थिक फैसलों में उसकी भागीदारी तभी मजबूत होगी जब उसके श्रम की कीमत तय हो और उसकी कमाई पर उसका अधिकार भी हो.
इसके लिए स्वयं सहायता समूह, बैंकिंग सुविधाएं, कौशल प्रशिक्षण, स्थानीय बाजार और डिजिटल भुगतान को एक साथ जोड़ना होगा. सरकारी योजनाओं और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो सकती है.
बदलाव की शुरुआत गांव से ही हो सकती है
ग्रामीण महिलाओं के पास मेहनत की कमी नहीं है. हुनर की भी कमी नहीं है और जिम्मेदारियां उठाने की क्षमता भी कम नहीं है. असली कमी उन अवसरों की है जो उनके कौशल को बाजार से जोड़ सकें.
जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहां महिला को रोजगार के लिए अपने गांव से बाहर जाने की मजबूरी न हो, जहां उसके हुनर को उचित कीमत मिले और जहां उसकी कमाई पर उसका अधिकार हो. गांव में ही उपलब्ध संसाधनों से छोटे कारोबार खड़े किए जा सकते हैं और महिलाओं के समूहों को बाजार से जोड़ा जा सकता है.
आखिर जिन हाथों ने वर्षों से घर, खेत और पशुओं को संभाला है, उन्हें अपनी मेहनत की कमाई पर भी अधिकार मिलना चाहिए. ग्रामीण विकास की तस्वीर तब ही पूरी होगी, जब महिलाओं के श्रम को ‘मदद’ नहीं, बल्कि आर्थिक योगदान माना जाएगा. महिला के हुनर को बाजार और मेहनत को उचित मूल्य मिल गया तो गांव की अर्थव्यवस्था में बदलाव केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि हर घर की जिंदगी में दिखाई देगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

