नई दिल्ली. संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा केवल कुछ घंटों की परीक्षा नहीं होती. इसके पीछे वर्षों की तैयारी, हजारों घंटे का अध्ययन और एक-एक अंक के लिए अभ्यर्थियों की कड़ी प्रतिस्पर्धा जुड़ी होती है. ऐसे में जब परीक्षा के कई प्रश्नों और उनकी उत्तर-कुंजी को लेकर ही आपत्ति सामने आए, तो मामला केवल एक प्रश्न के सही या गलत होने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और उत्तरों की विश्वसनीयता पर बहस शुरू हो जाती है.
सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 में कम से कम 27 प्रश्नों को लेकर अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई है. रिपोर्ट के अनुसार, अभ्यर्थियों का दावा है कि कुछ प्रश्नों में आयोग की ओर से दिया गया उत्तर सही नहीं है, कुछ में कोई विकल्प पूरी तरह सही नहीं है और कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनमें एक से अधिक उत्तर संभावित दिखाई देते हैं. इसी विवाद को लेकर अभ्यर्थियों के दो समूह केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट के समक्ष पहुंचे हैं.
यूपीएससी की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्न पत्र उपलब्ध है. परीक्षा 24 मई 2026 को आयोजित हुई थी.
विवाद की असली वजह केवल उत्तर नहीं सवाल की बनावट भी
प्रीलिम्स में बहुविकल्पीय प्रश्नों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सीधे अभ्यर्थी के अगले चरण तक पहुंचने की संभावना को प्रभावित कर सकता है. विवादित प्रश्नों में अभ्यर्थियों की आपत्ति केवल इस बात पर नहीं है कि उत्तर-कुंजी में गलत विकल्प दिया गया, बल्कि यह भी है कि प्रश्न की भाषा ऐसी है जिससे एक से अधिक व्याख्या संभव हो जाती है.
यही बिंदु इस विवाद को सामान्य उत्तर-कुंजी आपत्ति से अलग बनाता है. यदि किसी प्रश्न का तथ्य स्पष्ट है और उत्तर निश्चित है तो विवाद अपेक्षाकृत सीमित रहता है. लेकिन यदि प्रश्न की भाषा, कानूनी प्रावधान या ऐतिहासिक स्रोत की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा सकती है, तो परीक्षा में अंक निर्धारण स्वयं विवाद का विषय बन जाता है.
ग्रैंड स्लैम से शुरू हुई बहस
विवादित प्रश्नों में खेल से जुड़ा ग्रैंड स्लैम वाला प्रश्न भी शामिल है. इसमें चारों ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिताओं की साझा व्यवस्था, खिलाड़ियों की प्रवेश पात्रता और वाइल्ड कार्ड की संख्या से जुड़े कथन दिए गए थे. उपलब्ध प्रश्नपत्र और विभिन्न उत्तर-विश्लेषणों में इस प्रश्न की व्याख्या को लेकर चर्चा हुई है.
यह प्रश्न इस बात का उदाहरण है कि प्रतियोगी परीक्षा में सामान्य जानकारी दिखने वाला विषय भी कितनी बारीकी मांग सकता है. यहां केवल यह जानना पर्याप्त नहीं था कि ग्रैंड स्लैम कौन-कौन से हैं, बल्कि उनके संचालन, प्रवेश नियम और वाइल्ड कार्ड जैसी व्यवस्थाओं की सटीक जानकारी जरूरी थी.
जीरो एफआईआर ने बढ़ाई कानूनी पेचीदगी
विवाद का दूसरा प्रमुख उदाहरण जीरो एफआईआर से जुड़ा प्रश्न है. प्रश्न में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत जीरो एफआईआर से संबंधित तीन कथन दिए गए थे.
यहीं से विवाद और जटिल हो जाता है. उपलब्ध विश्लेषणों के अनुसार, पहले कथन में संज्ञेय और असंज्ञेय दोनों अपराधों का उल्लेख किया गया था, जबकि जीरो एफआईआर का प्रावधान संज्ञेय अपराधों से जुड़ा है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने को अनिवार्य बताया जाना भी विवाद का कारण बना, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक सूचना की सुविधा और उसकी अनिवार्यता दो अलग बातें हैं.
यानी सवाल का विवाद केवल कानून की जानकारी से नहीं, बल्कि प्रश्न में प्रयुक्त एक शब्द के दायरे से भी जुड़ गया.
ऋग्वैदिक कृषि के सवाल ने इतिहास की व्याख्या पर खींची रेखा
एक अन्य प्रश्न ऋग्वैदिक काल में कृषि और कुओं से सिंचाई से संबंधित था. इसमें कुओं से पानी निकालने के लिए पत्थर की चरखी और लकड़ी के पात्र, कृषि उपकरण तथा बैलों के उपयोग से संबंधित सूचनाओं को आधार बनाया गया था.
उपलब्ध उत्तर-कुंजी और कई परीक्षा-विश्लेषणों में इस प्रश्न का उत्तर ‘1 और 3’ बताया गया है.
लेकिन इसी प्रश्न को लेकर अलग-अलग कोचिंग और विशेषज्ञ विश्लेषणों में तर्कों का अंतर दिखाई देता है. कुछ विश्लेषण प्रश्न के कथनों को अलग-अलग ऐतिहासिक साक्ष्यों से जोड़कर देखते हैं. इससे यह सवाल उठता है कि परीक्षा में किसी ऐतिहासिक तथ्य को कितनी दूर तक प्रत्यक्ष प्रमाण माना जा सकता है.
27 सवालों का विवाद क्यों महत्वपूर्ण है
एक अभ्यर्थी के लिए एक प्रश्न का अंतर भी महत्वपूर्ण हो सकता है. प्रारंभिक परीक्षा में कटऑफ के आसपास रहने वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ अंकों का बदलाव अगले चरण की पात्रता को प्रभावित कर सकता है. इसलिए उत्तर-कुंजी को लेकर आपत्ति केवल अकादमिक बहस नहीं रहती.
सितंबर 2026 में सामने आई एक अलग याचिका के संबंध में 63 अभ्यर्थियों ने जीएस पेपर-1 के 15 और सीएसएटी पेपर-2 के 12 प्रश्नों को लेकर आपत्ति जताई थी. उस मामले में कैट ने यूपीएससी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था और अगली सुनवाई 8 अक्टूबर के लिए तय बताई गई थी.
यह घटनाक्रम बताता है कि उत्तर-कुंजी विवाद अब परीक्षा केंद्र से निकलकर न्यायिक परीक्षण के स्तर तक पहुंच चुका है.
अभ्यर्थियों के सामने सबसे बड़ा सवाल निष्पक्षता का
सिविल सेवा परीक्षा में अभ्यर्थी केवल अपने उत्तर की शुद्धता नहीं देखता, वह यह भी देखता है कि समान प्रश्न का मूल्यांकन सभी के लिए समान तरीके से हुआ या नहीं. यदि किसी प्रश्न में अस्पष्टता का दावा स्वीकार होता है तो उसके संभावित प्रभाव को सभी अभ्यर्थियों के संदर्भ में देखना पड़ता है.
यहीं प्रशासनिक परीक्षा की चुनौती सामने आती है. आयोग को हजारों उम्मीदवारों के लिए एक समान मानक बनाए रखना होता है, जबकि अदालत या अधिकरण के सामने प्रत्येक विवादित प्रश्न के तथ्य, भाषा और संदर्भ की अलग-अलग जांच हो सकती है.
अब नजर कैट की कार्यवाही पर
इन याचिकाओं के जरिए अभ्यर्थियों ने प्रश्नों और उत्तर-कुंजी पर न्यायिक परीक्षण की मांग की है. आगे की कार्यवाही में यह महत्वपूर्ण होगा कि अधिकरण विवादित प्रश्नों के संबंध में प्रस्तुत दस्तावेजों और विशेषज्ञ तर्कों को किस प्रकार देखता है.
फिलहाल विवादित प्रश्नों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है. इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी 27 प्रश्नों में वास्तव में त्रुटि है. अभी यह अभ्यर्थियों की आपत्तियों, उपलब्ध उत्तर-कुंजी और उनके समर्थन में प्रस्तुत किए जा रहे तर्कों का मामला है.
लेकिन इस विवाद ने एक बड़ी बहस जरूर खोल दी है—प्रतियोगी परीक्षा में कठिन प्रश्न और अस्पष्ट प्रश्न के बीच सीमा कहां तय होगी? यूपीएससी जैसी परीक्षा में जहां एक-एक अंक उम्मीदवार के भविष्य की दिशा बदल सकता है, वहां प्रश्न की भाषा, तथ्यात्मक आधार और उत्तर-कुंजी की स्पष्टता तीनों का महत्व बराबर हो जाता है. यही कारण है कि 2026 की प्रीलिम्स परीक्षा के ये विवादित प्रश्न अब सिर्फ अभ्यर्थियों की शिकायत नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़ा व्यापक सवाल बन चुके हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

