‘हिंदुत्व फॉर जेन जेड’ में हिंदुत्व को समझने की कोशिश, इतिहास से जाति और सिनेमा से तकनीक तक कई सवालों पर बहस

‘हिंदुत्व फॉर जेन जेड’ में हिंदुत्व को समझने की कोशिश, इतिहास से जाति और सिनेमा से तकनीक तक कई सवालों पर बहस

प्रेषित समय :22:02:22 PM / Sun, Sep 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

 हिंदुत्व भारतीय सार्वजनिक जीवन में लंबे समय से बहस का विषय रहा है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए इसे समझने की कोशिश करने वाली किताबें अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं. लेखक युवराज पोखरना की पुस्तक ‘हिंदुत्व फॉर जेन जेड’ इसी खाली जगह को भरने का प्रयास करती है. अप्रैल 2026 में प्रकाशित यह 240 पृष्ठों की पुस्तक हिंदुत्व की अवधारणा, उसके ऐतिहासिक विकास, जाति व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सिनेमा, तकनीक, स्वदेशी और समकालीन सामाजिक बहस जैसे विषयों को निबंधों के माध्यम से सामने रखती है. पुस्तक की सूचीबद्ध कीमत 499 रुपये है.

हाल में प्रकाशित एक पुस्तक समीक्षा में इसे ऐसी किताब के रूप में देखा गया है जो जटिल और विवादित विषय को युवा पाठकों के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास करती है. हालांकि पुस्तक में रखे गए कई ऐतिहासिक और वैचारिक निष्कर्ष स्वयं लेखक के तर्क हैं और इन विषयों पर अकादमिक तथा राजनीतिक स्तर पर अलग-अलग मत मौजूद हैं. इसलिए पुस्तक को हिंदुत्व पर अंतिम निष्कर्ष के बजाय एक विशिष्ट वैचारिक दृष्टिकोण से लिखे गए विमर्श के रूप में पढ़ना महत्वपूर्ण है.

हिंदुत्व को धर्म से अलग अवधारणा के रूप में देखने की कोशिश
पुस्तक के शुरुआती अध्यायों में लेखक हिंदुत्व की परिभाषा और उसके धार्मिक अवधारणाओं से संबंध पर चर्चा करते हैं. उनका तर्क है कि हिंदुत्व को केवल किसी संगठित धार्मिक व्यवस्था या कठोर धार्मिक सिद्धांत के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए. वे इसे भारतीय सभ्यतागत पहचान और जीवन-दृष्टि से जोड़ते हैं.

पुस्तक का उद्देश्य ही इस बहस को नई पीढ़ी के सामने रखने का है. प्रकाशक के विवरण के अनुसार, लेखक हिंदुत्व की उत्पत्ति, उद्देश्य और उससे जुड़े विवादों को सरल भाषा और संदर्भों के साथ समझाने का प्रयास करते हैं. पुस्तक इस अवधारणा को लेकर मौजूद परस्पर विरोधी व्याख्याओं के बीच अपनी स्थिति प्रस्तुत करती है.

यही वजह है कि किताब की शुरुआत परिभाषा से होती है, न कि सीधे समकालीन राजनीति से. लेखक पाठक को पहले यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जिस शब्द का सार्वजनिक विमर्श में बार-बार इस्तेमाल होता है, उसके अलग-अलग अर्थ और संदर्भ क्या हो सकते हैं.

जाति व्यवस्था पर लेखक का अलग नजरिया
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारतीय जाति व्यवस्था पर केंद्रित है. लेखक ‘वर्ण’ और वर्तमान में दिखाई देने वाली जातिगत संरचना के बीच अंतर करने की कोशिश करते हैं.

पुस्तक में लेखक का तर्क है कि पारंपरिक वर्ण व्यवस्था को कर्म और गुण से जोड़कर देखा जाता था, जबकि आज दिखाई देने वाली जन्म आधारित जातिगत संरचना ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के दौरान अधिक कठोर हुई. वे औपनिवेशिक काल की जनगणना और प्रशासनिक वर्गीकरण को इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण कारकों में गिनाते हैं. यह पुस्तक के प्रमुख तर्कों में से एक है.

हालांकि इस विषय पर इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों में व्यापक बहस रही है. इसलिए पुस्तक का यह निष्कर्ष एक विशिष्ट व्याख्या के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, न कि ऐसा सर्वसम्मत ऐतिहासिक तथ्य जिसे लेकर कोई मतभेद नहीं है.

धर्मनिरपेक्षता पर नेहरू के दौर की नीतियों पर सवाल
‘हिंदुत्व फॉर जेन जेड’ में धर्मनिरपेक्षता पर भी लेखक ने विस्तार से अपनी बात रखी है. एक अध्याय में वे भारतीय धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या और स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई नीतियों पर सवाल उठाते हैं.

विशेष रूप से लेखक हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में हुए बदलाव और मुस्लिम समुदाय से संबंधित कानूनों के बीच अंतर को चर्चा का विषय बनाते हैं. पुस्तक में जवाहरलाल नेहरू के दौर की नीतियों की आलोचना करते हुए यह सवाल उठाया गया है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का व्यवहार सभी धार्मिक समुदायों के साथ समान रहा या नहीं.

यह मुद्दा भारतीय राजनीति में लंबे समय से बहस का हिस्सा रहा है. पुस्तक इस बहस में लेखक का पक्ष प्रस्तुत करती है और धर्मनिरपेक्षता तथा बहुलतावाद के बीच अंतर को भी रेखांकित करती है. प्रकाशक के विवरण में भी इन दोनों अवधारणाओं के अंतर को पुस्तक के प्रमुख विषयों में शामिल बताया गया है.

सावरकर से पहले हिंदुत्व की तलाश
पुस्तक का एक अध्याय इस सवाल पर केंद्रित है कि क्या हिंदुत्व की अवधारणा केवल विनायक दामोदर सावरकर के साथ सामने आई.

लेखक इसके लिए महाभारत, रामायण, आदि शंकराचार्य, स्वामी दयानंद सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक और स्वामी विवेकानंद जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की चर्चा करते हैं. इसके साथ ही बंगाली लेखक चंद्रनाथ बसु की पुस्तक ‘हिंदुत्व’ का भी संदर्भ दिया गया है.

लेखक हिंदुत्व के विकास को स्वतंत्रता से पहले और बाद की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ते हैं. इस क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ जैसे संगठनों की भूमिका पर भी चर्चा होती है.

यहां पुस्तक का उद्देश्य हिंदुत्व के विकास को एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करना है, हालांकि इस इतिहास की व्याख्या को लेकर अलग-अलग विद्वानों के बीच मतभेद भी मौजूद हैं.

आरएसएस पर अलग अध्याय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पुस्तक में स्वतंत्र अध्याय दिया गया है. लेखक संघ की स्थापना, उसके विकास और भारतीय सार्वजनिक जीवन में उसकी भूमिका पर चर्चा करते हैं.

पुस्तक में संघ और भारतीय जनसंघ को अलग-अलग संस्थागत पहचान के रूप में समझाने की कोशिश की गई है. यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आम राजनीतिक विमर्श में दोनों को कई बार एक ही संदर्भ में देखा जाता है.

पुस्तक में संघ की जटिलता को समझने के लिए वाल्टर एंडरसन के कथन का भी उल्लेख किया गया है. लेखक का प्रयास संघ को केवल राजनीतिक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि उसके वैचारिक और सामाजिक विस्तार के संदर्भ में देखने का है.

सिनेमा और हिंदुत्व की बहस
जेन जेड को ध्यान में रखते हुए पुस्तक का सिनेमा वाला अध्याय विशेष रूप से समकालीन संदर्भ से जुड़ता है. ‘बॉयकॉट बॉलीवुड’ जैसे अभियानों के संदर्भ में लेखक का दृष्टिकोण यह है कि सांस्कृतिक असहमति का जवाब केवल बहिष्कार नहीं होना चाहिए.

वे भारतीय सिनेमा की शुरुआती परंपराओं को भारतीय सांस्कृतिक आख्यानों से जोड़ते हैं और भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का संदर्भ लेते हैं. लेखक के अनुसार, भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़े विषय सिनेमा की शुरुआती अभिव्यक्तियों में भी दिखाई देते हैं.

इस अध्याय में लेखक युवाओं से अपनी सांस्कृतिक पसंद को फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति के माध्यम से व्यक्त करने की बात करते हैं. यह पुस्तक के उन हिस्सों में है जहां वैचारिक चर्चा सीधे युवा जीवनशैली और मनोरंजन की दुनिया से जुड़ती है.

तकनीक और विज्ञान को भी विमर्श का हिस्सा बनाया
पुस्तक केवल इतिहास और राजनीति तक सीमित नहीं रहती. ‘टेक्नोलॉजी एंड डेवलपमेंटल गोल्स’ अध्याय में लेखक भारतीय परंपरा में विज्ञान, गणित, चिकित्सा और तकनीकी ज्ञान के संदर्भों को सामने लाते हैं.

लेखक प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ जोड़कर देखने की कोशिश करते हैं. इस हिस्से का उद्देश्य यह तर्क प्रस्तुत करना है कि भारतीय सभ्यता को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विज्ञान और ज्ञान की उसकी परंपराओं को भी विमर्श में शामिल किया जाना चाहिए.

हालांकि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के बीच संबंधों को लेकर भी ऐतिहासिक प्रमाणों और व्याख्याओं की अलग-अलग धारणाएं हैं. इसलिए इस हिस्से को पुस्तक के वैचारिक तर्क के रूप में पढ़ना अधिक उपयुक्त होगा.

जेन जेड के लिए लिखी गई भाषा
किताब की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसकी भाषा और प्रस्तुति है. लेखक ने लंबे अकादमिक विमर्श के बजाय छोटे-छोटे निबंधों के जरिए विषयों को रखने की कोशिश की है. प्रकाशक भी पुस्तक को युवा पाठकों के लिए सुलभ शैली में प्रस्तुत करता है.

इसमें मंदिर, स्थानों के नाम, जाति, धर्मनिरपेक्षता, वैश्वीकरण, स्वदेशी और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को अलग-अलग अध्यायों में लिया गया है. इससे पाठक किसी एक विषय से शुरुआत कर सकता है और फिर दूसरे विषयों तक पहुंच सकता है.

पुस्तक की खासियत और इसकी सीमा
‘हिंदुत्व फॉर जेन जेड’ की खासियत यह है कि यह ऐसे विषय को सीधे युवा पाठकों के सामने रखती है जिस पर सार्वजनिक जीवन में अक्सर तीखी बहस होती है. लेखक अपने तर्कों के समर्थन में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, संगठनों और समकालीन घटनाओं का संदर्भ लेते हैं.

लेकिन पुस्तक की प्रकृति को समझना भी उतना ही जरूरी है. यह हिंदुत्व पर विभिन्न विचारधाराओं का समान अनुपात में अकादमिक सर्वेक्षण नहीं है. पुस्तक का उद्देश्य लेखक की व्याख्या और तर्कों के माध्यम से हिंदुत्व को समझने का एक दृष्टिकोण देना है. स्वयं पुस्तक का प्रकाशकीय विवरण इसे हिंदुत्व से जुड़ी आलोचनाओं और प्रचलित धारणाओं पर सवाल उठाने वाली कृति के रूप में प्रस्तुत करता है.

इसलिए पाठकों के लिए पुस्तक को पढ़ते समय लेखक के दावों, ऐतिहासिक स्रोतों और दूसरे विद्वानों की व्याख्याओं के बीच अंतर बनाए रखना उपयोगी होगा.

पुस्तक एक नजर में
पुस्तक: हिंदुत्व फॉर जेन जेड
लेखक: युवराज पोखरना
भाषा: अंग्रेजी
प्रकाशन: 2026
पृष्ठ: 240
कीमत: 499 रुपये

प्रकाशक: ब्लूवन इंक/ओकैम के रूप में अलग-अलग पुस्तक-सूचियों में दर्ज
कुल मिलाकर, यह किताब हिंदुत्व को लेकर चल रही बहस को युवा पाठकों की भाषा और समकालीन संदर्भों में रखने का प्रयास करती है. इसकी उपयोगिता इस बात में है कि यह इतिहास, संस्कृति, जाति, धर्मनिरपेक्षता, सिनेमा और तकनीक जैसे अलग-अलग विषयों को एक ही वैचारिक फ्रेम में जोड़ती है. साथ ही, इसकी कई व्याख्याएं बहस का विषय हैं. इसलिए पुस्तक को समझने का सबसे उपयोगी तरीका उसके तर्कों को पढ़ना, उनके स्रोतों को देखना और उन पर उपलब्ध वैकल्पिक ऐतिहासिक तथा अकादमिक दृष्टिकोणों से उनका मिलान करना होगा. 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-