भोपाल. अदालतों में लंबित पुराने मामलों के लिए दस्तावेज केवल कागज नहीं होते, बल्कि वही मुकदमे की पूरी कहानी को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं. भोपाल में व्यापमं के कंप्यूटर खरीदी से जुड़े करीब 18 साल पुराने मामले में अब यही दस्तावेज खुद एक कानूनी चुनौती बन गए हैं. मामले के मूल शासकीय दस्तावेज रिकॉर्ड रूम में सुरक्षित रखे गए थे, लेकिन समय बीतने के साथ दीमक से उनके नष्ट होने की जानकारी सामने आई है. नतीजा यह है कि जिस मुकदमे में वर्षों पहले तैयार किए गए दस्तावेजों के आधार पर आरोपों की जांच और सुनवाई आगे बढ़नी थी, उसमें अब मूल दस्तावेजों के स्थान पर उपलब्ध फोटोकॉपी को आधार बनाना होगा.
भोपाल की विशेष अदालत ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ के आवेदन पर उपलब्ध छायाप्रतियों को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे दी है. इस घटनाक्रम ने पुराने आपराधिक मामलों में दस्तावेजों के संरक्षण, उनकी प्रमाणिकता और न्यायिक रिकॉर्ड की सुरक्षा को लेकर एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है.
18 साल बाद दस्तावेजों का बदल गया महत्व
यह मामला वर्ष 2008 में सामने आया था. उस समय आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने जांच पूरी कर अदालत में चालान पेश किया था. जांच से जुड़े मूल दस्तावेजों से मशीन के माध्यम से फोटोकॉपी तैयार की गई थीं और उन्हें चालान के साथ अदालत के रिकॉर्ड में शामिल किया गया था. आरोपितों को भी इन दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराई गई थीं.
बाद में मूल दस्तावेज रिकॉर्ड रूम में सुरक्षित रख दिए गए. लेकिन अब अदालत को बताया गया कि लंबे समय तक रखे रहने के दौरान रिकॉर्ड रूम में मौजूद मूल दस्तावेज दीमक से नष्ट हो गए. इस कारण जांच एजेंसी के सामने ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसमें मुकदमे से संबंधित महत्वपूर्ण रिकॉर्ड का मूल स्वरूप उपलब्ध नहीं रहा.
यही वजह है कि ईओडब्ल्यू ने अदालत से उपलब्ध फोटोकॉपी को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की अनुमति मांगी.
अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल था दस्तावेजों की विश्वसनीयता
मूल दस्तावेजों के उपलब्ध नहीं होने के बाद इस मामले का केंद्र केवल कथित कंप्यूटर खरीदी अनियमितता नहीं रह गया है. अब अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण है कि उपलब्ध छायाप्रतियों को किस आधार पर विश्वसनीय माना जाए और उनकी प्रमाणिकता कैसे स्थापित की जाए.
बचाव पक्ष ने मूल दस्तावेजों के नष्ट होने की परिस्थितियों और फोटोकॉपी की प्रामाणिकता को लेकर आपत्ति जताई. बचाव पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया गया कि जब मूल दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं हैं, तब उनकी प्रतियों के आधार पर आरोपों से जुड़े तथ्यों की जांच किस सीमा तक की जा सकती है.
अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए फोटोकॉपी को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी है. इस निर्णय के बाद मुकदमे की आगे की कार्यवाही उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जारी रह सकेगी.
2008 में तैयार प्रतियों ने बचाया मुकदमे का रिकॉर्ड
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि फोटोकॉपी वर्तमान में अचानक तैयार नहीं की गई हैं. ईओडब्ल्यू के अनुसार वर्ष 2008 में जब चालान अदालत में पेश किया गया था, तब मूल दस्तावेजों से ही उनकी प्रतियां तैयार कराई गई थीं. इन प्रतियों को चालान के साथ अदालत में जमा किया गया था और बचाव पक्ष को भी उनकी प्रतियां उपलब्ध कराई गई थीं.
यही तथ्य अब मुकदमे के लिए महत्वपूर्ण बन गया है. यदि उस समय तैयार की गई प्रतियां अदालत के रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं होतीं, तो मूल दस्तावेज नष्ट होने के बाद मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाना और अधिक कठिन हो सकता था.
इस तरह करीब दो दशक पहले तैयार की गई प्रतियां अब उस मुकदमे के दस्तावेजी आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं.
78 कंप्यूटर और सर्वर की खरीदी बनी थी जांच का आधार
ईओडब्ल्यू की जांच के मुताबिक व्यापमं में वर्ष 2008 के दौरान 78 कंप्यूटर और सर्वर खरीदे गए थे. जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि इनकी खरीदी बाजार मूल्य से करीब दोगुनी दर पर की गई. टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी कर एक संबंधित फर्म को लाभ पहुंचाने का आरोप भी जांच में सामने आया था.
जांच के अनुसार इस प्रक्रिया से सरकारी खजाने को करीब 43 लाख रुपये का नुकसान होने का आरोप लगाया गया था. इन्हीं आरोपों के आधार पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने मामले की जांच की और बाद में अदालत में चालान पेश किया.
अब इतने वर्षों बाद मूल दस्तावेजों के नष्ट होने की स्थिति में मुकदमे की सुनवाई में वही दस्तावेजी सामग्री महत्वपूर्ण होगी, जो अदालत के रिकॉर्ड में उपलब्ध है.
पांच आरोपितों की हो चुकी है मौत
मामले की लंबी अवधि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 16 आरोपितों में से पांच की मृत्यु हो चुकी है. इनमें अरुण गुप्ता, पी. प्रकाश राव, अरुण कुमार कालिया, रमेश दुबे और तुलसीदास अग्रवाल के नाम शामिल हैं.
वर्तमान में कई आरोपितों के खिलाफ सुनवाई जारी है, जबकि एक आरोपित राधा बैलानी के फरार होने की जानकारी अदालत के रिकॉर्ड में है. इतने लंबे समय से चल रही न्यायिक प्रक्रिया में आरोपितों की स्थिति बदलने के साथ-साथ मामले से जुड़े दस्तावेजों और साक्ष्यों का महत्व भी बढ़ गया है.
मूल रिकॉर्ड के नष्ट होने की स्थिति ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की गति और साक्ष्य की उपलब्धता दोनों को प्रभावित कर सकती है.
रिकॉर्ड रूम की व्यवस्था पर भी उठता है सवाल
इस घटनाक्रम का एक व्यापक पहलू अदालतों के रिकॉर्ड के संरक्षण से जुड़ा है. पुराने मुकदमों में कागजी दस्तावेज कई वर्षों तक सुरक्षित रखने पड़ते हैं. ऐसे में नमी, दीमक, आग, खराब भंडारण व्यवस्था और अन्य कारणों से रिकॉर्ड को होने वाला नुकसान सीधे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है.
व्यापमं का यह मामला इस लिहाज से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस रिकॉर्ड की मदद से वर्षों पुराना मुकदमा आगे बढ़ना है, उसका मूल हिस्सा ही अब उपलब्ध नहीं है. हालांकि अदालत ने उपलब्ध फोटोकॉपी को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे दी है, लेकिन आगे की सुनवाई में इन दस्तावेजों की प्रासंगिकता और प्रमाणिकता पर चर्चा बनी रह सकती है.
यह मामला यह भी दिखाता है कि पुराने मामलों में डिजिटल रिकॉर्ड, प्रमाणित प्रतियों और सुरक्षित अभिलेख प्रबंधन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है.
अब 14 अक्टूबर को आगे बढ़ेगी सुनवाई
विशेष अदालत ने मामले में विवेचक के शेष मुख्य परीक्षण के लिए 14 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित की है. यानी मूल दस्तावेजों के नष्ट होने से उत्पन्न स्थिति के बावजूद मामला न्यायिक प्रक्रिया से बाहर नहीं हुआ है. अदालत उपलब्ध रिकॉर्ड और स्वीकार किए गए द्वितीयक साक्ष्य के आधार पर आगे की कार्यवाही करेगी.
फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि 18 साल पुराने कथित कंप्यूटर खरीदी घोटाले की सुनवाई अब उन मूल सरकारी दस्तावेजों के बजाय उपलब्ध फोटोकॉपी के सहारे आगे बढ़ेगी. मूल रिकॉर्ड का नष्ट होना इस मुकदमे की जांच और सुनवाई के इतिहास में एक अलग अध्याय जोड़ चुका है. आने वाली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उपलब्ध प्रतियों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मामले से जुड़े आरोपों की न्यायिक जांच किस तरह आगे बढ़ती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

