इंदौर. उज्जैन की शाही मस्जिद वक्फ पांच मोचियान से जुड़े विध्वंस नोटिस के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने समझौते के आधार पर अपील का निपटारा कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि नगर निगम ने अपने जवाब और विवादित नोटिस में जो आश्वासन दिए हैं, वे निगम के लिए बाध्यकारी रहेंगे. यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवादित कार्रवाई को लेकर पक्षकारों के बीच समझौता होने के बावजूद अपीलकर्ता की ओर से आशंका जताई गई थी कि भविष्य में निगम अपने आश्वासनों का पालन नहीं कर सकता है.
सड़क चौड़ीकरण के लिए जारी हुआ था नोटिस
मामला सिंहस्थ कुंभ से पहले उज्जैन में सड़क को 15 मीटर चौड़ा करने की योजना से जुड़ा है. नगर निगम ने इसी परियोजना के तहत शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने के संबंध में नोटिस जारी किया था. नोटिस को चुनौती देते हुए दो अलग-अलग समूहों की ओर से हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं. इन याचिकाओं को सिंगल जज ने खारिज कर दिया था. इसके बाद मामले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर की गई.
अधिकृत समिति और निगम के बीच हुआ समझौता
अपील की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि शाही मस्जिद की अधिकृत प्रशासनिक समिति और नगर निगम के बीच विवाद को लेकर समझौता हो चुका है. खंडपीठ ने इस समझौते को ध्यान में रखते हुए मामले का निपटारा किया. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते की विस्तृत शर्तें उसके समक्ष उपलब्ध नहीं थीं. इसलिए अदालत के आदेश का मुख्य आधार पक्षकारों के बीच हुए समझौते के साथ-साथ नगर निगम की ओर से रिकॉर्ड पर दिए गए आश्वासन रहे.
अपीलकर्ता ने आश्वासनों को लेकर जताई थी चिंता
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ के समक्ष अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उज्जैन में काफी अव्यवस्था है. उनका आग्रह था कि नगर निगम के साथ हुए समझौते को हाईकोर्ट के आदेश में दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य में उसकी शर्तों को लेकर कोई विवाद न रहे.
अपीलकर्ता की ओर से यह आशंका भी व्यक्त की गई कि नगर निगम ने जिन शर्तों को स्वीकार किया है, उनका बाद में पालन नहीं हो सकता है. इसी पृष्ठभूमि में अदालत के समक्ष निगम के आश्वासनों की बाध्यकारी प्रकृति को स्पष्ट करने की आवश्यकता सामने आई.
निगम ने उठाया अपील की वैधता का सवाल
सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से मामले की सुनवाई योग्य होने को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई. निगम की ओर से कहा गया कि सिंगल जज के आदेश के बाद अधिकृत प्रशासनिक समिति को संबंधित हिस्से को स्वयं हटाने का अवसर दिया गया था. साथ ही यह तर्क दिया गया कि वर्तमान अपील एक ऐसे समूह की ओर से दायर की गई है, जिसे मस्जिद के प्रशासन के लिए अधिकृत नहीं माना गया है.
इस तरह सुनवाई के दौरान विवाद केवल निर्माण हटाने के नोटिस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रश्न भी सामने आया कि मस्जिद के प्रशासनिक प्रतिनिधित्व का अधिकार किस पक्ष के पास है.
80 से ज्यादा ढांचे हटाने का निगम का दावा
नगर निगम ने सड़क चौड़ीकरण परियोजना को लेकर अदालत को बताया कि अब तक 80 से अधिक ढांचे हटाए जा चुके हैं. निगम के अनुसार इनमें अधिकांश मंदिर शामिल हैं. निगम ने यह भी दावा किया कि शाही मस्जिद के कुल क्षेत्रफल के 10 प्रतिशत से भी कम हिस्से को हटाने का प्रस्ताव है.
यह जानकारी निगम की ओर से सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई के व्यापक स्वरूप को सामने रखने के लिए दी गई. हालांकि, अदालत के आदेश में इस दावे को किसी स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में दर्ज नहीं किया गया है, बल्कि इसे निगम की ओर से रखे गए पक्ष के तौर पर ही देखा गया.
सुनवाई में दिखाए गए दो वीडियो
मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से खंडपीठ को दो वीडियो भी दिखाए गए. प्रतिवादियों के अनुसार इन वीडियो में प्रशासन द्वारा नगर निगम के साथ हुए समझौते के तहत मस्जिद के संबंधित हिस्से को हटाने की कार्रवाई दिखाई दे रही थी.
समझौते और मौके पर हुई कार्रवाई का हवाला देते हुए प्रतिवादियों ने अदालत से अपील का निपटारा करने का अनुरोध किया. हाईकोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और अपील का निपटारा कर दिया.
निगम के आश्वासन पर हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू हाईकोर्ट द्वारा नगर निगम के आश्वासनों को बाध्यकारी बनाए रखना है. खंडपीठ ने अपीलकर्ता की उस आशंका को भी ध्यान में रखा, जिसमें निगम द्वारा भविष्य में आश्वासनों का पालन नहीं किए जाने की चिंता जताई गई थी.
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नगर निगम ने अपने जवाब और विवादित नोटिस में जो आश्वासन दिए हैं, वे निगम पर बाध्यकारी होंगे. इसका अर्थ यह है कि अपील का निपटारा हो जाने के बावजूद निगम अपने रिकॉर्ड पर दिए गए आश्वासनों से पीछे नहीं हट सकता.
आदेश का केंद्र विवाद का समाधान रहा
हाईकोर्ट ने इस मामले में मस्जिद के स्वामित्व या धार्मिक स्वरूप से जुड़े किसी व्यापक विवाद पर कोई नया निष्कर्ष दर्ज नहीं किया. अदालत के समक्ष मुख्य स्थिति यह थी कि अधिकृत प्रशासनिक समिति और नगर निगम के बीच विवाद का समाधान समझौते के माध्यम से हो चुका है. इसी आधार पर अपील का निपटारा किया गया.
साथ ही अदालत ने निगम के आश्वासनों को बाध्यकारी बताकर यह स्पष्ट कर दिया कि समझौते के बाद भी प्रशासनिक पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर किए गए वादों की कानूनी अहमियत बनी रहेगी.
अब आगे की कार्रवाई पर रहेगी नजर
हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामले का अपीलीय चरण समझौते के आधार पर समाप्त हो गया है. अब सड़क चौड़ीकरण परियोजना और समझौते के तहत संबंधित हिस्से को लेकर नगर निगम तथा अधिकृत प्रशासनिक समिति की आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी. विशेष रूप से निगम द्वारा अदालत के समक्ष दिए गए आश्वासनों का पालन किस तरह किया जाता है, यह इस आदेश के व्यावहारिक प्रभाव का प्रमुख पहलू रहेगा.
यह आदेश 28 सितंबर 2026 को जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ के समक्ष पारित हुआ. उपलब्ध आदेश-संबंधी रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने समझौते की विस्तृत शर्तों को अपने समक्ष उपलब्ध न होने की बात भी दर्ज की है. इसलिए आदेश को समझौते की सभी शर्तों पर न्यायिक मुहर के रूप में नहीं, बल्कि समझौते के आधार पर अपील के निपटारे और निगम के दर्ज आश्वासनों को बाध्यकारी बनाए रखने के रूप में समझना उचित है
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

