सेना को मिलेगी 300 धनुष तोपों की ताकत, जीसीएफ में उत्पादन की तैयारी अंतिम दौर में

सेना को मिलेगी 300 धनुष तोपों की ताकत, जीसीएफ में उत्पादन की तैयारी अंतिम दौर में

प्रेषित समय :19:16:13 PM / Wed, Sep 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. ऑपरेशन सिंदूर के बाद स्वदेशी रक्षा हथियारों को लेकर बढ़ी चर्चा के बीच जबलपुर की गन कैरिज फैक्ट्री (जीसीएफ) में धनुष तोप के उत्पादन को लेकर बड़ा विस्तार होने जा रहा है. भारतीय सेना के लिए 300 धनुष तोप तैयार करने की तैयारी अब अंतिम दौर में पहुंच गई है. जीसीएफ को यह बड़ा उत्पादन लक्ष्य मिलने की प्रक्रिया चल रही है और प्रस्ताव को जल्द ही अंतिम मंजूरी मिलने की उम्मीद है. योजना के मुताबिक 300 तोपों की यह खेप पांच वर्षों में चरणबद्ध तरीके से भारतीय सेना के बेड़े में शामिल की जाएगी.

धनुष को भारतीय सेना की 155 मिलीमीटर, 45 कैलिबर की उन्नत स्वदेशी हावित्जर तोप के रूप में विकसित किया गया है. अपनी क्षमता और स्वदेशीकरण के कारण इसे अक्सर ‘देसी बोफोर्स’ के नाम से भी जाना जाता है. जबलपुर स्थित जीसीएफ लंबे समय से इसके उत्पादन और तकनीकी विकास से जुड़ी रही है. अब बड़े उत्पादन लक्ष्य के साथ फैक्ट्री में धनुष के निर्माण को नई गति मिलने की संभावना है.

300 धनुष तोपों के उत्पादन की तैयारी अंतिम दौर में
जीसीएफ के महाप्रबंधक राहुल चौधरी के अनुसार सेना के लिए नई धनुष तोप तैयार करने को लेकर चर्चा अंतिम दौर में है. आयुध क्षेत्र में शानदार उत्पादन के लिए जीसीएफ को मिले इस महत्वपूर्ण काम को जल्द ही हरी झंडी मिलने की उम्मीद है. योजना के अनुसार 300 धनुष तोपों का निर्माण एक साथ करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा. पांच वर्षों की अवधि में तैयार होने वाली ये तोपें भारतीय सेना के बेड़े में शामिल होंगी.

यह उत्पादन लक्ष्य जीसीएफ के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि धनुष के विकास से लेकर इसके स्वदेशीकरण तक फैक्ट्री ने लंबा सफर तय किया है. अब बड़ी संख्या में उत्पादन के साथ भारतीय सेना की तोपखाना क्षमता को स्वदेशी प्लेटफार्म के माध्यम से मजबूत करने की दिशा में काम आगे बढ़ेगा.

13 वर्षों में 21 से 95 प्रतिशत तक पहुंचा स्वदेशीकरण
धनुष तोप की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसका लगातार बढ़ता स्वदेशीकरण शामिल है. जब इस तोप पर काम शुरू हुआ था, उस समय इसमें स्वदेशी कलपुर्जों की हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत थी. तकनीकी विकास, देश में निर्माण क्षमता बढ़ने और अलग-अलग कलपुर्जों के स्वदेशी उत्पादन के साथ अब यह हिस्सेदारी करीब 95 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है.

इस बदलाव को भारतीय रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. धनुष के नए संस्करण में विदेशी निर्भरता को कम करने पर विशेष जोर दिया गया है. जीसीएफ में इसके उत्पादन के साथ स्थानीय स्तर पर रक्षा उपकरण निर्माण से जुड़े तकनीकी कौशल और औद्योगिक क्षमता को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है.

माउंटेन गन के रूप में भी होगी धनुष की भूमिका
धनुष के नए संस्करण में सिर्फ उत्पादन संख्या बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, बल्कि इसकी परिचालन भूमिका को भी विस्तारित किया जा रहा है. धनुष का माउंटेन गन संस्करण तैयार किया जाएगा. इस संस्करण की खासियत यह होगी कि इसे ट्रक से स्वचालित तरीके से ले जाया जा सकेगा.

पारंपरिक टोड गन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए भारी सैन्य ट्रक या आर्टिलरी ट्रैक्टर की जरूरत होती है. इसके मुकाबले माउंटेन गन संस्करण को अधिक गतिशील बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है. पहाड़ी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य तैनाती के लिहाज से इस तरह की गतिशीलता महत्वपूर्ण हो सकती है.

38 किलोमीटर की मारक क्षमता को 44 किलोमीटर से अधिक करने की तैयारी
धनुष की मौजूदा मारक क्षमता करीब 38 किलोमीटर बताई जाती है. अब इसे अपग्रेड कर 44 किलोमीटर से अधिक करने की तैयारी है. इसके लिए तकनीकी उन्नयन पर काम किया जा रहा है. मारक क्षमता में वृद्धि के साथ तोप की परिचालन उपयोगिता और प्रभावी दूरी बढ़ाने का लक्ष्य है.

धनुष 155 मिलीमीटर और 45 कैलिबर की हावित्जर तोप है. यह एक मिनट में करीब छह राउंड फायर करने में सक्षम है. इसकी फायरिंग क्षमता और गतिशीलता इसे आधुनिक तोपखाने की जरूरतों के अनुरूप विकसित किए जाने वाले प्लेटफार्मों में शामिल करती है.

2012 में शुरू हुआ था धनुष पर काम
जीसीएफ में धनुष तोप पर काम वर्ष 2012 में शुरू हुआ था. शुरुआती दौर में इसके निर्माण में स्वदेशी कलपुर्जों की हिस्सेदारी सीमित थी. इसके बाद लगातार तकनीकी सुधार और स्वदेशीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती गई. करीब 13 वर्षों के दौरान स्वदेशी कलपुर्जों की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत तक पहुंचना इस परियोजना के तकनीकी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

धनुष के विकास में जबलपुर की आयुध निर्माण क्षमता की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. जीसीएफ लंबे समय से भारतीय सेना के लिए विभिन्न प्रकार की तोपों और रक्षा उपकरणों के निर्माण से जुड़ी रही है. धनुष के उत्पादन ने इस भूमिका को आधुनिक स्वदेशी तोप प्रणाली के निर्माण तक विस्तारित किया है.

पुरानी टोड गनों की जगह लेने की दिशा में कदम
धनुष के माउंटेन गन संस्करण को पुरानी टोड गनों के स्थान पर तैनात किए जाने की योजना है. टोड गन को तैनाती के दौरान खींचकर ले जाने के लिए अलग वाहन की जरूरत होती है. वहीं धनुष के प्रस्तावित माउंटेन संस्करण में परिवहन और तैनाती की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाने पर जोर है.

सेना की जरूरतों के अनुसार हल्की, अधिक गतिशील और आधुनिक तोप प्रणालियों की भूमिका बढ़ रही है. ऐसे में धनुष का उन्नत संस्करण पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है. हालांकि इसकी वास्तविक तैनाती और परिचालन उपयोग सेना की आवश्यकताओं तथा संबंधित प्रक्रियाओं के अनुसार तय होगा.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी स्वदेशी हथियारों में दिलचस्पी
ऑपरेशन सिंदूर के बाद देश में स्वदेशी रक्षा प्रणालियों को लेकर चर्चा तेज हुई है. इसी क्रम में धनुष तोप की क्षमता और इसके भारतीय निर्माण को लेकर भी रुचि बढ़ी है. जीसीएफ में अब 300 धनुष तोपों के बड़े उत्पादन लक्ष्य की तैयारी इसी व्यापक मांग के संदर्भ में देखी जा रही है.

हालांकि धनुष का विकास ऑपरेशन सिंदूर से पहले ही शुरू हो चुका था और इसके स्वदेशीकरण की प्रक्रिया भी कई वर्षों से जारी है. इसलिए वर्तमान उत्पादन लक्ष्य को धनुष के लंबे तकनीकी विकास और सेना की आवश्यकता के साथ जोड़कर देखा जा रहा है.

पांच साल में चरणबद्ध तरीके से सेना को मिलेंगी तोपें
300 धनुष तोपों की प्रस्तावित खेप को एक साथ तैयार करने के बजाय पांच वर्षों में चरणबद्ध तरीके से सेना को उपलब्ध कराया जाएगा. इससे उत्पादन प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के साथ गुणवत्ता और तकनीकी मानकों को बनाए रखने पर भी ध्यान दिया जा सकेगा.

जीसीएफ के लिए यह लक्ष्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगा. बड़ी संख्या में धनुष तोपों का निर्माण होने से फैक्ट्री में संबंधित उत्पादन गतिविधियों, तकनीकी प्रक्रियाओं और स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखला को भी गति मिल सकती है.

‘देसी बोफोर्स’ की पहचान से आधुनिक स्वदेशी तोप तक का सफर
धनुष को शुरुआती दौर से ही ‘देसी बोफोर्स’ के नाम से पहचान मिली. इसका कारण इसकी डिजाइन और तकनीकी विकास का बोफोर्स तोप से जुड़ा आधार रहा है. हालांकि वर्षों के तकनीकी उन्नयन और स्वदेशीकरण के बाद धनुष को भारतीय जरूरतों के अनुरूप विकसित किया गया है.

अब 95 प्रतिशत तक स्वदेशी कलपुर्जों के इस्तेमाल, 44 किलोमीटर से अधिक की प्रस्तावित मारक क्षमता और माउंटेन गन संस्करण की तैयारी के साथ धनुष का स्वरूप पहले की तुलना में काफी अधिक स्वदेशी और आधुनिक हो गया है. जबलपुर की जीसीएफ में 300 धनुष तोपों के निर्माण की तैयारी अंतिम दौर में पहुंचना इस पूरी यात्रा का अगला बड़ा चरण माना जा रहा है.

यदि प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है तो आने वाले पांच वर्षों में जीसीएफ से बड़ी संख्या में धनुष तोपें भारतीय सेना के बेड़े में शामिल होंगी. इससे जबलपुर की रक्षा उत्पादन में भूमिका और मजबूत होगी तथा स्वदेशी तोप निर्माण की क्षमता को भी विस्तार मिलेगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-