जबलपुर. मध्य प्रदेश में पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों के संचालन को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के सख्त निर्देशों का असर जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में भी पड़ सकता है. एनजीटी की केंद्रीय क्षेत्र पीठ ने क्रशर इकाइयों के वास्तविक उत्पादन, बिजली की खपत, पर्यावरणीय अनुमति और आबादी के नजदीक संचालन सहित कई बिंदुओं पर निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. हालांकि, इन निर्देशों के बावजूद जबलपुर और आसपास के इलाकों में अभी तक नियमों के पालन की स्थिति को लेकर सवाल बने हुए हैं. कई स्थानों पर आबादी और संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास पत्थर तोड़ने का काम जारी रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं.
बिजली की खपत से जांचा जाएगा वास्तविक उत्पादन
एनजीटी ने क्रशर इकाइयों द्वारा कागजों में बताए जाने वाले उत्पादन और वास्तविक उत्पादन के बीच अंतर की जांच के लिए बिजली की खपत को महत्वपूर्ण आधार बनाने के निर्देश दिए हैं. इसके तहत मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बिजली वितरण कंपनियों से क्रशर इकाइयों की मासिक बिजली खपत का रिकॉर्ड प्राप्त करना होगा.
इस रिकॉर्ड का मिलान संबंधित इकाई में लगी मशीनों की क्षमता और उनकी ऊर्जा खपत से किया जाएगा. इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कोई इकाई वास्तव में कितना उत्पादन कर रही है और उसके दस्तावेजों में कितना उत्पादन दर्ज किया जा रहा है.
जबलपुर जिले में बड़ी संख्या में पत्थर तोड़ने और गिट्टी तैयार करने वाली इकाइयों के चलते यह व्यवस्था स्थानीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. खासकर उन क्षेत्रों में जहां खनन, पत्थर परिवहन और क्रशर संचालन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
आबादी और मंदिर के पास संचालन पर रोक
एनजीटी ने संवेदनशील स्थानों के आसपास क्रशर इकाइयों के संचालन को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं. आबादी, स्कूल, मंदिर और सरकारी निर्माण जैसे स्थानों से 500 मीटर की परिधि में संचालित इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया है.
इसका सीधा असर उन क्षेत्रों पर पड़ सकता है जहां क्रशर इकाइयां आबादी के आसपास चल रही हैं. जबलपुर और जिले से लगे ग्रामीण इलाकों में कई स्थानों पर पत्थर खनन और क्रशर गतिविधियों के कारण धूल, शोर और भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर स्थानीय लोगों की शिकायतें सामने आती रही हैं.
एनजीटी के निर्देशों के तहत अब ऐसे मामलों में संबंधित इकाई की दूरी और उसके संचालन की वैधता की जांच महत्वपूर्ण होगी.
बिना अनुमति चलने वाली इकाइयों पर कार्रवाई
एनजीटी ने उन क्रशर इकाइयों के खिलाफ भी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, जो आवश्यक पर्यावरणीय अनुमति के बिना संचालित हो रही हैं. इसके अलावा स्थापना की सहमति और संचालन की सहमति के बिना चल रही इकाइयों को बंद या सील किए जाने की कार्रवाई की जा सकती है.
जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में इस व्यवस्था के प्रभावी होने के लिए स्थानीय स्तर पर सभी क्रशर इकाइयों की जांच जरूरी होगी. केवल कागजी अनुमति देखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी जांचना होगा कि इकाई वास्तव में किस स्थान पर चल रही है और वहां पर्यावरणीय शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं.
भूजल इस्तेमाल करने वाली इकाइयों पर भी नजर
पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों में धूल नियंत्रण सहित अन्य कामों के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. एनजीटी ने भूजल का उपयोग करने वाली इकाइयों के लिए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना आवश्यक बताया है.
जबलपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल का इस्तेमाल करने वाली औद्योगिक गतिविधियों के मामले में यह निर्देश महत्वपूर्ण हो सकता है. जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि संबंधित इकाई पानी के स्रोत का इस्तेमाल किस अनुमति के तहत कर रही है.
धूल रोकने के लिए पानी का छिड़काव जरूरी
क्रशर क्षेत्रों में उड़ने वाली धूल को नियंत्रित करने के लिए एनजीटी ने कई उपायों पर जोर दिया है. इनमें नियमित पानी का छिड़काव, निर्माण और खनिज सामग्री को ढंककर रखना तथा मशीनों से निकलने वाली धूल को नियंत्रित करने के उपाय शामिल हैं.
क्रशर इकाइयों में सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने वाली पट्टियों पर महीन फुहार वाली पानी की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं. इसके साथ ही क्रशर क्षेत्र के आसपास पांच मीटर चौड़ी हरित पट्टी विकसित करने पर भी जोर दिया गया है.
जबलपुर जैसे शहर के आसपास जहां तेजी से निर्माण गतिविधियां बढ़ रही हैं और गिट्टी एवं पत्थर की मांग बनी रहती है, वहां इन उपायों की निगरानी पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी.
वायु गुणवत्ता की भी होगी निगरानी
एनजीटी ने क्रशर क्षेत्रों में हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों की निगरानी पर भी जोर दिया है. खास तौर पर पीएम-10 और पीएम-2.5 जैसे कणों की स्थिति पर नजर रखने को कहा गया है.
क्रशर मशीनों से निकलने वाली धूल आसपास के वातावरण को प्रभावित कर सकती है. इसलिए केवल इकाई के भीतर धूल नियंत्रण के इंतजाम देखना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आसपास के क्षेत्र की हवा की गुणवत्ता की भी निगरानी आवश्यक होगी.
खनन से लेकर परिवहन तक आंकड़ों का होगा मिलान
एनजीटी के निर्देशों में खनिज विभाग के अभिलेख और ई-परिवहन पास व्यवस्था को क्रशर इकाइयों के उत्पादन संबंधी आंकड़ों से जोड़ने की बात भी महत्वपूर्ण है. इसका उद्देश्य खनन, खनिज परिवहन और क्रशर में तैयार होने वाले माल के आंकड़ों का आपस में मिलान करना है.
यदि किसी क्षेत्र में जितने खनिज का परिवहन दिखाया जा रहा है और उसके मुकाबले क्रशर उत्पादन के आंकड़ों में बड़ा अंतर मिलता है, तो उसकी जांच की जा सकती है. इससे अवैध खनन या उत्पादन से जुड़े मामलों की पहचान में भी मदद मिल सकती है.
जबलपुर में निर्देशों के असर की असली परीक्षा
एनजीटी के निर्देश सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल इनके जमीनी स्तर पर पालन का है. जबलपुर और आसपास के इलाकों में क्रशर इकाइयों की संख्या और उनके आसपास मौजूद आबादी को देखते हुए अधिकारियों के सामने व्यापक जांच की चुनौती रहेगी.
फिलहाल स्थानीय स्तर पर ऐसी स्थिति नहीं है कि एनजीटी के निर्देश जारी होते ही सभी क्रशर इकाइयों पर नियमों का पालन शुरू हो गया हो. कई जगह पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन, धूल नियंत्रण के अपर्याप्त इंतजाम और संवेदनशील स्थानों के आसपास गतिविधियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इसलिए एनजीटी के निर्देशों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब संबंधित विभाग मौके पर जाकर कार्रवाई और नियमित निगरानी करेंगे.
कागजों की बजाय मौके पर जांच की जरूरत
जबलपुर के संदर्भ में इन निर्देशों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मौके पर होने वाली जांच होगी. क्रशर इकाइयों की दूरी, मशीनों की क्षमता, बिजली की वास्तविक खपत, उत्पादन, खनिज परिवहन, पानी के उपयोग और पर्यावरणीय अनुमति की स्थिति का एक साथ परीक्षण करना होगा.
सिर्फ दस्तावेजों में नियम पूरे दिखाने से पर्यावरणीय समस्या का समाधान नहीं होगा. एनजीटी ने जिस तरह बिजली खपत और खनिज परिवहन के आंकड़ों के मिलान पर जोर दिया है, उससे निगरानी व्यवस्था को वास्तविक गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की गई है.
अब देखना यह होगा कि जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में संबंधित विभाग इन निर्देशों को किस स्तर तक जमीन पर लागू करते हैं. यदि जांच नियमित और प्रभावी तरीके से होती है, तो आबादी के नजदीक संचालित क्रशर इकाइयों, धूल प्रदूषण और अनधिकृत संचालन पर कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हो सकती है. फिलहाल एनजीटी के निर्देश लागू होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर नियमों के उल्लंघन की शिकायतें और सवाल बने हुए हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

