जबलपुर. एमबीबीएस प्रथम वर्ष की पूरक परीक्षा में शरीर रचना विज्ञान विषय में महज एक अंक से अनुत्तीर्ण हुए छात्र को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब संबंधित नियमों में अनुग्रह अंक यानी ग्रेस मार्क्स देने का कोई प्रविधान ही नहीं है, तो न्यायालय विश्वविद्यालय को नियमों से हटकर छात्र को अतिरिक्त अंक देने का निर्देश नहीं दे सकता. इसी आधार पर न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने ग्वालियर के गजरा राजा चिकित्सा महाविद्यालय के छात्र राम नरेश कुशवाहा की याचिका निरस्त कर दी.
छात्र ने पुनर्मूल्यांकन के साथ मांगा था एक अंक
मामला मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर से जुड़ा है. याचिकाकर्ता राम नरेश कुशवाहा एमबीबीएस प्रथम वर्ष का छात्र है. पूरक परीक्षा में वह शरीर रचना विज्ञान विषय में निर्धारित उत्तीर्ण अंक हासिल नहीं कर सका. उसके अनुसार वह पासिंग मार्क्स से केवल एक अंक पीछे रह गया था. इसके बाद छात्र ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए अपनी उत्तरपुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग की. इसके साथ ही उसने एक अनुग्रह अंक देकर उसे उत्तीर्ण घोषित किए जाने का आग्रह भी किया.
छात्र की ओर से यह तर्क रखा गया कि केवल एक अंक की कमी के कारण उसका शैक्षणिक वर्ष प्रभावित हो सकता है. इसलिए मामले में मानवीय और शैक्षणिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उसे एक अंक की राहत दी जानी चाहिए.
दूसरे मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की राय भी रखी
याचिकाकर्ता ने अपनी मांग के समर्थन में भोपाल स्थित एक अन्य चिकित्सा महाविद्यालय के प्रोफेसर की राय भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की. बताया गया कि संबंधित प्रोफेसर ने छात्र को एक अंक दिए जाने की सिफारिश की थी. छात्र ने इस राय को अपनी उत्तरपुस्तिका और परिणाम से जुड़ी मांग के समर्थन में आधार बनाने का प्रयास किया.
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को राहत का आधार नहीं माना. न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या लागू नियमों में व्यवस्था नहीं होने के बावजूद विश्वविद्यालय को किसी छात्र को अनुग्रह अंक देने का निर्देश दिया जा सकता है.
एनएमसी के नियमों में नहीं है ग्रेस मार्क्स का प्रविधान
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग यानी एनएमसी से संबंधित नियमों का भी परीक्षण किया. युगलपीठ ने पाया कि संबंधित नियमों में ऐसी स्थिति में छात्र को अनुग्रह अंक दिए जाने का कोई प्रविधान नहीं है. जब नियम ही ग्रेस मार्क्स देने की अनुमति नहीं देते, तो न्यायालय द्वारा विश्वविद्यालय को ऐसा करने का निर्देश देना नियमों के अनुरूप नहीं होगा.
युगलपीठ ने इसी बिंदु को मामले में महत्वपूर्ण माना. न्यायालय ने कहा कि विश्वविद्यालय को ऐसे अंक देने के लिए निर्देशित नहीं किया जा सकता, जिनकी व्यवस्था संबंधित नियमों में नहीं है. किसी छात्र के एक अंक से अनुत्तीर्ण होने की स्थिति अपने आप में नियमों से अलग जाकर अतिरिक्त अंक देने का आधार नहीं बन सकती.
व्यक्तिगत राय नियमों का विकल्प नहीं
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अन्य चिकित्सा महाविद्यालय के प्रोफेसर की व्यक्तिगत राय को विश्वविद्यालय के लागू नियमों का विकल्प नहीं माना जा सकता. प्रोफेसर ने छात्र को एक अंक देने की सिफारिश की थी, लेकिन ऐसी सिफारिश के आधार पर विश्वविद्यालय को नियमों के विपरीत निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.
न्यायालय के सामने छात्र की कठिनाई और केवल एक अंक की कमी का तथ्य था, लेकिन राहत देने के लिए आवश्यक वैधानिक आधार मौजूद नहीं था. यही वजह रही कि छात्र की ओर से प्रस्तुत विशेषज्ञ राय भी उसे न्यायिक राहत दिलाने में पर्याप्त नहीं मानी गई.
शैक्षणिक वर्ष बचाने की दलील भी काम नहीं आई
याचिका में एक प्रमुख आधार यह भी था कि यदि छात्र को एक अंक नहीं मिलता है तो उसका शैक्षणिक वर्ष प्रभावित हो सकता है. छात्र के लिए एक अंक का अंतर परिणाम की दृष्टि से महत्वपूर्ण था. हालांकि, हाई कोर्ट ने माना कि केवल शैक्षणिक वर्ष बचाने की आवश्यकता के आधार पर नियमों में उपलब्ध नहीं होने वाली राहत नहीं दी जा सकती.
युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायालय का हस्तक्षेप नियमों के आधार पर होना चाहिए. यदि संबंधित परीक्षा व्यवस्था में ग्रेस मार्क्स का प्रावधान नहीं है, तो केवल परिणाम के संभावित प्रभाव को देखते हुए विश्वविद्यालय को अतिरिक्त अंक देने का आदेश नहीं दिया जा सकता.
पुनर्मूल्यांकन की मांग भी राहत नहीं दिला सकी
छात्र ने शरीर रचना विज्ञान की उत्तरपुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग भी की थी. इसके साथ एक अनुग्रह अंक देने का आग्रह किया गया था. लेकिन मामले में न्यायालय ने उपलब्ध नियमों और प्रस्तुत तथ्यों को देखते हुए याचिकाकर्ता को मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया.
कोर्ट के आदेश का मूल आधार यह रहा कि परीक्षा परिणाम में हस्तक्षेप और अतिरिक्त अंक देने के लिए स्पष्ट नियम या वैधानिक आधार आवश्यक है. केवल यह तथ्य कि छात्र एक अंक से अनुत्तीर्ण हुआ है, अपने आप में विश्वविद्यालय की मूल्यांकन प्रक्रिया को बदलने का पर्याप्त आधार नहीं है.
विश्वविद्यालय को नियमों के विपरीत आदेश नहीं दिया जा सकता
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालय एक निर्धारित नियमावली के तहत परीक्षा और मूल्यांकन की प्रक्रिया संचालित करता है. न्यायालय उस प्रक्रिया में तभी हस्तक्षेप कर सकता है, जब नियमों का उल्लंघन या कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि सामने आए. जहां नियमों में ग्रेस मार्क्स देने की व्यवस्था ही नहीं है, वहां न्यायालय स्वयं ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकता.
युगलपीठ ने इसी आधार पर कहा कि विश्वविद्यालय को एक अंक देकर छात्र को उत्तीर्ण करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता. इस प्रकार छात्र की ओर से की गई मांग को नियमों के अभाव में स्वीकार नहीं किया गया.
याचिका को सारहीन मानकर किया निरस्त
पूरे मामले पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने छात्र की याचिका को सारहीन पाते हुए निरस्त कर दिया. कोर्ट ने माना कि एक अंक की कमी और शैक्षणिक वर्ष बचाने की दलील के बावजूद ऐसी राहत देने का कोई नियमगत आधार नहीं है.
इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि मेडिकल परीक्षा में छात्र के पासिंग मार्क्स से मामूली अंतर होने मात्र से अनुग्रह अंक का दावा स्वतः स्वीकार्य नहीं हो जाता. इसके लिए संबंधित परीक्षा नियमों में स्पष्ट प्रावधान होना आवश्यक है.
दोनों पक्षों की ओर से अधिवक्ताओं ने रखा पक्ष
मामले में राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित ने पक्ष रखा. वहीं मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से अधिवक्ता नीरज सिंह चौहान ने पैरवी की. दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध नियमों पर विचार करने के बाद युगलपीठ ने अपना आदेश सुनाया.
इस मामले में हाई कोर्ट का रुख परीक्षा मूल्यांकन से जुड़े नियमों की बाध्यता पर केंद्रित रहा. छात्र के एक अंक से अनुत्तीर्ण होने और उसके शैक्षणिक वर्ष पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को देखते हुए राहत की मांग की गई थी, लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नियमों में व्यवस्था नहीं होने की स्थिति में विश्वविद्यालय को अतिरिक्त अंक देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

