शारदीय नवरात्र में करें श्रीकृष्ण कृत देवी स्तुति का पाठ, मां दुर्गा की आराधना से जुड़ा है यह प्राचीन स्तोत्र

शारदीय नवरात्र में करें श्रीकृष्ण कृत देवी स्तुति का पाठ, मां दुर्गा की आराधना से जुड़ा है यह प्राचीन स्तोत्र

प्रेषित समय :22:28:44 PM / Sat, Oct 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

शारदीय नवरात्र मां दुर्गा की उपासना, साधना और भक्ति का विशेष पर्व है. इन नौ दिनों में भक्त मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख, शांति, समृद्धि तथा संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं. देवी उपासना की प्राचीन परंपरा में श्रीकृष्ण कृत देवी स्तुति का भी उल्लेख मिलता है. इस स्तोत्र में देवी को समस्त सृष्टि की जननी, आदिशक्ति, त्रिगुणात्मिका, ज्ञान और बुद्धि की प्रदात्री तथा भक्तों की रक्षक के रूप में नमन किया गया है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्तुति में मां देवी के विविध स्वरूपों और उनकी शक्तियों का वर्णन है. इसके श्लोक देवी को सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार से जुड़ी परम शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं. नवरात्र के दौरान देवी आराधना करने वाले श्रद्धालु इस स्तोत्र का पाठ भक्ति और श्रद्धा के साथ कर सकते हैं. मान्यता है कि नियमित पाठ से मन को एकाग्र करने, आत्मबल बढ़ाने और ईश्वर के प्रति विश्वास मजबूत करने में सहायता मिलती है. हालांकि, संकट दूर होने या मनोकामना पूरी होने के दावों को धार्मिक आस्था के रूप में ही समझना चाहिए.

. श्री कृष्ण कृत देवी स्तुति ..

देवी की स्तोत्र की रचना व स्तुति श्री कृष्ण द्वारा वसंत ऋतु में गोलोक में रास मंडल के मध्य देवी के पूजन में की थी. मधु कैटभ से युद्ध के समय श्री हरि विष्णु ने माता की प्रसन्नता हेतु और कृपा हेतु इसकी स्तुति की थी.

एक अन्य कथा के अनुसार श्री ब्रह्मदेव ने प्राण संकट में पड़ने पर देवी की स्तुति इस स्तोत्र द्वारा की थी. इस स्तोत्र की महिमा यह है कि इसका पाठ करने वाला व्यक्ति यदि ३६५ दिन यानी १ वर्ष में नित्य इसका पाठ कर ले तो वह सभी भूलोक पर मिल रहे दुखों व संकटों से मुक्त हो जाता है.

विकट परिस्थितियों में इसका अनुष्ठान कर व्यक्ति बड़ी सी बड़ी समस्या से दूर हो जाता है. यह अपने आप में शत्रु नाशन स्तोत्र भी है, जो आपके प्रबल से प्रबल शत्रु का नाश क्षण भर में कर सकता है. यदि आप संकल्प लेकर इसका अनुष्ठान करते हैं.

इसी प्रकार यदि आप दरिद्र दुख से पीड़ित है या रोग से पीड़ित है या किसी भी वंचित मनोकामना की पूर्ति हेतु इस स्तुति का पाठ आप करते हैं तो निश्चित ही माँ वर्ष भर में ही कृपा कर आपकी वह मनोकामना पूर्ण करती हैं और आपके उसे दुख को पूर्ण रूप से समाप्त करती हैं. ब्रह्म वैवृत पुराण की प्रकृति खंड में इसका वर्णन किया गया है.

मात्र लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर बैठकर शुद्ध देसी घी का दीपक प्रचलित कर माता के समक्ष इसका पाठ करना होता है और पाठ पूर्ण हो जाने पर श्रद्धापूर्वक माता का पूजन आरती भक्ति भाव से कर व्यक्ति निश्चित ही इस महा शक्तिशाली उपाय का लाभ जीवन में प्राप्त कर सकता है.

श्री कृष्ण उवाच.

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी.

त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका..१..

कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्.

परब्रह्मस्वरुपा त्वं सत्या नित्या सनातनी..२..

तेजःस्वरुपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा.

सर्वस्वरुपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा..३..

सर्वबीजस्वरुपा च सर्वपूज्या निराश्रया.

सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला..४..

सर्वबुद्धिस्वरूपा च सर्वशक्तिस्वरूपिणी.

सर्वज्ञानप्रदा देवी सर्वज्ञा सर्वभाविनी..५..

त्वं स्वाहा देवदाने च पितृदाने स्वधा स्वयम्.

दक्षिणा सर्वदाने च सर्वशक्तिस्वरुपिणी..६..

निद्रा त्वं च दया त्वं च तृष्णा त्वं चात्मनः प्रिया.

क्षुत्क्षान्तिः शान्तिरीशा च कान्तिः सृष्टिश्च शाश्वती..७..

श्रद्धा पुष्टिश्च तन्द्रा च लज्जा शोभा दया तथा.

सतां सम्पत्स्वरूपा च विपत्तिरसतामिह..८..

प्रीतिरूपा पुण्यवतां पापिनां कलहांकरा.

शश्वत्कर्ममयी शक्तिः सर्वदा सर्वजीविनाम्..९..

देवेभ्यः स्वपदोदात्री धातुर्धात्री कृपामयी.

हिताय सर्वदेवानां सर्वासुरविनाशिनी..१०..

योगनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनाम्.

सिद्धिस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धयोगिनी..११..

ब्राह्मणी माहेश्वरी च विष्णुमाया च वैष्णवी.

भद्रदा भद्रकाली च सर्वलोकभयणङ्करी..१२..

ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे..

सतां कीर्तिः प्रतिष्ठा च निन्दा त्वमसतां सदा..१३..

महायुद्धे महामारी दुष्टसंहाररूपिणी.

रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी..१४..

वन्द्या पूज्या स्तुता त्वं च ब्रह्मादीनां च सर्वदा.

ब्राह्मण्यरूपा विप्राणां तपस्या च तपस्विनाम्..१५ ..

विद्या विद्यावतां त्वं च बुद्धिर्बुद्धिमतां सताम्.

मेधास्मृतिस्वरुपा च प्रतिभा प्रतिभावताम्..१६..

राज्ञां प्रतापररुपा च विशां वाणिज्यरूपिणी.

सृष्टौ सृष्टिस्वरुपा त्वं रक्षारुपा च पालने..१७..

तथान्ते त्वं महामारी विश्वस्य विश्वपूजिते.

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी..१८..

दुरत्यया में माया त्वं यया सम्मोहितं जगत्.

यया मुग्धो हि विद्वांश्च मोक्षमार्गं न पश्यति..१९..

इत्यात्मना कृतं स्तोत्रं दुर्गाया दुर्गनाशनम्.

पूजाकाले पठेद्यो हि सिद्धिर्भवति वाञ्चिता..२०..

.. इति श्रीकृष्ण कृतं देवी स्तुतिः सम्पूर्ण: ..

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-