बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पैतृक संयुक्त संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार कानून में वर्ष 2005 में हुए संशोधन से पहले हो जाने मात्र से बेटी को संपत्ति में उसके कानूनी हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भाई की दूसरी अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा. मामले में बहन को विवादित कृषि भूमि में आधा हिस्सा देने और अलग कब्जा दिलाने का आदेश पहले ही दिया जा चुका था.
बेमेतरा की कृषि भूमि को लेकर भाई-बहन में विवाद
यह मामला बेमेतरा जिले के धंगांव गांव की 7.120 हेक्टेयर कृषि भूमि से जुड़ा है. उपलब्ध मामले के विवरण के अनुसार, जमीन पिता नानकू साहू के नाम पर दर्ज थी, जिनका निधन 15 सितंबर 1980 को हो गया था. इसके बाद उनके बेटे डुलार साहू ने भूमि अपने नाम दर्ज करा ली.
बहन दुलारा बाई ने इस नामांतरण पर आपत्ति जताते हुए वर्ष 2007 में संपत्ति में अपना हिस्सा मांगा. विवाद का समाधान नहीं होने पर उसने अदालत में बंटवारे और जमीन पर अलग कब्जा दिलाने के लिए मुकदमा दायर किया. निचली अदालतों ने उसके पक्ष में निर्णय दिया. इसके बाद भाई ने इन फैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी.
गहने देने से जमीन पर बेटी का अधिकार खत्म नहीं होता
सुनवाई के दौरान भाई की ओर से दलील दी गई कि माता-पिता की मृत्यु के बाद बहन को सोने-चांदी के गहने दिए गए थे. उसके मुताबिक, इससे बहन का संपत्ति पर दावा समाप्त हो गया था. भाई ने लंबे समय से जमीन पर खेती करने और पहले ही बंटवारा हो जाने का तर्क भी रखा.
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया. अदालत के अनुसार, गहने या अन्य चल संपत्ति दिए जाने की बात अपने आप यह साबित नहीं करती कि किसी बेटी ने अचल संपत्ति में अपना कानूनी हिस्सा छोड़ दिया है. अधिकार छोड़ने के दावे को प्रमाणित करने के लिए ठोस साक्ष्य और संबंधित कानूनी शर्तों का पूरा होना जरूरी है.
लंबे समय तक खेती करना भी पर्याप्त नहीं
भाई ने जमीन पर लंबे समय से कब्जा होने का हवाला देते हुए प्रतिकूल कब्जे का तर्क दिया था. इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल 12 साल से अधिक समय तक खेती करने से प्रतिकूल कब्जा अपने आप सिद्ध नहीं हो जाता.
संयुक्त संपत्ति में किसी एक सह-हिस्सेदार का कब्जा सामान्यतः अन्य सह-हिस्सेदारों के अधिकारों को समाप्त नहीं करता. इसके लिए यह दिखाना आवश्यक होता है कि दूसरे पक्ष के अधिकार को स्पष्ट रूप से नकारा गया था और प्रतिकूल कब्जे की कानूनी शर्तें पूरी हुई थीं.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाया आधार
मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की संशोधित धारा 6 और सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा फैसले का भी उल्लेख हुआ. इसी कानूनी सिद्धांत के आधार पर बेटी के सहदायिकी अधिकारों पर विचार किया गया.
कानून के अनुसार, संशोधित प्रावधानों के तहत बेटी को बेटे के समान सहदायिकी अधिकार जन्म से प्राप्त होते हैं. केवल इस वजह से उसका अधिकार समाप्त नहीं माना जा सकता कि पिता की मृत्यु 9 सितंबर 2005 से पहले हो गई थी.
हालांकि, कानून में निर्धारित तारीख से पहले हुए बंटवारे के दावे की जांच संबंधित कानूनी कसौटियों के आधार पर की जाती है. अदालत ने कहा कि कथित मौखिक बंटवारे का दावा मात्र पर्याप्त नहीं है; उसके समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण होने चाहिए.
हाईकोर्ट ने बरकरार रखा निचली अदालतों का फैसला
मामले की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पाया कि निचली अदालतों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं है. इसके बाद भाई की दूसरी अपील खारिज कर दी गई और बहन को जमीन में आधा हिस्सा तथा अलग कब्जा देने संबंधी आदेश कायम रहा.
यह फैसला संपत्ति विवादों में बेटियों के अधिकार, कथित पारिवारिक समझौते और प्रतिकूल कब्जे के दावों के कानूनी परीक्षण को लेकर महत्वपूर्ण है. हालांकि, प्रत्येक मामले में संपत्ति की प्रकृति, लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निर्णय होता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

