जंतर-मंतर हिंसा की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की समिति ने खोला पोर्टल, गोपनीय शिकायत और साक्ष्य अपलोड करने की सुविधा

जंतर-मंतर हिंसा की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की समिति ने खोला पोर्टल, गोपनीय शिकायत और साक्ष्य अपलोड करने की सुविधा

प्रेषित समय :20:38:18 PM / Sat, Oct 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. दिल्ली के जंतर-मंतर और राजधानी के बाहर जुलाई 2026 में हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा, पेलेट गन के कथित इस्तेमाल और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की जांच अब ऑनलाइन शिकायतों और साक्ष्यों के आधार पर भी आगे बढ़ेगी. सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई पावर्ड इंक्वायरी कमेटी (HPEC) ने प्रभावित लोगों और अन्य संबंधित पक्षों की शिकायतें, अभ्यावेदन तथा साक्ष्य प्राप्त करने के लिए पोर्टल शुरू किया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शनिवार, 17 अक्टूबर को इसकी जानकारी दी.

पोर्टल http://hpec.nic.in के माध्यम से प्रभावित लोग अपनी शिकायतें और उपलब्ध साक्ष्य जमा कर सकते हैं. इनमें प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मी और अन्य सुरक्षा बलों के जवान भी शामिल हैं. समिति की जांच में पेलेट गन के इस्तेमाल, महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाए जाने और उनके साथ कथित दुर्व्यवहार, दोनों पक्षों की ओर से हुई हिंसा तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी.

यह पहल ऐसे समय में हुई है, जब जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप सामने आए थे. दूसरी ओर, प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी जांच के दायरे में हैं. समिति का उद्देश्य इन परस्पर विरोधी दावों और घटनाओं की स्वतंत्र जांच करना है.

शिकायत और साक्ष्य जमा करने के लिए चार विकल्प

गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार, पोर्टल को इस तरह तैयार किया गया है कि प्रभावित लोग अपनी स्थिति के अनुसार जानकारी साझा कर सकें. उपलब्ध विवरण के मुताबिक, इसमें शिकायत या जानकारी जमा करने के चार अलग-अलग विकल्प हैं.

पहला विकल्प उन लोगों के लिए है, जो स्वयं प्रभावित हुए हैं. इसमें पुलिसकर्मी और अन्य सुरक्षा बलों के जवान भी शामिल हैं. दूसरा विकल्प उन लोगों के लिए है, जो शिकायत देना चाहते हैं या घटना के गवाह हैं, लेकिन अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हैं. तीसरे विकल्प के माध्यम से अन्य जानकारी गोपनीय रूप से साझा की जा सकती है. चौथा विकल्प समिति को सुझाव देने के लिए रखा गया है.

हर श्रेणी के लिए अलग-अलग प्रश्न और शिकायत संलग्न करने की सुविधा उपलब्ध है. प्रभावित व्यक्ति घटना से जुड़े फोटो, वीडियो, चोटों की तस्वीरें और मेडिकल रिपोर्ट जैसे दस्तावेज भी अपलोड कर सकते हैं. पोर्टल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित सवाल भी शामिल किया गया है, ताकि इस तरह की शिकायतों को अलग से दर्ज किया जा सके.

समिति ने संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा और उनकी पहचान गोपनीय रखने की व्यवस्था पर जोर दिया है. मंत्रालय के अनुसार, प्रभावित व्यक्ति चाहें तो अपनी पहचान उजागर किए बिना जानकारी दे सकते हैं. यह सुविधा उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, जिन्हें शिकायत करने के बाद प्रतिशोध, दबाव या सामाजिक परेशानी का डर है.

ऑनलाइन शिकायत के अलावा डाक और व्यक्तिगत रूप से आवेदन की सुविधा

जो लोग ऑनलाइन शिकायत दर्ज नहीं करना चाहते या पोर्टल का इस्तेमाल करने में असमर्थ हैं, उनके लिए अन्य माध्यम भी उपलब्ध कराए गए हैं. गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक, शिकायतें और अभ्यावेदन नई दिल्ली स्थित समिति के कार्यालय में जमा किए जा सकते हैं.

समिति का कार्यालय शिक्षा सदन, 17, राउज एवेन्यू इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-110002 में है. वहां सभी कार्यदिवसों में दोपहर 2 बजे से शाम 4 बजे के बीच आवेदन जमा किए जा सकते हैं. इसके अलावा, इसी पते पर डाक से शिकायत भेजने और hpec2026.enquiry@nic.in पर ईमेल करने का विकल्प भी दिया गया है.

मंत्रालय ने प्रभावित लोगों और अन्य संबंधित पक्षों से अपील की है कि वे उपलब्ध प्रारूप के अनुसार अपनी शिकायतें, अभ्यावेदन और जरूरी साक्ष्य जमा करें. इससे समिति को घटनाओं के विभिन्न पहलुओं की जांच करने में मदद मिल सकती है.

पेलेट गन के इस्तेमाल पर रहेगा विशेष ध्यान

समिति की जांच में पेलेट गन के कथित इस्तेमाल को प्राथमिकता दिए जाने का निर्णय महत्वपूर्ण है. जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा पेलेट चलाए जाने के आरोप सामने आए थे. रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शन में घायल हुए कुछ लोगों के शरीर पर पेलेट से होने वाली चोटों की बात कही गई थी.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम चार लोगों—25 वर्षीय शेख इरशाद मंसूरी, 32 वर्षीय नूतन टोप्पो, 28 वर्षीय एक रिपोर्टर और 19 वर्षीय साहिल लोचब—को पेलेट से चोट लगने की जानकारी सामने आई थी. रिपोर्ट में कहा गया कि मेडिकल-लीगल केस (एमएलसी) रिपोर्ट में पेलेट से हुए घावों की पुष्टि हुई थी. हालांकि, पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की ओर से पेलेट के इस्तेमाल को लेकर टिप्पणी किए जाने की जानकारी रिपोर्ट में नहीं दी गई.

पेलेट गन को भीड़ नियंत्रण में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों में शामिल बताया जाता है. इनके इस्तेमाल को लेकर पहले भी विवाद रहे हैं, विशेषकर जम्मू-कश्मीर में पेलेट से आंखों की रोशनी जाने की घटनाओं के बाद. जुलाई के दिल्ली प्रदर्शन में इनके कथित इस्तेमाल ने भी सवाल खड़े किए थे. विपक्षी दलों, छात्रों और विशेषज्ञों ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की उपयुक्तता पर सवाल उठाए थे.

अब समिति यह जांच करेगी कि पेलेट गन का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में हुआ, क्या बल प्रयोग आवश्यक और अनुपातिक था तथा इससे प्रभावित लोगों को किस तरह की चोटें आईं. इन सवालों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएगा.

महिला प्रदर्शनकारियों से कथित दुर्व्यवहार भी जांच के केंद्र में

गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाए जाने और उनके साथ कथित उत्पीड़न से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी. समिति के लिए यह जांचना महत्वपूर्ण होगा कि प्रदर्शन के दौरान महिलाओं के साथ किसी प्रकार की हिंसा या दुर्व्यवहार हुआ या नहीं और यदि हुआ, तो उसके लिए जिम्मेदार परिस्थितियां क्या थीं.

पोर्टल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित सवाल और शिकायतों के लिए अलग जानकारी दर्ज करने की सुविधा इस संदर्भ में अहम है. पहचान गोपनीय रखने का विकल्प भी संवेदनशील मामलों में शिकायत दर्ज कराने वाले लोगों को अपनी बात सामने रखने में मदद कर सकता है.

हालांकि, किसी भी शिकायत को जांच का विषय माना जाएगा. आरोपों की पुष्टि संबंधित बयान, दस्तावेज, मेडिकल रिपोर्ट, फोटो, वीडियो और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही की जा सकेगी.

पुलिसकर्मियों पर हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान भी जांच में शामिल

समिति की जांच केवल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कथित कार्रवाई तक सीमित नहीं है. गृह मंत्रालय के बयान में दोनों पक्षों की ओर से हुई अत्यधिक हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में पेलेट, इलेक्ट्रिक बैटन, प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा, मुआवजे तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान जैसे मुद्दे शामिल हैं. इस तरह जांच का दायरा प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग और उससे जुड़ी जवाबदेही के दोनों पक्षों को समेटता है.

समिति को यह देखना होगा कि पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के संबंध में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है. साथ ही, पुलिसकर्मियों के घायल होने, उनके खिलाफ हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े दावों की भी जांच की जाएगी. इसका उद्देश्य घटनाओं का एकतरफा आकलन करने के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरी स्थिति को समझना है.

सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय समिति को सौंपी जांच

सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हिंसा के आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की थी. समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं.

समिति के अन्य सदस्यों में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) शालिंदर कौर, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक एल. आर. बिश्नोई शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट के 18 अगस्त और 10 सितंबर 2026 के आदेशों में जिन मुद्दों की जांच का उल्लेख किया गया है, उनमें पेलेट गन का इस्तेमाल, भीड़ नियंत्रण के दौरान कानून-व्यवस्था कर्मियों की वर्दी, व्यापक निषेधाज्ञाओं की वैधता, पुलिस निगरानी की वैधानिकता और असहमति व्यक्त करने के अधिकार से जुड़े सवाल भी शामिल हैं.

अदालत ने अपने आदेश में पुलिस और सुरक्षा बलों की ओर से कथित रूप से अत्यधिक तथा अनुपातहीन बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर विचार किया था. साथ ही, पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के दावों को भी जांच के दायरे में रखा गया.

साक्ष्यों के आधार पर तय होगी घटनाओं की जवाबदेही

जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों की जांच अब शिकायतों, गवाहों के बयानों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़ेगी. ऑनलाइन पोर्टल शुरू होने से उन लोगों को भी अपनी बात रखने का माध्यम मिला है, जो घटनाओं के दौरान प्रभावित हुए या जिनके पास जांच में उपयोगी जानकारी है.

इस प्रक्रिया की अहमियत केवल आरोपों की पुष्टि तक सीमित नहीं है. पेलेट गन के इस्तेमाल, बल प्रयोग की आवश्यकता, महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा, पुलिसकर्मियों पर हमलों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान जैसे मुद्दों पर निष्पक्ष जांच से घटनाओं की जिम्मेदारी तय करने में मदद मिल सकती है.

हालांकि, पोर्टल पर शिकायत दर्ज होना अपने आप में किसी आरोप की पुष्टि नहीं है. अंतिम निष्कर्ष समिति की जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित पक्षों के बयानों के आधार पर ही सामने आएंगे. फिलहाल, प्रभावित लोगों और गवाहों के लिए शिकायत तथा साक्ष्य जमा करने की सुविधा शुरू होना इस जांच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-