मोतियाबिंद ऑपरेशन का बीमा क्लेम काटना कंपनी को पड़ा भारी, आयोग ने ब्याज सहित 16 हजार रुपये देने का सुनाया आदेश

मोतियाबिंद ऑपरेशन का बीमा क्लेम काटना कंपनी को पड़ा भारी, आयोग ने ब्याज सहित 16 हजार रुपये देने का सुनाया आदेश

प्रेषित समय :17:48:38 PM / Thu, Oct 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नगर प्रतिनिधि,जबलपुर. पत्नी की दोनों आंखों के मोतियाबिंद ऑपरेशन के बीमा दावे में अनुचित कटौती करना बीमा कंपनी को भारी पड़ गया. जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग ने मामले की सुनवाई करते हुए यूनिवर्सल सोम्पो जनरल इंश्योरेंस कंपनी को छह हजार रुपये पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के साथ पांच हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद व्यय के रूप में अदा करने का आदेश दिया है. आयोग ने पाया कि मरीज को दो दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया था, इसलिए डे-केयर प्रक्रिया का हवाला देकर कमरे और नर्सिंग शुल्क में कटौती करना उचित नहीं था.

पांच लाख रुपये की बीमा पॉलिसी ली थी

मामले के अनुसार, जबलपुर निवासी अरुण कुमार पचौरी ने बीमा कंपनी से पांच लाख रुपये की बीमित राशि वाली पॉलिसी ली थी. पॉलिसी की अवधि के दौरान उनकी पत्नी की दाहिनी और बाईं आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया गया. परिवादी के मुताबिक, दोनों ऑपरेशन पर 80-80 हजार रुपये खर्च हुए थे.

बीमा कंपनी ने दोनों चिकित्सा दावों में 27,500-27,500 रुपये का भुगतान किया. इस तरह कुल 55 हजार रुपये दिए गए, जबकि शेष राशि के भुगतान को लेकर विवाद खड़ा हो गया. परिवादी ने बीमा कंपनी की ओर से की गई कटौती को अनुचित बताते हुए उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई.

दोनों दावों में 55 हजार रुपये का भुगतान

परिवादी के अनुसार, दोनों आंखों के ऑपरेशन पर हुए खर्च की तुलना में बीमा कंपनी ने कम राशि का भुगतान किया. शेष रकम के लिए उन्होंने कंपनी से राहत मांगी, लेकिन विवाद का समाधान नहीं होने पर आयोग का दरवाजा खटखटाया.

सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चिकित्सा खर्च का पूरा विवरण और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए थे. कंपनी ने यह भी दलील दी कि पॉलिसी की शर्तों के अनुसार कमरे, नर्सिंग और आंख में लगाए जाने वाले कृत्रिम लेंस से संबंधित शुल्क में कटौती की गई थी.

दो दिन भर्ती रहने पर कटौती को माना अनुचित

मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों का परीक्षण किया. आयोग ने पाया कि मरीज को अस्पताल में दो दिन भर्ती रखा गया था. ऐसी स्थिति में डे-केयर प्रक्रिया का हवाला देकर कमरे और नर्सिंग शुल्क में कटौती करना उचित नहीं था.

आयोग ने इस आधार पर बीमा कंपनी को संबंधित राशि का भुगतान करने के निर्देश दिए. हालांकि, अन्य मदों में की गई कटौती को उपलब्ध साक्ष्यों और पॉलिसी की शर्तों के आधार पर स्वीकार किया गया. इस तरह आयोग ने परिवाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राहत देने का निर्णय सुनाया.

छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा

आयोग ने बीमा कंपनी को छह हजार रुपये की राशि पर 18 अप्रैल 2019 से वास्तविक भुगतान होने तक छह प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का निर्देश दिया है. इसके अलावा पांच हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद व्यय के रूप में अदा करने को कहा गया है.

इस प्रकार आदेश में छह हजार रुपये की मूल राशि, उस पर निर्धारित अवधि का ब्याज, पांच हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद व्यय शामिल हैं. ब्याज की गणना भुगतान की वास्तविक तारीख तक की जाएगी.

उपभोक्ता अधिकारों के लिहाज से अहम फैसला

यह मामला दर्शाता है कि बीमा दावों में कटौती करते समय कंपनी को पॉलिसी की शर्तों के साथ वास्तविक चिकित्सा परिस्थितियों और उपलब्ध दस्तावेजों पर भी ध्यान देना चाहिए. यदि किसी शुल्क में कटौती को लेकर विवाद होता है, तो उपभोक्ता संबंधित दस्तावेजों के आधार पर उपभोक्ता आयोग में शिकायत कर सकता है.

परिवादी की ओर से अधिवक्ता अरुण जैन और बीमा कंपनी की ओर से अधिवक्ता अर्पित वर्मा ने पक्ष रखा. आयोग ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर परिवादी को आंशिक राहत प्रदान करते हुए बीमा कंपनी को निर्धारित राशि ब्याज और अन्य क्षतिपूर्ति सहित देने का आदेश दिया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-